जब तोप मुकाबिल हो

लाहौर के दो हिस्से हैं. एक हिस्सा वह है जिसका ज़िक्र मैं कर रहा हूं और आगे भी करूंगा, पर दूसरा हिस्सा वह है जो पुराना लाहौर कहलाता है और दीवारों के अंदर है. जिसे वॉल सिटी भी कहते हैं. ठीक हमारी दिल्ली की तरह. वैसी ही गलियां, वैसा ही माहौल, वैसा ही अपनापन और प्यार. इस वॉल सिटी और बाहर की दुनिया को जोड़ते बारह दरवाज़े हैं जिनमें दिल्ली दरवाजा, मोरी गेट वगैरह शामिल हैं.

म जब तक पाकिस्तान नहीं जाते, तब तक हमारे मन में पाकिस्तान को लेकर कई तरह की तस्वीरें इतनी गहरी बन चुकी होती हैं कि उनसे विपरीत स्थिति का मिलना एक गहरे धक्के का कारण बन जाता है. पाकिस्तान गंदा होगा, वहां के लोग उन्नीसवीं शताब्दी की सोच के होंगे, और हर जगह बमों के धमाके होंगे, लड़कियां प़ढ़ नहीं रही होंगी और आमलोग हिंदुस्तान को लेकर ऩफरत उगल रहे होंगे. लाहौर पाकिस्तान जाने के लिए भारत के लोगों का पहला दरवाज़ा है. लाहौर को देखिए, तस्वीरें, जो पहले से भारतीयों के दिमाग़ में बनी हुई होती हैं, अपने आप टूटने लगती हैं.

एक शहर जो साफ सुथरा है, इतना साफ सुथरा कि सड़कों पर कूड़ा नहीं दिखाई दिया, जबकि तलाशने की काफी कोशिश की. सफाई तब तक आंखों से नहीं दिखाई देती जब तक कि उसमें नागरिकों की हिस्सेदारी न हो, क्योंकि शहर को साफ रखने की ज़िम्मेदारी निभाने वाली कारपोरेशन अकेले यह काम कभी कर ही नहीं सकती. बहुत कम जगह गंदा पानी या कीचड़ दिखाई दिया, यही नहीं खुले नाले भी नहीं मिले.

सड़कें पूरी तरह बनी हुईं. पता लगाया तो पता चला कि ये सड़कें हर बरसात के बाद नहीं टूट जातीं. अगर बारिश के बाद टूट जाने का सिलसिला होता तो सड़कें बनती नज़र आतीं जबकि सड़कें, चौड़ी सड़कें, साफ सुथरी सड़कें लाहौर के हर हिस्से में दिखाई दीं. इसका मतलब यह भी निकलता है कि सड़क निर्माण में कमीशनखोरी न के बराबर है.

लाहौर के दो हिस्से हैं. एक हिस्सा वह है जिसका ज़िक्र मैं कर रहा हूं और आगे भी करूंगा, पर दूसरा हिस्सा वह है जो पुराना लाहौर कहलाता है और दीवारों के अंदर है. जिसे वॉल सिटी भी कहते हैं. ठीक हमारी दिल्ली की तरह. वैसी ही गलियां, वैसा ही माहौल, वैसा ही अपनापन और प्यार. इस वॉल सिटी और बाहर की दुनिया को जोड़ते बारह दरवाज़े हैं जिनमें दिल्ली दरवाजा, मोरी गेट वगैरह शामिल हैं.
लाहौर के लोग अपने को लाहौरिये कहलाने में गर्व महसूस करते हैं. इनकी ज़िंदादिली देखने लायक है. लाहौर के लोग हर बात को जश्न में बदलने की ताक़त रखते हैं. दिन में अगर गर्मी ज़्यादा है तो शाम को पूरा शहर सड़कों पर आ जाएगा, मेले जैसा माहौल हो जाएगा. अभी कुछ साल पहले भारत ने रावी में ज्यादा पानी छोड़ दिया तो लाहौर पुल के ऊपर से पानी बहने लगा. लाहौर के  लोगों ने उसे भी जश्न में बदल दिया. मेले ठेले लग गए, दो दिन वहां खूब रौनक रही. रविवार को लाहौर के ज़्यादातर घरों में खाना नहीं बनता, सभी नाश्ते से लेकर रात के खाने तक बाहर खाना  या बाहर से ले जाकर घर पर खाना पसंद करते हैं. लाहौर का रहने वाला ज़्यादा दिनों तक दूसरे शहर में नहीं रह पाता. निसार मलिक  साहब कहने लगे, आपको ग़रीबों की बस्ती दिखाते हैं. उनके साथ देखने पर पाया कि अच्छे घर हैं, लम्बा चौड़ा अहाता है, उनकी तरफ देखा तो मुस्कुरा कर बोले कि ये ही ग़रीब हैं, हमेशा चाहते हैं कि इनके यहां और आएं

