उड़ीसा के जन संघर्ष, उनके सबक और चुनौतियां

वर्ष 1969 में पूरे उड़ीसा राज्य में आम हड़ताल करके एक और स्टील प्लांट लगाने की सरकार से मांग की गई थी. आज उड़ीसा में देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा प्रस्तावित कारखानों, माइनिंग का व्यापक पैमाने पर विरोध किया जा रहा है. 40 साल पहले जब एक और स्टील प्लांट की मांग की जा रही थी, तब लोगों को यह लग रहा था कि इससे रोज़गार के अवसर मिलेंगे, प्लांट में हज़ारों लोगों को काम सीधे तौर पर मिलेगा, शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाओं का प्रसार होगा और श्रमिकों के कल्याण हेतु तमाम कदम उठाए जाएंगे, लेकिन आज उन्हें लग रहा है कि उन्हें उजाड़ दिया जाएगा, जो कुछ है भी, वह भी छिन जाएगा. पहाड़, वन, ज़मीन, पानी, घर-आवास, गांव-बस्ती उनसे छिन जाएगी. उन्हें अपना पूरा जीवन अंधकारमय दिख रहा है. वे विरोध करने को तथा लड़ते हुए मर जाने को तत्पर हैं.

एक दौर था, जब सामंत-राजा-रजवाड़े औद्योगीकरण का विरोध कर रहे थे, इससे उन्हें अपने वर्चस्व के कमज़ोर होने का भय सता रहा था. आज़ादी से पूर्व ओरिएंट पेपर मिल के सिंगा में लगाने की इजाज़त कालाहांडी के राजा ने नहीं दी थी. यह मिल संबलपुर में लगाई गई क्योंकि यह अंग्रेजों द्वारा शासित था. इसी प्रकार मयूरभंज के राजा की अनुमति न मिलने पर टाटा कंपनी बारीपदा के बजाय टाटा नगर में लगाई गई.

आज स्थितियां उलट गई हैं. आम जनता कंपनियों का विरोध कर रही है और पुराने राजा-रजवाड़े कंपनियों का स्वागत कर रहे हैं. इस बदलाव को सहजता से समझा जा सकता है. उदारीकरण-निजीकरण की वैश्विक प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी बनने के बाद आज हमारी सरकार अपने ही नागरिकों के हित के खिलाफ बेशर्मी के साथ खड़ी है. उसकी कल्याणकारी भूमिका बदलकर वैश्विक पूंजी की निर्लज्ज चाकरी हो गयी है. विकास के तथाकथित मॉडल को आम लोगों ने अपने जीवन के अनुभवों से समझने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. उसी का परिणाम है कि आज उड़ीसा में सबसे ज़्यादा दलित-वंचित समाज नेहरू के आधुनिक मंदिरों के नवीनतम चेहरों की आज की असलियत तथा इसमें बैठे महाप्रभुओं की मंशा समझते हुए कंपनियों/माइनिंग को नकार रहे हैं.

विकास एवं विनाश की उलझन में फंसे इस समाज को दिशा देने के लिए समाचार पत्र, बुद्धिजीवी, राजनीतिक दल तथा स्वयंसेवी संगठन, पर्यावरणविद तथा दाता संस्थाएं हरकत में हैं. वहीं दूसरी ओर आशा की किरण के रूप में कुछ ऐसी ताकतें और लोग भी हैं, जो पूंजी केंद्रित-माल मुनाफा केंद्रित विकास की प्रक्रियाओं को चुनौती दे रहे हैं और भुक्तभोगी समाज को सर्वभोगियों के खिलाफ लामबंद करते हुए सहभोगियों के भितरघात से भी अवगत करा रहे हैं.

यह जटिल स्थिति आज उड़ीसा में चल रहे जनसंघर्षों के लिए एक गंभीर चुनौती है. जब सरकार आंदोलनों के प्रति निर्मम हो, कंपनियां अपनी अपनी गुंडावाहिनी बना चुकी हों, न्यायालय माइनिंग के पक्ष में निर्देश दे रहे हों, कंपनियां अपनी-अपनी स्वयंसेवी संस्थाएं, ट्रस्ट, फाउंडेशन बना कर लोगों को प्रलोभन दे रही हों, गुमराह कर रही हों, समाचार पत्र जनता के हितों के साथ न हों, तो ऐसे हालात में जनसंघर्षों को और सचेत, मुस्तैद तथा एकजुट रहना होगा. इस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, मगर बहुत नियोजित एवं ढंग से नहीं हो पा रहे हैं.

