राजनैतिक दलों को जनता की स्पष्ट चेतावनी

जनता ने अपना फैसला सुना दिया, लेकिन यह केवल फैसला नहीं है, चेतावनी भी है। यह चेतावनी राजनीति के आकाश पर साफ-साफ लिखी है और पढ़ी जा सकती है, बशर्ते कांग्रेस पार्टी और सरकार के पास इसे पढ़ने और समझने का व़क्त हो। इस समय कांग्रेस और मनमोहन सरकार के आसपास भांड़ों का मेला है जो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर साबित करने में जुटे हैं कि उन्होंने तो कांग्रेस के जीतने की पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी, अब ये भांड़ राजनीति की मलाई में मुंह मारना चाहते हैं। इन भांड़ों ने पहले भाजपा को जिताया, बाद में दोनों को बराबर दिखा कर अस्थिरता की भविष्यवाणी की, अब ये रोज़ झूठ बोलकर कांग्रेस को गुमराह कर रहे हैं। ये भांड़ ही कांग्रेस की चरणवंदना और प्रशस्तिगान करते-करते उसे मदहोशी का ज़हर पिलाएंगे, और नशे में कर इतने ग़लत काम करा देंगे जिससे जनता कांग्रेस के ख़िला़फ खड़ी हो जाएगी। चारण अपनी भंड़ैती की पराकाष्ठा पर चले गए हैं और कांग्रेस को भरोसा दिला रहे हैं कि उसने 206 नहीं बल्कि चार सौ चौदह सीटें जीत लीं हैं, जो इतिहास में केवल एक बार राजीव गांधी ने जीती थीं। हमें दुख है कि पत्रकारिता में ऐसे चारणों की भरमार हो गई है जो केवल एक सिद्धांत में भरोसा करते हैं कि उन्हें सरकारी पार्टी में रहना है, फिर सरकार चाहे कांग्रेस की बने या भाजपा की या किसी और की। यह समस्या कांग्रेस की है कि वह नशा पिलाने वालों को अपने आसपास इकट्ठा क्यों कर रही है, क्यों इनके जाल में फंस रही है और क्यों अपने शुभेच्छुओं से दूर हो रही है।

हम कांग्रेस को अप्रिय सत्य बताना चाहते हैं। उसे इन चारणों और भांड़ों से हटकर इस बात पर सोचना चाहिए कि पिछले सालों में हुए सभी विधानसभा चुनावों में हार के बावजूद क्यों जनता ने उसे लोकसभा में सबसे ब़ड़ी पार्टी के रूप में जिताया। इतना ही नहीं, जनता ने कमरतोड़ महंगाई पर भी ध्यान नहीं दिया। दालों की क़ीमत, गेहूं, चना, ज्वार, बाजरा, मसाले, तेल यहां तक कि चीनी का भाव भी कांग्रेस के नेता चाहें तो पता कर लें। पांच हज़ार या उससे कम कमाने वाले देश में करोड़ों हैं, उनकी चाय में चीनी नहीं पड़ती, वे नमक डालकर चाय पी रहे हैं। बेरोज़गारी का हाल बताने की ज़रूरत नहीं, हर चौथे घर में कोई न कोई बेकारी का शिकार है। इसी मई में ही करोड़ों नौकरियां गईं, क्योंकि कंपनियों ने मंदी का बहाना बना छंटनी कर दी है। नौजवान बेराज़गारों को किसी क़ानून की मदद का भरोसा नहीं है।

इसके अलावा किसान अपनी खाद को लेकर परेशान है, जो उसे इस बार बहुत महंगी दर पर ब्लैक में मिलेगी। क़र्ज़ के जाल से निकलने का उसके पास कोई रास्ता नहीं है। क़र्ज़ माफी उसे तात्कालिक राहत दे गई, पर किसान को मालूम है कि क़र्ज़ के जाल में उसे दोबारा फंसना ही है, क्योंकि वित्त मंत्रालय की नीति ही उसे इस जाल में जकड़े रहने की है। मज़दूरों के काम के दिन घटते जा रहे हैं, हालांकि सरकार ने ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना चलाई है जिस का फायदा बड़े तबके को हुआ, लेकिन तीन सौ पैंसठ दिन में केवल सौ दिन काम की गारंटी और वह आमदनी भी महंगाई की भेंट चढ़ जाती है।