लाहौर के रहने वाले इस बात पर चिंतित हैं कि हिंदुस्तान उन्हें हर बात की जड़ मानता है. इस बात की गहराई का अंदाज़ा कैनेट कॉलेज की लड़कियों से बातचीत के दौरान एक कार्यक्रम में हुआ. जंग के डिप्टी एडिटर डॉ. मुजाहिद मंसूरी ने कैनेट कालेज में, मास कम्युनिकेशन के विद्यार्थियों के साथ, जिनमें सभी लड़कियां थीं, भारत-पाकिस्तान के बीच के हालात पर कार्यक्रम रखा. हॉल खचाखच भरा था-स्टूडेंट्‌स और टीचर्स से. सभी ने सवाल पूछने शुरू किए, सब के सवाल थे कि क्यों मुंबई ब्लास्ट के पीछे पाकिस्तान का हाथ भारत के मीडिया ने सबसे पहले बताया, कि क्यों हर बात पाकिस्तान के ऊपर ही थोपी जाती है, मुसलमानों को क्यों मीडिया टेररिस्ट दिखा रहा है, क्यों हिंदुस्तान में टेररिस्ट नहीं होते, तो पाकिस्तान में तो मीडिया किसी टेररिस्ट को हिंदू वेशभूषा में नहीं दिखाता.

लगभग तीन घंटे की बातचीत, सवालों का सिलसिला और आख़िर में लड़कियों का कहना कि सर आप तो हम में से एक लगते हैं, आप उन जैसे नहीं हैं जिन्हें हम ऩफरत फैलाते देखते हैं और तालियां… मन को भिगो गया. लड़कियां थीं कि जानकारी से भरी हुई, उत्साह से छलकती हुईं, पढ़ाई के लिए पागल होती हुईं, पाकिस्तान के अच्छे भविष्य में आशा पैदा करती हुईं. लड़कियों का कहना था कि पूरे पाकिस्तान में लड़कियां पढ़ने और बौद्धिक स्तर बढ़ाने में जी जान से लगी हुई हैं, लड़कियों की जो तस्वीर दुनिया में दिखाई जा रही है, वह ग़लत है. पाकिस्तान में साफ-साफ दिखाई दिया कि लड़कियां कार चला रही हैं, बिजनेस चला रही हैं, हर जगह आगे हैं और कहीं भी उस तरह की तो नहीं दिखाई देतीं जैसा उन्हें दिखाया जाता है. बाज़ारों में इक्कीसवीं सदी की लड़कियां पूरे फैशन के साथ, लेकिन सलीके वाले फैशन के साथ अकेली, दोस्तों के साथ, या परिवार के साथ खिलखिलाती दिखाई पड़ती हैं.

बाज़ार, होटल, खाने की जगहें हमारे यहां से बेहतर हैं, कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी. कई जगहों पर खाने की जगहें कल्पनाशीलता लिए हुए हैं. लाहौर की फूड स्ट्रीट, सैकड़ों लोग खाना खाने वहां रात में तीन बजे तक जाते हैं. एक लंबी गली, दोनों तरफ होटल, ऊपर रोशनी से लबालब मकानों के छज्जे और नीचे हर तरह का खाना, मिठाई, गरम-गरम जलेबी, उत्साह और आधुनिकता की निशानी. कद्दाफी स्टेडियम के आसपास  चारपाइयां, बढ़िया होटल, अच्छा खाना लाहौर के खूबसूरत हंसते-मुस्कुराते परिवार और लक्ष्मी चौक, जहां ऐसी ही खाने पीने की जगहें हैं. लाहौर के लोग खाने पीने के शौकीन हैं, ऐसे-ऐसे होटल में गए जो कांसेप्ट के आधार पर बने हैं. एक ही छत के नीचे इतने प्रकार के खाने भारत के किसी होटल में अब तक दिखाई नहीं दिए. साथ खाना खिलाने का तरीका, मेहमानबाजी और नफासत वाला कि खाना खाने वाले का मन खुश हो जाए.

