हरेक आदमी सावधान हो जाए. लाल गाजर, आंखों को लुभाने वाला खीरा, ककड़ी और कई ऐसी दूसरी सब्जियां जो अपने रूप-रंग से आपको अपनी ओर खींचती हैं, उनका प्रभाव खाने के बाद ठीक उल्टा पड़ता है. जिन सब्जियों में रंग या रसायन पड़ा रहता है- सुई या किसी और माध्यम से- वे आपके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हैं. सामान्य विकास को बाधित करने, मधुमेह का खतरा बढ़ाने, खून की कमी, त्वचा की एलर्जी और सांस की बीमारियों के साथ ही लगभग 65 तरह के खतरे आपकी सब्जियों में मौजूद हैं. धन्यवाद दें, उस नई जैव-संशोधित तकनीक (जीन मोडिफाइड टेक्नोलॉजी) को, जिसके जरिए आपकी सब्जियां उगाई जा रही हैं. ये सब्जियां पहले से ही लाखों भारतीयों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रही हैं- लोग इनके खतरों से अनजान जो हैं. इससे भी खतरनाक यह कि आपके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को पलटा भी नहीं जा सकता है. क्यों. इस वजह से कि ऐसे खानों को जैव-संशोधित तकनीक से बनाया गया है और इसके अणुओं में ही बदलाव कर दिया गया है. इसी वजह से उनको अंग्रेजी नाम के संक्षिप्त रूप जीएम-खाद्यान्न के नाम से जाना जाता है. वैसे खतरा यहीं नहीं थम जाता. सबसे खतरनाक खुलासा अभी बाकी है. खबर यह है कि हमारी सरकार देश के कृषि-उत्पादों को पूरी तरह से जीएम तकनीक में बदल देना चाहती है. यह काम सभ्य संसार के किसी और देश ने नहीं किया है. सौभाग्य से जिन लोगों को जैव-संशोधित तकनीक के खतरे पता हैं, उन्होंने कार्रवाई शुरू कर दी है. उदाहरण के लिए कई ने सुप्रीम कोर्ट में इस तकनीक पर रोक लगाने की याचिका भी दाखिल की है. सबसे अचरज की बात यह है कि अधिकतर देशों में जैव-संशोधित खाद्यान्न के बारे में कानून स्पष्ट हैं, पर भारत में इस तरह के खाद्यान्न के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है. हालांकि यह रोक कितनी कारगर है, यही देखने की बात है. इस तकनीक के बारे में बताते हुए यह तब ही समझ में आ जाता है, जब हम सुपरमार्केट में घूमते हैं और व्यक्तिगत तौर पर इन खाद्यान्नों की वहां उपस्थिति देखते हैं. संयोग की बात यह है कि मांसाहार करने वाले लोग भी जीएम तकनीक की वजह से उतने ही खतरे में हैं, जितने कि शाकाहारी. आखिर कैसे. इसका जवाब तलाशना बहुत आसान है. मांस, अंडे और सारे डेयरी उत्पाद भी उतने ही खतरनाक हो जाते हैं, अगर जानवरों ने जीएम उत्पाद खाए हों. यहां तक कि शहद भी अछूता नहीं, अगर मधुमक्खियां गलती से भी जीएम खाद्यान्न के संपर्क में आ गई हों. इस बिंदु पर जीएम खाद्यान्न के खतरों से अनजान लोग पूछ सकते हैं कि आखिर जीएम खाद्यान्न किस तरह से बनाया जाता है और उनको खतरनाक आखिर कौन सा तत्व बनाता है. वैज्ञानिकों का शोध बताता है कि किसी जीन को जबर्दस्ती घुसाने से किसी फसल का डीएनए बिगड़ जाता है. जैव-तकनीक की पूरी प्रक्रिया फसल में बहुआयामी बदलाव ला देती है. जब किसी फसल के डीएनए में जीन को अतार्किक तरीके से डाला जाता है, तो उनकी स्थिति उनके काम को प्रभावित करती है. साथ ही, प्राकृतिक जीन को भी प्रभावित करती है. किसी पौधे की कोशिका को जीएम-फसल में बदलने की प्रक्रिया से पूरे जीनोम में सैकड़ों या हजारों परिवर्तन आ जाते हैं. इस क्षेत्र में काम कर रहे अधिकतर वैज्ञानिक इन परिवर्तनों के स्तर से अनजान हैं और किसी भी अध्ययन में व्यावसायिक जीएम-पौधों को बनाने के क्रम में पौधे के जीनोम में आए व्यापक परिवर्तन का अध्ययन नहीं किया गया है. ये व्यापक बदलाव कई तरह के स्वास्थ्यपरक प्रभाव और खतरे पैदा करते हैं. जीएम खाद्यान्न दूसरे क्षेत्रों में भी कई सवाल पैदा करता है. क्या यह नैतिक है कि हम ईश्वर की बनाई रचना के साथ छेड़खानी करें. इसके बावजूद बड़े-बड़े निगम इंसानों द्वारा की जा रही इस छेड़छाड़ को व्यक्तिगत फायदे के लिए बढ़ावा दे……
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