मुख्य राजनीतिक दल, दाता संस्थाएं, स्वयं सेवी संगठन अपने प्रचार अभियानों, कार्यशालाओं, सम्मेलनों, बयानों, साक्षात्कारों आदि के जरिए प्रभावित एवं आंदोलनकारी जनों को या तो मध्यम मार्ग की ओर ले जाने को तत्पर हैं (जो बेहतर मुआवजे, क्षेत्र के विकास तथा पर्यावरण कानूनों के सख्ती से लागू करने और बेहतर पुनर्वास की तरफ पहल करने को प्रेरित करते हैं) या प्रभावित होने वाले लोगों को उनकी गरीबी, पिछड़ेपन, मलेरिया, मच्छर, भुखमरी, अशिक्षा, सूखा, महामारी की याद दिलाकर शहर की चकाचौंध की बात करके उन्हें अपना गांव, घर, बस्ती छोड़ देने को सहमत करते दिखते हैं. साथ ही यह कह कर कि कंपनी तो लगेगी ही, माइनिंग तो होगी ही – लोगों के अंदर निराशा पैदा करके उनके संघर्ष करने के तेवर को धूमिल करते हैं. उनका यह मनोवैज्ञानिक प्रचार अभियान, लालच देने के कारनामे तथा आमजनों की चेतना को कुंद करने की साजिश उड़ीसा के जन संघर्षों के लिए एक गंभीर चुनौती है.

समाचार पत्रों की स्थिति यह है कि भुवनेश्वर के एक स्थानीय समाचार पत्र धारित्री एवं देश के प्रमुख अखबार द हिंदू के अलावा सभी समाचार पत्र कंपनियो के साथ हैं. अभी पोस्को कंपनी ने कोरिया के सिओल शहर में प्रेस वार्ता आयोजित की और भुवनेश्वर के तमाम पत्रकारों को हवाई जहाज़ से सिओल ले जाया गया. उड़ीसा के एक प्रमुख समाचार पत्र ‘समाज’ के कार्यालय में पोस्को के अधिकारी संपर्क बढ़ाने के लिए जा चुके हैं.

वास्तव में मुख्यधारा की पूंजीवादी-साम्राज्यवाद परस्त मीडिया सामाजिक सरोकारों को नष्ट-भ्रष्ट कर देने के लक्ष्य के साथ व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद के अंधाधुंध प्रचार में बड़ी मुस्तैदी, प्रतिबद्धता, कर्तव्यनिष्ठा, कौशल तथा परिश्रम के साथ लगा हुआ है. यह अपने प्रिंट-इलेक्ट्रानिक रूपों के द्वारा जन सामान्य के सौंदर्यबोध, संघर्ष चेतना तथा यथार्थबोध को कुंद करने में सोल्लास निमग्न है. उसके द्वारा उदारीकरण, भूमंडलीकरण, निजीकरण तथा बाजारीकरण के पक्ष में आम सहमति बनाने और जनमत निर्माण करने की कोशिश निरंतर जारी है. आमजनों, हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों के दुख-दर्द, पीड़ा और असंतोष के लिए वहां कोई जगह नहीं है. अपवाद स्वरूप कुछ छोटे-छोटे स्थानीय अखबार, पत्रिकाएं ही हैं, जो जन सरोकार के प्रति समर्पित हैं.

ऐसा लगता है कि राष्ट्र राज्य आज निजीकृत हो गया है और अपने ही नागरिकों के हितों के खिलाफ आचरण करते हुए उसकी सरकार जन संघर्षों के विरोध में सभी तरह के दमन के हथकंडों का इस्तेमाल तो कर ही रही है, अपने ही कानूनों तथा संवैधानिक प्रतिबद्धताओं का कत्ल कर रही है. इतना ही नहीं संघर्षरत गांवों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, बिजली आपूर्ति को भी लगभग बन्द कर दिया गया है. इन गांवों पर सामूहिक आर्थिक दंड की योजना पर भी सरकार विचार कर रही है. स्कूलों को मनचाहे ढंग से पुलिस छावनी में बदल दिया जाता है तथा महीनों स्कूल बंद रखे जाते हैं. सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाएं इन विद्रोही गांवों में बंद कर दी गई हैं. ऐसा लगता है कि विरोध-प्रतिरोध के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वालों को नागरिकता के मौलिक अधिकारों से भी वंचित करने की सरकारी पहल अपनी बुलंदियों पर है.

