डा. बिनायक सेन क्या नक्सली हैं.

अगली 14 मई को डा. बिनायक सेन को रायपुर जेल में बतौर कैदी दो साल पूरे हो जाएंगे. इस मौके पर देश के तमाम हिस्सों में और विदेशों में भी उनकी रिहाई की मांग के लिए बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जाने की तैयारियां जारी हैं. इसी कड़ी में गुजरे 16 मार्च से रायपुर जेल के बाहर हर सोमवार को गिरफ्तारी देने का कार्यक्रम शुरू हो चुका है. इसी दिन यानी 16 मार्च को कोलकाता और दिल्ली में भी उनकी रिहाई के लिए बड़ी संख्या में विभिन्न क्षेत्रों और तबकों के लोग जुटे. 22 नोबल पुरस्कार विजेता एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्था भी उनकी रिहाई चाहती है.

कौन हैं डॉ  बिनायक सेन और क्या कसूर है उनका? यह 1980 की बात है. दल्ली राजहरा में भिलाई इस्पात संयंत्र की मजदूर यूनियन की उपाध्यक्ष कुसुम बाई प्रसव काल में थीं. मामला दाइयों के बस के बाहर हो गया और संयंत्र के अस्पताल ने उन्हें भर्ती करने से इनकार कर दिया. इसलिए कि वे संयंत्र की नियमित मजदूर नहीं थीं. मजबूरी में उन्हें कोई 80 किलोमीटर दूर स्थित दूसरे अस्पताल ले जाया जाना था, लेकिन उससे पहले ही उनकी मौत हो गयी. इस घटना से गुस्साए आदिवासियों ने गांव-गांव उनकी शव यात्रा निकाली, ताकि बताया जा सके कि जिनके लिए वे अपना खून-पसीना एक करते हैं, उनके लिए मजदूरों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं. इसके एक साल बाद खान मजदूरों की पहल पर शहीद अस्पताल की स्थापना हुई. शुरुआत क्लीनिक से हुई, जो डेढ़ दशक में 60 बिस्तरों का अस्पताल हो गया. डॉ बिनायक सेन इस बड़े काम के प्रणेता और नियामक रहे हैं.

छत्तीसगढ़ के हर गांव में मितानिन दीदी हैं. मितानिन माने दोस्त. यह उन्हीं की मुस्तैदी का नतीजा है कि राज्य में शिशु मृत्यु दर में अभूतपूर्व कमी आई है. उन्होंने सुरक्षित प्रसव और टीकाकरण कराने का कार्यभार संभाला. प्रसव के दौरान और उसके बाद के अवैज्ञानिक तौर-तरीकों को बदलने की बड़ी भूमिका का निर्वाह किया. वे आंगनबाड़ी केंद्रों के कामकाज को दुरुस्त करने में भी जुटीं. मितानिन दीदी राज्य के हर गांव में जाना-पहचाना नाम है, जो सभी के सुख-दुख की साथी है और जिसके जिक्र के बगैर किसी भी गांव की तसवीर अधूरी है. डॉ बिनायक सेन इस प्रयोग के जनक हैं, जिसकी सफलता को राज्य सरकार ने स्वीकारा और 2000 में उसे राज्य स्तर पर सरकार और नागर समाज की साझेदारी के कार्यक्रम के तौर पर लागू भी किया.

छत्तीसगढ़ देश के बेहद गरीब पांच राज्यों में शामिल है. आदिवासी बहुल इस राज्य में खुद आदिवासी दूसरे दर्जे के नागरिकों की हैसियत में पहुंचा दिए गए हैं. सरकार और नक्सलियों के बीच हिंसक लुकाछिपी का खेल चालू है और दो पाटन के बीच आदिवासी हैं. जार्ज बुश की तर्ज पर मुख्यमंत्री का कहना है कि जो सलवा जुडूम के कैंप में नहीं, वे नक्सली या उनके हमदर्द हैं.

