गलत रणनीति के कारण बिहार में कांग्रेस का बंटाढार

कांग्रेस ने बिहार में कभी लालू प्रसाद के कथित ‘जंगल राज’ का लगातार साथ देकर ग़लती की और अब वह लालू से दूर हटकर ग़लती कर रही है. अपनी ग़लतियों के कारण लगातार दुबलाती और कुम्हलाती बिहार कांग्रेस यदि अब यह समझ रही है कि वह अकेले अपने बल पर कांग्रेस को बिहार में ताक़तवर बना सकती है, तो वह इस बार भारी ग़लतफहमी में है.
अगले कुछ महीनों में राज्य में 17 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं. इसमें कांग्रेस ज़रा अपने बल पर लड़ कर देख ले! उसको एक बार फिर अपनी वास्तविक ताक़त का अनुमान लग जाएगा. कांग्रेस कौन कहे, अभी तो राजद-लोजपा-कांग्रेस मिलकर भी बिहार में कोई चुनावी करिश्मा करने की स्थिति में नहीं हैं. हां, ये मिलकर काम करें तो देर-सवेर एक मज़बूत विपक्ष बन सकते हैं. लोकतंत्र के लिए मज़बूत विपक्ष ज़रूरी है. पर पता नहीं कांग्रेस को यह बात कब समझ में आएगी! जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उसकी सेहत के लिए उतना ही अच्छा होगा.
कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार पर विशेष ध्यान देगी. इससे बिहार के कांग्रेसी उत्साहित हैं. आने वाले दिनों में शायद राहुल गांधी बिहार में सक्रिय भी हों, पर यहां कांग्रेस के विकास की गुंजाइश काफी सीमित है. यहां तो कांग्रेस के अधिकांश वोट बैंक पर एनडीए का पहले ही क़ब्ज़ा हो चुका है. जब लालू-राबड़ी शासन के ख़िला़फ आवाज़ उठा कर कांग्रेस को अपना वोट बैंक बढ़ाने का अवसर था,  तब तो वह लालू प्रसाद से गलबहियां कर रही थी. अब यदि कांग्रेस को अपनी ताक़त बिहार में भी बढ़ानी है, तो उसे लालू-पासवान के वोट बैंक की आधारशिला पर ही ़िफलहाल खड़ा होना पड़ेगा. वैसे भी कांग्रेस इस्तेमाल करो और फेंको की नीति में विश्वास करती ही रही है. कांग्रेस जब लालू-राबड़ी के जंगल राज का अंध समर्थन कर रही थी, तब वह ऐसा भाजपा-विरोध के नाम पर कर रही थी. कांग्रेस कह रही थी कि लालू प्रसाद की मदद से ही सांप्रदायिक शक्तियों को मज़बूत होने से रोका जा सकता है.
पर कांग्रेस ने इस बात को भुला दिया कि जनता के समक्ष कौन-सी समस्या अधिक बड़ी और महत्वपूर्ण है? रोजी-रोटी, क़ानून का राज, सुशासन या फिर एकतरफा धमर्ंनिरपेक्षता का सवाल? बिहार की जनता ने इस बार भाजपा को लोकसभा की 12 सीटों पर विजयी बना दिया और कांग्रेस को दो सीटों पर समेट दिया. यानी जनता की मूलभूत समस्या को नज़रअंदाज करके सांप्रदायिकता के ख़तरे के भूत को खड़ा करना कांग्रेस के लिए कारगर नहीं रहा. अब यदि कांग्रेस को फिर से अपनी ताक़त बनानी है तो नए सिरे से अपनी रणनीतिक और राजनीतिक शैली पर पुनर्विचार करना पड़ेगा. यह काम तो राजद-लोजपा को भी करना पड़ेेगा. हालांकि राजद-लोजपा के लिए ख़ुद को बदलना काफी कठिन काम है. क्या लोजपा, कांग्रेस व राजद ऐसा कर पाएंगे?
