जब तोप मुकाबिल हो

आडवाणी जी अपना मखौल मत उड़वाइए

देश में राजनीतिक नेता का जन्म का़फी संघर्ष के बाद होता है. ऐसा नेता, जिसका नाम देश में सभी जानें, जिसके नाम पर भीड़ हो, जिसकी बात पर लोग विश्वास करें, जिसे अनदेखा न करें. इसलिए किसी भी ऐसे व्यक्तित्व पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए. लेकिन क्या करें, आज गुस्ताख़ी करनी पड़ रही है.

पं.जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वी पी सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे नाम हैं जिन्हें देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाना जाता है. इसी श्रेणी में लालकृष्ण आडवाणी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी आते हैं. राहुल गांधी का नाम हम इसलिए लिख रहे हैं, क्योंकि पांच सालों में उन्होंने देश में घूम कर अपने नाम को हर जगह पहुंचा दिया है.

लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के सर्वोच्च नेता हैं और अभी कुछ वर्ष पहले तक उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हमेशा तस्वीर में देखा जाता रहा है. चुनाव के समय या सामान्य समय की पिछले बीस वर्षों में हमें कोई ऐसी तस्वीर याद नहीं जिसमें अटल जी के साथ आडवाणी जी की तस्वीर न रही हो. दो हज़ार चार के चुनाव को ही लें, हर जगह अटल जी व आडवाणी जी की तस्वीर दिखाई देती थी. फिर आया आडवाणी जी को भावी प्रधानमंत्री बताने वाला भाजपा का बयान.

और पिछले तीन सालों में, तथा इस बार के चुनाव में आडवाणी जी अकेले और अटल जी गायब. शायद भाजपा के लोग भूल गए कि अटल जी अभी ज़िंदा हैं और देश के उस वर्ग पर, जो भाजपा का समर्थन करता है, असर रखते हैं, उनके मन में ख़ास जगह रखते हैं. इन चुनावों में न अटल जी की तस्वीर, न उनकी अपील, न उनका हाथ जोड़े मुस्कुराता चेहरा, इसने भाजपा कार्यकर्ताओं को बहुत निराश किया. अटल जी की अपील की ताकत का अहसास लालजी टंडन को है जिन्होंने हारता हुआ चुनाव आखरी दिनों में अटल जी की एक अपील की चिट्ठी अपने पक्ष में छपवा कर बंटवाई और चुनाव जीत गए. और भाजपा ने इतनी एहसानफरामोश की कि अटल जी की अपील भी जारी नहीं की. भाजपा की इस बेरुख़ी को  कार्यकर्ताओं ने आडवाणी जी की चूक और बेरुख़ी माना. उनमें से किसी ने दिल से आडवाणी के लिए काम नहीं किया जो अटल जी को अपना नेता मानते हैं, क्योंकि उन्हें यह अटल जी का अपमान लगा.

आडवाणी जी से असहमत हुआ जा सकता था, पर कुछ दिन पहले तक उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता था. उनके कट्टर विरोधियों को भी लगता था कि वह जो कहते हैं उसे जांचना-परखना चाहिए, क्योंकि  उसे आडवाणी जी कह रहे हैं. उन्होंने पिछले आठ महीनों में ऐसा व्यवहार किया, मानो वह भारत के भावी नहीं बल्कि जीते प्रधानमंत्री हों, बस शपथ लेने की देर है. दुनिया के हर हिस्से में उन्हें प्रधानमंत्री बताने वाले चित्र, उनके वक्तव्य इस बहुतायत के साथ कि वह तो प्रधानमंत्री बनेंगे ही. यह असर भारत की जनता पर डालिए क्योंकि उसे वोट डालना है, पर पाकिस्तान की जनता पर क्यों असर डाला जाए? अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों की जनता पर क्यों असर डालने की कोशिश की गई? पाकिस्तान के हर अख़बार की वेबसाइट पर प्रमुखता से आडवाणी जी की फोटो और भारत के बनने वाले प्रधानमंत्री का प्रचार, आख़िर कैसी रणनीति का हिस्सा था.

क्या आडवाणी जी ने एक प्रतिशत भी नहीं सोचा कि यदि जनता ने उनके पक्ष में फैसला नहीं दिया और वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए तो उनका सारी दुनिया में कितना मज़ाक बनेगा, उनका मखौल उड़ाया जाएगा. उनकी उपस्थिति में उन्हें आदरणीय भावी प्रधानमंत्री जी कह कर संबोधित किया जाता था, और वह उसे मुस्कुराकर सुनते थे, मना नहीं करते थे. अब क्या कहेंगे, भारत के प्रधानमंत्री पद के ठुकराए आदरणीय नेता? अपने को मज़ाक बनवा दिया.

अपने राजनैतिक जीवन के आख़िरी व़क्त में आडवाणी जी ने अपने सलाहकारों को क्यों यह अनुमति दी कि वह उनका ऐसा घमंड भरा रूप सामने लाएं, जो ईश्वर को भी मंज़ूर न हो. आडवाणी जी को एक कथा हिंदु धर्म से जुड़ी याद कराते हैं. नारद जी स्वयंवर में जाने के लिए विष्णु भगवान से वरदान मांगने गए कि उन्हें सबसे सुंदर चेहरा मिल जाए. वह स्वयंवर लक्ष्मी जी का था. और वह सुंदर चेहरे के बल पर लक्ष्मी जी से शादी करना चाहते थे. हिंदुओं में लक्ष्मी धन और संपदा की देवी मानी जाती हैं. विष्णु भगवान ने उन्हें चेहरा दे दिया. स्वयंवर में लक्ष्मी जी आती थीं और आगे चली जाती थीं, नारद यह सोचकर कि लक्ष्मी उनके सुंदर चेहरे को देख नहीं पा रही इसलिए उनके आगे बार-बार आते थे. लक्ष्मी जी ने चिढ़कर कहा कि मेरे सामने आने से पहले अपना चेहरा तो देख लो. नारद ने चेहरा देखा, तो वह चेहरा बंदर का था. विष्णु ने नारद का घमंड तोड़ने के लिए यह काम किया था.