हालांकि सलवा जुडूम के कैंप किसी नरक से कम नहीं. कैंपों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बस कहने भर को हैं. गंदगी का राज है और पीने के पानी का भारी अकाल है. इस कारण दस्त-उल्टी जैसी शिकायतें आम हैं. बंदूक की नोक पर सलवा जुडूम के कार्यकर्ता, जिन्हें एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) का दर्जा हासिल है, आदिवासियों को उनके गांव से हांक कर अपने कैंपों में ले आते हैं और उन्हें गुलामों की तरह रखते हैं. उनके नाम पर आनेवाली सरकारी सुविधाओं को लूटते हैं, बलात्कार करते हैं और नक्सलियों के नाम पर बेकसूरों की हत्याएं करते हैं. इस अन्याय में, जाहिर है कि पुलिस और अर्धसैनिक बल बराबर के हिस्सेदार हैं. जो कैंपों में नहीं हैं, वे कल्याणकारी योजनाओं से वंचित हैं और नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाइयों के पहले शिकार हैं.

सबसे सुरक्षित काम है खामोश रहना. ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर. लेकिन डॉ बिनायक सेन चुप नहीं रह सके. रोगी की सेवा और इलाज की तरह उन्होंने सवाल उठाना और जवाब मांगना भी अपना धर्म समझा. मानवीयता और लोकतांत्रिकता की पैरोकारी की. सरकार-प्रशासन की नीयत और कार्रवाइयों को कटघरे में खड़ा किया. और जो गांधीजी के तीन बंदरों की मुद्रा में न बंध सके, वह शांति का दुश्मन है, कानून-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है.

आरोप है कि डॉ बिनायक सेन नक्सलियों के पत्रवाहक की भूमिका में थे कि उन्होंने रायपुर जेल में बंद नक्सली नेता नारायण सान्याल का पत्र रायपुर के व्यवसायी और नक्सलियों के साथ रिश्ता रखने के आरोपी पीयूष गुहा तक पहुंचाया. जबकि वह जेल अधिकारियों की अनुमति से बीमार नक्सली नेता का इलाज कर रहे थे. उन पर राज्य के स्टेट पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है. इस काले कानून के तहत एक हजार से ज्यादा लोग विभिन्न जेलों में बंद हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता और डॉ बिनायक सेन की पत्नी प्रोफेसर एलिना सेन के मुताबिक इस कानून के तहत पहली गिरफ्तारी 12वीं दर्जे की छात्रा की हुई थी, इसीलिए कि उसके दोस्त का राजनैतिक विचार असुविधाजनक माना गया.

यह दुखद है कि हर स्तर पर डॉ बिनायक सेन की जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय ने भी बगैर कोई कारण बताए यही किया. क्या संयोग है कि वह तारीख थी 10 दिसंबर 2007 – मानव अधिकार दिवस. गिरफ्तारी से पहले उन्हें भगोड़ा तक बताया गया, जबकि वह कोलकाता में थे और बीमार थे. लेकिन इस तोहमत से बचने के लिए वह बीमारी में ही रायपुर पहुंचे और जैसा कि तय था, तुरंत हिरासत में ले लिए गए. हत्या, बलात्कार, आगजनी, दंगा, अपहरण, तस्करी और माफियागिरी जैसे जघन्य अपराधों के पराक्रमी जमानत पर फौरन रिहा हो जाते हैं, और अक्सर चुनावी दंगल में उतर कर माननीय भी हो जाते हैं. और यह विडंबना है कि डॉ बिनायक सेन की रिहाई के लिए बाकायदा अभियान छेड़ने की जरूरत पड़ती है. 22 नोबल पुरस्कार विजेताओं तक को सामने आना पड़ता है. पूरी दुनिया में हमारी भद पिट रही है. तनिक सोचिए डॉ रमन सिंह जी, डॉ मनमोहन सिंह जी. सविनय निवेदन है कि फिर से विचार कीजिए मी लॉर्ड.

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