ऐन मौके पर देश में बोफोर्स केस का खुलासा और सिख दंगे को लेकर कांग्रेस के सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को निशाना बनाना तथा कांग्रेस का इसका मज़बूती से मुक़ाबला न करने ने अच्छा असर नहीं छोड़ा। टैक्स की भरमार और साढ़े चार साल तक अक्षम गृहमंत्री के सहारे देश चलाना, चुनाव जीतने का लक्षण नहीं था। परमाणु डील पर उपजे संदेह को देश के लोगों ने दिमाग़ में रखा, लेकिन उसे बाहर नहीं आने दिया।

ऐसी सूची की भरमार है, लेकिन कांग्रेस को सोचना चाहिए कि इस सबके बावजूद क्यों जनता ने उसमें भरोसा दिखाया और सबसे ब़ड़ी पार्टी के रूप में संसद में स्थापित किया। जिस तरह सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने संयत और शांत चेहरे से प्रचार किया उसने देश के लोगों में विश्वास पैदा किया। राहुल गांधी ने, साथ में सोनिया गांधी ने विकास की बात की, ग़रीब भारत की बात की जिस पर लोगों ने भरोसा किया। इनके चेहरों पर नफरत नहीं थी, मुठ्ठियां नहीं बंधी थीं, और भाषा शालीन थी। कांग्रेस बुढ़िया पार्टी है, कांग्रेस गु़िड़या पार्टी है-के जवाब को, जिसे प्रियंका ने दिया, लोगों ने ज़्यादा पसंद किया। कांग्रेस के पक्ष में हिंदू संत और मुस्लिम सू़फी खुलकर सामने आ गए और उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया कि विश्व हिंदू परिषद और धर्म रक्षा मंच अपने दड़बे से बाहर ही नहीं निकल सके।

कांग्रेस के पक्ष में लोगों की राय इसलिए सबसे ज़्यादा बनी कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने साफ कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनना है, जबकि बाकी दलों में कई-कई प्रधानमंत्री पद के दावेदार घूम रहे थे। भारत की जनता ने इन्हें इसलिए पसंद किया क्योंकि ऐसे लोग कम होते हैं जो सत्ता हाथ में रहते हुए सत्ता के शीर्ष पर नहीं जाते। और यही संकेत जनता का है कि कांग्रेस को चाटुकारों, चापलूसों और भांड़ों के बहकावे में आकर मदहोेश नहीं हो जाना चाहिए। उसके सामने चुनौतियां हैं, प्राथमिकता पर उसे महंगाई और बेरोज़गारी को रखना होगा। सही प्रशासन, कमज़ोर वर्गों के लिए योजनाएं, किसान क़र्ज़ में न फंसे और खेती को लाभकारी बनाना भी उसे प्राथमिकता में शामिल करना होगा। दलित, अल्पसंख्यक अपने को सुरक्षित समझें, आर्थिक विकास का फायदा मिले तथा राजनीतिक प्रक्रिया में उन्हें हिस्सेदारी मिले, यह कांग्रेस का प्राथमिक कर्तव्य हैै। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है अब और आर्थिक घोटाले न हों। कालाधन देश में वापस लाने की कोशिश होती दिखाई दे, क्योंकि लोगों ने भाजपा की कालाधन वापस लाने की योजना पर भरोसा नहीं किया है।

कांग्रेस अगर इन संकेतों को पढ़ती और समझती है तो उसके लिए देश में हर जगह प्यार और समर्थन है, लेकिन नहीं समझती है तो उसे परेशानियों का सामना करने को तैयार रहना चाहिए। जनता ने उसे कुछ ऐसा समर्थन दिया है जो शेर की सवारी जैसा है। जनता का समर्थन उसे ख़तरे में न डाल दे, इसकी ज़िम्मेवारी कांग्रेस की है। इसलिए उसके लिए मदहोश होने की घड़ी अभी नहीं आई है।

भाजपा को भारत की जनता ने साफ-साफ संदेश दिया है जिसे भाजपा समझना चाहती है या नहीं, अभी नहीं कह सकते। भाजपा ने इस चुनाव में आडवाणी जी को सामने रख हज़ारों करोड़ों खर्च किए। उनके प्रधानमंत्री बनने का इतना प्रचार किया कि भाजपा का हर कार्यकर्ता सचमुच समझने लगा कि अब आडवाणी जी प्रधानमंत्री बनेंगे ही नहीं। उसके पड़ोस में ही हलचल हो रही थी, लोग उकता रहे थे, ऊब रहे थे लेकिन भाजपा नेता इस ऊब को समझ ही नहीं रहे थे।