पाकिस्तान के विकास, यहां की ग़रीबी, सामाजिक स्थिति को बदलने की चाह रखने वाले लोग मिले जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान की स्थिति से चिंतित दिखे. पाकिस्तान में सुरक्षा को लेकर चिंता है. पाकिस्तान में मध्यवर्ग ख़त्म हो रहा है. या तो ग़रीबी है जो बहुत ज्यादा है या पैसे वाले हैं, जो हैं तो कमसंख्या में, लेकिन ज्यादातर धन उन्हीं के पास इकट्ठा हो गया है. आज पाकिस्तान में कहीं भी यह डर फैला दिखाई दे रहा है कि अगर खुद सावधान न रहे तो कोई भी आपका सामान छीन कर भाग सकता है. मोबाइल, पर्स, हाथ का सामान, औरतों की गले की चेन या हाथों की चूड़ियां बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं. यहां कि पुलिस है जो अपना काम नहीं कर रही. मीनारे पाकिस्तान देखने जाइए तो रात में रोशनी का इंतजाम नहीं, किसी तरह आप पहुंच जाएं तो मीनार पर पाकिस्तान डिक्लेरेशन जिसे कायदे आज़म जिन्ना ने लिखा था, पढ़ नहीं सकते. सारी दुनिया के लोग जाते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी भी गए थे पर प्रशासन के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह वहां रोशनी का इंतज़ाम कर सके. इतना ही नहीं, पास में प्राइवेट झूला चलाने वाले लोग हैं जो रोशनी का इतना इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे लगता है कि सरकार के पास बिजली की कमी हो गई है. बदइंतज़ामी तो हमारे यहां भी है. हम भी देश का नाम दर्शाने वाली चीजों का ज़्यादा ध्यान नहीं रख पाते.

लाहौर में कई मंदिरों के प्रमुख मिले. यहां लोगों से बात हुई. पता चला कि कोई ऐसा त्यौहार नहीं है जिसे यहां के हिंदू और सिख न मनाते हों. उनकी खुशी में मुसलमान भी शामिल होते हैं. मंदिरों के ट्रस्टों के अध्यक्ष मुसलमान हैं और ये गर्व से बताते हैं कि वे कितना काम कर रहे हैं. हिंदू अल्पसंख्यकों ने बिना किसी हिचक से बताया कि हम न केवल खुश हैं बल्कि सुरक्षित भी हैं. बाबरी मस्ज़िद की शहादत के वक्त ज़रूर थोड़ी परेशानी हुई पर उसके बाद कुछ नहीं हुआ. यहां रहने वाले उर्दू लिखते, पढ़ते और बोलते हैं.

आखिर में ग़द्दाफी स्टेडियम के बारे में जहां खाना खाने वाले सारी रात जाते हैं. यहां श्रीलंका की क्रिकेट टीम को लेकर उसका ड्राइवर आ गया था. इससे पहले लिबर्टी चौक पर आतंकवादियों ने उस बस पर हमला कर दिया था. सारी दुनिया ने देखा. जब लिबर्टी चौक गए तो देखा कि यह तो बीच बाज़ार में है और यहां दिनदहाड़े कई घंटों, गोली चले, कैसे संभव है. लेकिन यह हुआ और इसके बहुत से गवाह मिले. जिस फायरिंग को सबने टीवी पर देखा उसे यहां की एक कैमरा दुकान के मालिक ने अपने आप चोरी से शूट कर लिया था. आसपास बड़ी दुकानें हैं, पर जैसे हिंदुस्तान में हर जगह पुलिस नहीं होती वैसे ही पाकिस्तान में नहीं होती. पर पुलिस जांच अब लगभग बंद हो गई है और लोगों को लगता है कि कुछ निकलेगा ही नहीं. हमारे यहां भी किसी जांच से कहां कुछ निकलता है.

हमारे दर्द साझा हैं, तकलीफें साझा हैं पर हम कभी एक साथ उन पर सोचते ही नहीं. पाकिस्तानी नौजवान और पाकिस्तान के लोग अब इस ओर ध्यान देने लगे हैं, यह सबसे खुशी की बात लगी. अगर लाहौर में कोई सवाल करे कि क्या हिंदुस्तान में मुशायरे होते हैं या कि क्या वहां उर्दू अब भी बोली जाती है, तो यही कहना पड़ता है कि आप आइये और खुद देखिए. ये खुद देखना ही कई नहीं बहुत से सवालों का हल है. और अब सवालों को हल करने का वक्त आ गया है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.