आडवाणी जी का प्रधानमंत्री के रूप में इतना प्रचार और चुनाव में इतनी बुरी हार, न बड़ी पार्टी बना पाए भाजपा को और न गठबंधन को सीटें दिला पाए. अगर दस या पंद्रह का अंतर होता तो भी इज़्ज़त रह जाती.

इसके बावज़ूद आडवाणी बड़े नेता थे, उनकी साख थी, लेकिन यह साख उन्होंने 18 मई को समाप्त कर ली. 16 को उन्होंने कहा कि वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे, वह नेता विपक्ष भी नहीं बनेंगे. लोगों ने इसे बड़े नेता का शानदार वक्तव्य मान उन्हें गरिमापूर्ण विदाई देने का मन बना लिया. पर वह तो दो दिन भी अपने वचन पर नहीं टिक पाए. 18 मई को उन्होंने लोकसभा में विपक्ष का नेता बनना स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही वह ऐसे लोगों की लाइन में शामिल हो गए जो अपनी कही बात पर टिकते नहीं, पलट जाते हैं, जिनकी कथनी और करनी एक नहीं होती. पहले उन्हें पी एम इनवेंटिग कहते थे अब उन्हें एल ओ पी लीडर ऑफ ऑपरेशन इनवेटिंग कहा जाने लगा है.

लाल बहादुर शास्त्री ने एक दुर्घटना पर अपना त्यागपत्र दे दिया था, देश ने उन्हें बाद में प्रधानमंत्री बनाया. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने त्यागपत्र की बात कह त्यागपत्र दे दिया, देश ने उन्हें भी प्रधानमंत्री बनाया. पर आडवाणी जी ने अपनी घोषणा का सम्मान न रख देश के सामने किस तरह का उदाहरण रखा है, यह वह ही अच्छी तरह समझ सकते हैं. लेकिन वह उन नेताओं की श्रेणी से अलग हो गए हैं जो कथनी और करनी में भेद नहीं करते. संन्यास की बात उन्हें कहनी ही नहीं चाहिए थी, और अब लोगों को लगता है कि उन्हें प्रधानमंत्री न बनाने का कोई मलाल नहीं रखना चाहिए, क्योंकि ऐसा प्रधानमंत्री नहीं चाहिए जो कहे कुछ और करे कुछ.

आडवाणी जी को यह भी समझना चाहिए कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो देश में रहने वाले सभी नागरिकों के बारे में सोचें,उनकी भावनाओं और उनकी तकलीफों को समझे. यही सवाल मुसलमानों के मन में था कि आडवाणी उन्हें तो देश का नागरिक समझते ही नहीं और उनके साथी ज़हर बोलते हैं, यह बात आम हिंदुओं के मन में भी थी कि आडवाणी जी के आते ही मुसलमानों और हिंदुओं ते बीच समस्याएं खड़ी हो जाएंगी.

आडवाणी जी से ज़्यादा ऊंचे तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी नज़र आते है. दोनों ने घोषणा की कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे और वे प्रधानमंत्री नहीं बने. पिछली बार भी सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने में कोई अड़चन नहीं थी और इस बार राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने में कोई रुकावट नहीं है. कांग्रेस के भीतर दबाव है कि राहुल प्रधानमंत्री बनें लेकिन वे अपनी बात पर कायम हैं. हमें कहते संकोच नहीं हो रहा है कि आज सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अपना कद आडवाणी से बड़ा बना लिया है और वे सत्तालोलुप नहीं हैं, यह दिखा दिया है.

आडवाणी जी, राहुल गांधी की तरह अपने वचन का पालन कर भाजपा को नई साख बनाने का अवसर दीजिए, क्योंकि भाजपा को अभी ऐसे नेता बनाने हैं जो राज्यसभा की नहीं लोकसभा की राजनीति करें अर्थात जनता के बीच साख पैदा करने की कोशिश करें. एक सक्षम, सार्थक और साख वाले विपक्ष की देश को ज़रूरत है और उसके लिए नेता भी वैसा चाहिए, जो जैसी घोषणा करे, वैसा ही अमल भी करे. फैसला स़िर्फ आपको, और आपको ही लेना है, आडवाणी जी. उनके जाल में मत फंसिए जिन्होंने आपको सारे देश में हंसी का पात्र बना दिया है, क्योंकि ऐसे सलाहकार आपकी रही सही इज़्ज़त भी नीलाम कर देंगे. अपने रहते आप देखिए कि भाजपा में नया नेतृत्व विकसित हो जो देश की बुनियादी समस्याओं की चिंता करे, भावनात्मक उबाल लाने का अवांछनीय काम नहीं. आपके लंबे राजनीतिक जीवन की हम इज़्ज़त करते हैं, उसे नीलाम मत होने दीजिए आडवाणी जी.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.