क्या-क्या नहीं कहा- तीन लाख तक का इनकम टैक्स माफ करेंगे, किसानों का क़र्ज़ माफ करेंगे, देश में कालाधन वापस लाएंगे, आतंकवाद का ख़ात्मा करेंगे, अ़फजल गुरु को फांसी देंगे, राममंदिर बनाएंगे, धारा तीन सौ सत्तर ख़त्म करेंगे और कॉमन सिविल कोड लागू करेंगे। क्या भाजपा को यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसके इन मुद्दों को भारत की जनता नकार रही है और चाहती है कि भाजपा नए मुद्दे तलाशे। वे मुद्दे जो भाजपा को समझ में नहीं आते, क्योंकि उसने चुनाव में विकास की, ग़रीबी की, महंगाई की, अशिक्षा और स्वास्थ्य के टूटे तंत्र की, कोई बात ही नहीं की। कांग्रेस नौजवानों को साथ लेने की और उन्हें देश का भविष्य बताने का अभियान चला रही थी, जबकि भाजपा अपने दल का नया वंशवाद गढ़ रही थी। अभी आडवाणी, फिर मोदी, फिर शिवराज सिंह चौहान, फिर अरुण जेटली, फिर।।।,फिर।।।भाजपा नेताओं की भाषा, उनकी मुद्राएं, उनके तेवर, उनके वायदे भारत के लोगों के मन में विश्वास नहीं पैदा कर सके। भाजपा का अभियान-राहुल गांधी के मुक़ाबले आडवाणी को रखना-मूर्खता की पराकाष्ठा थी। एक और बात, भाजपा देश को क्या विश्वास दिलाती, जब वह संघ को ही विश्वास नहीं दिला सकी। संघ का कार्यकर्ता चुनाव में भाजपा के पक्ष में निकला ही नहीं। रोज़ सुबह शाखाएं लगती थीं, लेकिन उन्हें मुहल्लों या गांवों में जाते तो किसी ने देखा नहीं।

भाजपा समझ सके तो समझे कि उसके प्रमुख मुद्दों को जनता नकार चुकी है, और उसे ऐसे चेहरे तलाशने में लगना होगा जो उसके आर्थिक एजेंडे को देश के सामने रख सकें और लोगों को विश्वास दिला सकें कि वे ग़रीबी, बेकारी और महंगाई के भी ख़िला़फ हैं।

भाजपा को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जहां उन्हें बुनियादी मुद्दे जो हिंदुस्तान की समस्याओं से जुड़े हों अपनाने पड़ेंगे। वहीं उन्हें यह भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि देश की बीस प्रतिशत आबादी को अपने दायरे से अलग रख कर वे कभी देश की संसद में बहुमत नहीं बना सकते। भारतीय जनता पार्टी का अब तक का इतिहास हिंदुस्तान के मुसलमानों के ख़िला़फ चलने का रहा है। उन्हें देश के मुसलमानों से संवाद स्थापित करना होगा और उनकी सस्याओं को हल करने की सार्थक योजना बनानी होगी। भाजपा को इस बात को भी समझ लेना चाहिए कि इस देश के हिंदू सांप्रदायिक नहीं हैं। और उसका भरोसा सर्वे भवंतु सुखिनः और सर्वे संतु निरामयाः में हैं। उसका भरोसा सबके सुख और सबकी उन्नति में है। इस देश के हिंदुओं को यही सनातन धर्म ने सिखाया है। जिस बात को इस देश का बच्चा-बच्चा जानता है उसे भाजपा क्यों समझना नहीं चाहती यह समझ में नहीं आता है। भाजपा को सनातन धर्म की आस्थाओं का क्यों पता नहीं है और वह हिंदू धर्म के नाम पर क्यों सनातन धर्म का अपमान करने पर तुली हुई है, क्योंकि धर्म तो हिंदू नहीं। सनातन है।