उड़ीसा में चल रहे जन संघर्षों के संदर्भ में कांग्रेस, भाजपा एवं बीजेडी की भूमिका एक जैसी है. देश की आर्थिक नीति, औद्योगिक नीति, कृषि नीति एवं बाज़ा-रीकरण के संदर्भ में इनकी मतैक्यता उड़ीसा में भी साफतौर पर दिखाई देती है. ये दल तथा इनके नेता कंपनियों तथा माइनिंग के समर्थक हैं. इन्होंने कई बार सभाएं करके विकास के वास्ते कंपनियों तथा इनके कारोबार का समर्थन करने का अनुरोध आम लोगों से किया है तथा इन योजनाओं का विरोध करने वालों को विकास विरोधी बताया है. इनका यह भी तर्क है कि जो लोग आदिवासियों को अपना गांव-घर-जंगल-ज़मीन न छोड़ने के लिए उकसा रहे हैं, वे वास्तव में आदिवासियों को उसी हालत में बनाए रखना चाहते हैं जिन हालात में वे शताब्दियों से हैं. ये दल तथा इनकी अगुआई में चल रही सरकारें जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मेमोरंडम आफ अंडरस्टैंडिंग देशी विदेशी कंपनियों के साथ करके उसे अविलंब लागू कराने को आतुर हैं. इसके लिए वे आंदोलनकारियों के साथ किसी भी स्तर पर बल प्रयोग करके निपटने के किसी भी तरीके के हामी हैं. इनके नेतृत्व में चलने वाली सरकारों ने विकास विरोधियों को सबक सिखाने के लिए न केवल पुलिस एवं अन्य सशस्त्र बलों का इस्तेमाल किया हैं, काले कानूनों एवं फर्जी मुकदमों का सहारा लिया है बल्कि कंपनियों को अपनी गुण्डावाहिनी बनाने की छूट दे  रखी है. केंद्र और राज्य सरकार को किसी भी प्रकार का विरोध प्रतिरोध स्वीकार्य नहीं है.

इन दलों के राष्ट्रीय तथा प्रांतीय नेता पुलिस फायरिंग की घटनाओं के बाद जनता के सामने घड़ियाली आंसू बहाने भी पहुंचते रहते हैं परंतु उड़ीसा विधानसभा में इन हालात पर कभी चर्चा तक नहीं होती. केंद्र में सत्तासीन यूपीए के सहयोगी वामपंथी मोर्चे ने भी इन मसलों को कभी एजेंडे में शामिल नहीं कराया और न ही संसद में ज़ोरदार ढंग से इन मसलों को उठाया.

पुलिस, सत्ताधारी दल तथा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जारी आंदोलनों को दबाने के लिए इन संघर्षों में माओवादियों के संलिप्त होने का प्रचार करता रहता है. अभी तक उड़ीसा में जारी जनसंघर्ष लोकतांत्रिक तथा अहिंसक ही है जबकि पुलिस ने काशीपुर में 3, रायगढ़ में 5 तथा कलिंगनगर में 14 आंदोलनरत जनों को अपनी गोली का शिकार बनाया है, कंपनियों के भाड़े के टट्टुओं-गुंडों ने काशीपुर में एक तथा पोस्को विरोधी आंदोलन के एक साथी की हत्या की. उड़ीसा के जनसंघर्षों पर जारी कातिलाना हमलों के बाद भी लोग अहिंसा के ही रास्ते पर कायम हैं. अभी तक केवल एक पुलिसवाले की मौत कलिंगनगर में भीड़ के आक्रमण से हुई है. वह भी तब, जब 12 आंदोलनकारियों को पुलिस ने मौत के घाट उतार दिया.

उड़ीसा के जनसंघर्षों के अगुआकार सामान्य तौर पर औद्योगीकरण के विरोधी नहीं हैं. उनकी समझदारी है कि औद्योगिक उत्पादन देश की व्यापक आबादी की ज़रूरत के हिसाब से हो. किसी देशी-विदेशी कंपनी के साम्राज्य-मुनाफे के संवर्द्धन के लिए न हो. वे सवाल करते हैं कि एक अरब की आबादी के लिए कितने स्टील की ज़रूरत है. दूसरा उनका मानना है कि कृषि योग्य भूमि पर उद्योगों की स्थापना उचित नहीं है. तीसरा आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन बरकरार रखकर ही प्राकृतिक संपदा का उपयोग किया जाये. प्राकृतिक संपदा का उपयोग ज़रूरत के हिसाब से किया जाये – मुनाफे या व्यापार के लिए नहीं. सबसे बड़ी बात यह है कि विकास का चरित्र समग्रता वाला है या कुछ मुट्ठीभर लोगों के लिए. क्या उसे विकास कहा जा सकता है, जो कुछ लोगों को मालामाल करे और व्यापक आबादी को तबाह कर दे, उजाड़ दे, विस्थापित कर दे.

यह जानना-समझना भी दिलचस्प होगा कि समाज परिवर्तन में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाने की मंशा लेकर कार्य शुरू करने वाले ‘स्वैच्छिक संगठन’ किस प्रकार ‘गैरसरकारी संगठन’ बन गए और आगे चलकर ‘प्रो-गवर्नममेंट ऑर्गनाइजेशन’ तथा ‘डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन’ के रूप में रूपांतरित हो गए. समाज परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता से अपनी यात्रा शुरू करके व्यवस्था के प्रबंध तंत्र के हिस्से कैसे बन गए, उत्प्रेरक के बजाय परियोजनाओं को लागू कराने के विशेषज्ञ कैसे बन गये?

