हिंदू होने का धर्म : योगः कर्मसु कौशलम्‌

सनातन धर्म में कर्म की बड़ी महत्ता है. कर्म को ही सबसे महान और बड़ा माना गया है. किसी भी भाग्य या भगवान से बड़ा केवल और केवल कर्म को माना गया है. तभी तो सनातन धर्म की दिशानिर्देशक किताबों में से एक भगवद्गीता में स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने पूरा का पूरा अध्याय कर्मयोग को ही समर्पित कर दिया. उन्होंने घोषणा कर दी-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अकर्मण्यता का पाठ पढ़ाया गया है. यहां भावार्थ केवल यह है कि कर्म करना ही हमारे हाथ में है, उसका परिणाम क्या आएगा, इसकी चिंता करना हमारा काम नहीं है- यत्ने कृते यदि न सिद्धयते कुत्र दोषः- यानी प्रयत्न करने पर भी यदि लक्ष्य प्राप्त न हो, तो किसे दोष दिया जाए?
सनातन धर्म एक जीवनपद्धति है. यह कोई रूढ़ि नहीं है. इसका सीधा-सा मतलब है कि आप अपने काम को करें, वही आपका धर्म है. किसी भी पूजा पद्धति या कर्मकांड से अधिक इसमें कर्म पर ज़ोर दिया गया है-कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करै, सो तस फल चाखा-यानी इंसानों का सारा हिसाब-किताब यहीं इसी दुनिया में होना है. यहां इस बात से भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है कि सनातन धर्म में ही स्वर्ग और नरक की अवधारणा भी है. पहले भी बताया जा चुका है कि अपनी सतत गतिशीलता की वजह से ही सनातन धर्म में परस्पर कई विरोधी सिद्धांत भी मिलते हैं. उस पर बात फिर कभी. फिलहाल तो हम कर्म की प्रधानता पर चर्चा कर रहे हैं.
कर्म शब्द का मूल है कृ, जिसका अर्थ है-करना. कर्म वह क्रिया या काम है, जो हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है. आजीवन कारण और परिणाम (कॉज़ एंड इफेक्ट) को निर्धारित करता है. यह हमारे विचार और भावनाओं को भी संप्रेषित करता है और हम जो कुछ भी चेतन अवस्था में करते हैं, वह सब हमारे कर्म ही तो हैं. कर्म ही आत्म (द सोल) के सांसारिक जीवनचक्र को निर्धारित करती है. हरेक स्तर पर क्रिया और प्रतिक्रिया- चाहे वह शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक हो- ही कर्म है. यह जान लेना बेहद ज़रूरी है कि कोई भी ईश्वर (मूर्त या अमूर्त) हमें कर्म की गठरी नहीं भेंट करता. यहीं पर सनातन धर्म के भाग्यवादियों को सावधान होने की ज़रूरत है. सनातन धर्म कभी भी हमें भाग्यवादी बनने की सीख नहीं देता. भाग्य जैसा कुछ होता ही नहीं, जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि भाग्य तो कायरों का हथियार है, बलशाली तो अपना भाग्य खुद निर्मित करते हैं. इसी बात को अल्लामा इक़बाल ने कुछ इस तरह कहा है- ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है? इंसानों को उनकी स्वतंत्र इच्छा के मुताबिक ही काम करने के लिए भेजा गया है. हम ख़ुद अपना कर्म निर्मित करते हैं. सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में वेद आते हैं, जिसके अनुसार अगर कोई व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, तो उसे परिणाम भी अच्छे मिलते हैं और बुरा कर्म करने पर उसका फल भी बुरा ही होता है-बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय? कर्म इंसान के सभी कामों को पूर्णता में व्यक्त करता है. सनातन धर्म में यह भी सिद्धांत है कि हो सकता है कि कुछ कर्मों का फल तुरंत न मिले, लेकिन कभी न कभी जीवन के किसी मोड़ पर उसका फल हरेक व्यक्ति को भोगना ही पड़ता है. कर्म के इसी दर्शन से चार्वाक जैसे दार्शनिकों का नास्तिक दर्शन भी पैदा हुआ, जिन्होंने पुनर्जन्म जैसी मान्यताओं को धता बताते हुए इसी जीवन में सब कुछ भोगने और जी लेने की बात कही. कर्म के चक्र को बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों और वीतराग प्रतिक्रिया से ही जीता जा सकता है.
कठोरता गलत फलों को पैदा करती है, जिसे पाप कहते हैं और अच्छे कर्म मीठे फल देते हैं, जिसे पुण्य कहते हैं. व्यक्ति के जीवन का आधार इन दोनों का सम्यक संतुलन ही होता है.
गीता में कृष्ण ने कर्मयोग का सिद्धांत दिया है. निर्लिप्त रहकर कर्म करना एक बड़ी कला है, जिसे सीखना ही किसी व्यक्ति को महान बनाता है. इसी तरह से योग का चिंतन भी सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा है. सनातन धर्म की आध्यात्मिक धारा किसी भी इंसान के जीवन के सभी पक्षों को तय करती है. योग का अर्थ है जोड़ना. योग और कर्म जब मिल जाते हैं, तो उसी को कहते हैं कर्मयोग. कर्म को आध्यात्मिक स्तर पर जोड़ना ही कर्मयोग कहलाता है. वैसे तो, योग के चार प्रकार हैं. कर्मयोग के अलावा भक्तियोग (जिसमे व्यक्ति अपनी चेतना को आध्यात्मिक स्तर पर पारलौकिक तत्वों के चिंतन में लगाता है), राजयोग (जिसमें व्यक्ति अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर साधना की ओर उन्मुख होता है) और ज्ञान योग (जिसमें व्यक्ति गुरु के पास बैठ कर या किताबों की मदद से ज्ञान की साधना करता है) भी योग के ही प्रकार हैं. योग का सीधा सा मतलब आत्म का ब्राह्मण (परम तत्व) से एक हो जाना है. ब्राह्मण किसी जाति विशेष का परिचायक न होकर उस परम सत्ता, परम तत्व और पवित्र आत्मा का द्योतक है, जो लगातार प्रगतिशील है, लगातार बढ़ता है और जिसका कभी क्षरण नहीं होता. उस परम तत्व के अनुरूप जब हम अपने कर्मों को निर्धारित कर देते हैं, तो उसी को कर्मयोग कहते हैं और यही सनातन धर्म का मुख्य ध्येय है, जब हम राग और विराग से दूर वीतराग हो जाते हैं-निर्गुण, सगुण ते परे, तहां कबीरा ठाढ़.

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