वामपंथी इसलिए नहीं हारे कि उनके मुद्दों में दम नहीं था, वे इसलिए हारे कि जिनका समर्थन उन्होंने चार सालों से ज़्यादा किया, अचानक उनसे अलग हट सरकार गिराने की कोशिश क्यों की। वामपंथियों की बात तो सरकार ने कभी नहीं मानी, तब क्यों वे नकली विरोध करते रहे। केरल की जनता सनकी मुख्यमंत्री से परेशान थी और बंगाल की जनता सरकार के किसान विरोधी रुख़ से। ममता बनर्जी वहां आम आदमी की आवाज़ बन गईं। बंगाल में हार का बड़ा कारण मुसलमानों का वामपंथियों को वोट न देकर ममता बनर्जी को वोट देना था। मुसलमान दो सालों से वाममोर्चे को स्पष्ट संकेत दे रहे थे, मीटिंगों में कह रहे थे, विमान बोस जैसे नेता बात समझते भी थे लेकिन बुद्धदेव भट्टाचार्य कुछ करना ही नहीं चाहते थे। उन्होंने जो वायदे मुसलमानों से किए, उन्हें अनदेखा कर दिया। अंत में, वामपंथी काडर जनता से दूर से दूर होता चला गया। बड़े प्रदर्शन या बड़ी सभाएं जनता के समर्थन की गारंटी नहीं होतीं, बस यही बात वामपंथी नहीं समझ पाए।

मायावती, मुलायम सिंह, लालू यादव और रामविलास पासवान के लिए जनता के संकेत साफ हैं। इन्हें जनता ने भरपूर समर्थन दिया, भरपूर साथ भी दिया। इनसे अपेक्षा थी कि ये समाज का शक्ति संतुलन बदलेंगे लेकिन साथ ही उस वग की दशा भी सुधारेंगे जिस वर्ग से आते हैं। इतना ही नहीं, ये अपने से कमज़ोर वर्गों को आर्थिक विकास में शामिल करने के साथ उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी भी देंगे। सत्ता सभी के पास आई, मायावती के पास अभी भी है लेकिन किसी ने विकास को प्राथमिकता नहीं माना। इन सभी को मुसलमानों का भरपूर समर्थन मिला लेकिन सबसे ज़्यादा तिरस्कार भी उन्हें झेलना पड़ा। इस बार सभी ने अपना बदला लिया। यह अपेक्षा बेकार है कि ये लोग जनता के संकेत को समझेंगे, और अगर नहीं समझेंगे तो अभी जहां हैं उससे भी बदतर स्थिति में पहुंचेंगे। इन्हें समझना चाहिए कि अब इनके समर्थक वर्ग विकास की भाषा नहीं सुनना चाहते, अपने घर और गांव में विकास देखना चाहते हैं। सभी के समर्थक दूर भागे हैं, यह संयोग नहीं है, यह मोहभंग है।

दक्षिण में जयललिता, राजशेखर रेड्‌डी और नवीन पटनायक। तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री के कामों को जनता ने सराहा और अपना समर्थन दिया। जयललिता समझती रही हैं कि उन्हें दिल्ली जाकर या तो प्रधानमंत्री बनवाना है या प्रधानमंत्री बनना है, पर जनता ने ख़ामोश करुणानिधि के कामों को सराहा।

जिन संकेतों को राजनोता नहीं समझेंगे उसके लिए केवल दुख प्रगट कर सकते हैं, जैसे अभी प्रगट किए जा रहे हैं। बाहुबलियों और अपराधियों को भी जनता ने नकार दिया है। यह पहली बार हुआ है कि लोग डरे नहीं और उन्होंने ख़ामोशी से अपराध के ख़िला़फ मत दे अपेक्षाकृत साफ लोकसभा चुन दी।

सत्ता में कांग्रेस है, इसलिए उसके सामने यही चुनौती है कि वह कैसे सत्ता में बनी रहे और अगले चुनाव में कैसे पूर्ण बहुमत ले आए। यह तभी हो सकता है जबकि वह जनता के पक्ष में सरकार चलाए। दलितों, अल्पसंख्यकों, कमज़ोर वर्गों, ग़रीबों और किसानों के पक्ष में ़फैसले ले। संपूर्ण विपक्ष के ख़िला़फ कांग्रेस का समर्थन कर जनता ने कांग्रेस पर बहुत भरोसा किया है। यह भरोसा टूटना नहीं चाहिए। भरोसा टूटने के बाद जनता का ़फैसला बहुत निर्मम होता है, इसे आडवाणी जी और भाजपा से ज़्यादा कौन समझेगा।

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.