वे संस्थाएं, जो व्यवस्था परिवर्तन के नज़रिये से अस्तित्व में आईं, संघर्ष किए, यातनाएं सहीं तथा सरकार के द्वारा उत्पीड़न का शिकार भी बनीं, आज अपने कारनामों, कार्यक्रमों-गतिविधियों से व्यवस्था पोषक के रूप में आंदोलनकारी संगठनों द्वारा चिन्हित की जा रही हैं. इसके कारणों को समझे बगैर इनका सही मूल्यांकन अधूरा होगा यह एक अलग अध्ययन का विषय है कि दाता संस्थाओं की शर्तों – एजेण्डों, सरकारी निर्देशों के अनुपालन तथा अफसरों-नेताओं-मंत्रियों- मुख्यमंत्रियों-गर्वनर की चाकरी का रास्ता इन्होंने क्यों चुना या इस रास्ते पर जाने को क्यों बाध्य हुए?

महिला संगठनों-आंदोलनों के संदर्भ में यदि देखें, तो साफ दिखता है कि महिला आंदोलनकारियों को स्वंय-सहायता समूहों से जोड़कर संस्थाओं ने महिला पहल को कमज़ोर किया है. सफल जन संघर्षों में महिलाओं की प्रमुख भूमिका रही है. सुमनी झोरिया, मुक्ता झोरिया अनपढ़ थीं परंतु राज्य योजना आयोग की सदस्य बनीं. एक कंपनी द्वारा प्रायोजित होने के नाते इन्होंने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया. ये महिलाएं बीजू पटनायक के कार्यकाल में आदिवासी विकास परिषद (उड़ीसा सरकार) की सलाहकार भी थीं. शराबबंदी के खिलाफ पहल की जिम्मेदारी सरकार ने महिला संगठन अमगा को दी थी. महिलाओं-आदिवासियों को आगे लाने में जिन लोगों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, उन्हीं लोगों ने अपनी संस्थाएं पंजीकृत करा लीं, संस्था प्रमुख बन गए, फंडिंग में लग गए.

समझौतापरस्त परियोजनाओं के काम में लग गए. छोटे-छोटे मुद्दे लेकर प्रोजेक्ट शुरू हो गए तथा आंदोलनों की तरफ पीठ कर ली गई. महिला कार्यकर्ताओं को कोई प्लेटफार्म नहीं उपलब्ध कराया गया, फलत: कुछ को प्रोजेक्ट में घसीट लिया गया, बाकी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि उड़ीसा में स्थापित संस्थाओं का एजेंडा पीपुल्स एजेंडा से इस्टेब्लिशमेंट एजेंडा की तरफ मुड़ गया है. अधिकांश संस्थाओं ने सेवाभाव तथा प्रोजेक्टवाद को स्वीकार कर लिया है, जिन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया है, वे अंकुरन तथा अग्रगामी की तरह संकटों से घिरे हुए हैं. एकता परिषद जैसे संगठन सत्ताधारी दल के नेताओं मुख्यमंत्रियों की प्रशंसा में कसीदे कसने लगे हैं, चाहे वे फासीवादी सांप्रदायिक दल के ही क्यों न हो? गोया कि सांप्रदायिक फासीवाद गरीबों के लिए कोई खतरा नहीं है.

उड़ीसा के जनसंघर्षों में यह देखने में आता है कि यह संघर्ष उन्हीं लोगों को अपने साथ जोड़ पाये हैं जो लोग सीधे तौर पर प्रभावित होने जा रहे है. जिन योजनाओं के खिलाफ जनसंघर्ष किया जा रहा है तथा जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं उनके व्यापक प्रभाव के बारे में अवगत कराते हुए वृहत स्तर पर लोगों को जोड़ने में जन संघर्ष असफल रहे हैं. ये मुद्दा आधारित, स्थानीय हैं और कभी-कभी लगता है कि कुछ मामलों में यह व्यक्तिवादी रूझान होने के नाते निजीकृत न हो जाएं. अभियानों में आए कई ऐसे प्रभावशाली लोग हैं जिन्होंने आंदोलनकारी बने रहने के बजाय सेवा प्रदाता की भूमिका को ज़्यादा पसंद किया है. उड़ीसा के जन संघर्षों का कोई प्रांतीय स्तर का सक्रिय व सशक्त साझा मंच न होने का परिणाम यह हैं कि राज्य के दमन और कॉरपोरेट हिंसा का प्रभावकारी प्रतिरोध नहीं हो पाता है और एक-एक करके सभी जन संघर्षों के ऊपर दमन जारी है.

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