कांग्रेस को इस लोकसभा चुनाव में बिहार में मात्र 10.26 प्रतिशत मत मिले, जबकि उत्तर प्रदेश में इस बार इस दल को 18 प्रतिशत वोट मिले. पर बिहार में कांग्रेस को मिले ये मत भी खांटी व स्थायी कांग्रेसी मत नहीं माने जा सकते. इन मतों में से कुछ मत कतिपय प्रभावशाली और प्रवासी उम्मीदवारों के कारण मिले. कुछ मत दो विजयी कांग्रेसी उम्मीदवारों के अपने निजी प्रभाव वाले मतों के कारण थे. पप्पू यादव की पत्नी रंजीता और साधु यादव को जितने मत मिले, क्या किसी अन्य व्यक्ति के भी वहां कांग्रेसी उम्मीदवार रहने की स्थिति में उतने मत मिलते? कुछ ऐसे भी मत इस बार कांग्रेस को बिहार में मिले, जो उसे बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में नहीं मिलेंगे. इसलिए कि वे मतदाता ऐसे हैं, जो एक तऱफ तो लालू-राबड़ी को बिहार में सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं, तो दूसरी ओर केंद्र में राहुल गांधी को मज़बूत बनाना चाहते हैं. पहले की अपेक्षा इस बार बिहार में कांग्रेस को  ब्राह्मण मत कुछ अधिक मिले. अटल बिहार वाजपेयी के दृश्य से बाहर हो जाने के कारण ब्राह्मणों को राहुल गांधी में उम्मीद की किरण नज़र आई. याद रहे कि इस लोकसभा चुनाव में बिहार में कांग्रेस को ब्राह्मणों के स़िर्फ 18 प्रतिशत मत मिले, जबकि राजग को बिहार में इस जाति के 69 प्रतिशत मत मिले. यानी अब भी बड़ी संख्या में ब्राह्मण राजग के साथ हैं. लालू प्रसाद को सत्ता में आने से रोकने के लिए बिहार विधान सभा के अगले चुनाव में ब्राह्मणों के और अधिक वोट राजग को मिलेंगे. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के 32 प्रतिशत वोट इस बार कांग्रेस को मिले हैं.
उत्तर प्रदेश में मायावती के कुशासन से लोगबाग उब रहे हैं. ब्राह्मण मतों के एक बार फिर नेहरू परिवार की ओर मुखातिब होने के कारण मुस्लिम मतों में कांग्रेस की ओर झुकाव देखा जा रहा है. यदि सचमुच राहुल गांधी को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करके कांग्रेस यूपी का अगला विधानसभा चुनाव लड़े तो वहां कांग्रेस सत्ता में आ सकती है. पर यही स्थिति बिहार में नहीं है. यहां सवर्ण मतों में, जो पहले कभी कांग्रेस के पास थे, अब अधिक असर राजग का है. नीतीश कुमार के सुशासन व विकास ने इन मतों को और मज़बूती से एनडीए से जोड़ दिया है. जब सवर्ण मत बिहार में कांग्रेस को कम मिलेंगे तो मुस्लिम मत भी कम ही मिलेंगे. अधिकतर मुस्लिम मतों का लक्ष्य तो भाजपा को हराना होता है. वह ताक़त तो लालू प्रसाद-रामविलास पासवान में थी और कभी भविष्य में बन सकती है.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को गत लोक सभा चुनाव में 21 सीटें भी मिलीं, जबकि बिहार में सिर्फ दो. वे दो सीटें भी कांग्रेस को अपने जनाधार के कारण नहीं, बल्कि इन उम्मीदवारों के व्यक्तिगत असर के कारण मिलीं. बिहार में कांग्रेस स़िर्फ दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. 30 सीटों पर तो उसके उम्मीदवारों की ज़मानतें तक ज़ब्त हो गईं. सासाराम से विजयी मीरा कुमार को 2004 के लोकसभा चुनाव में क़रीब चार लाख मत मिले थे. इस बार मात्र एक लाख 92 हज़ार. इस बार भाजपा उम्मीदवार मुनीलाल से मीरा कुमार के मतों का अंतर 43 हज़ार रहा, जबकि 2004 में यह अंतर दो लाख 58 हज़ार का था. तब राजद का कांग्रेस से चुनावी तालमेल था. यानी, लालू प्रसाद के प्रभाव वाले मतों के इस बार कांग्रेस से अलग हो जाने के बावजूद मीरा कुमार अपने निजी प्रभाव वाले मतों के बल पर जीत गईं. याद रहे कि उनके पिता जगजीवन राम यहीं से कांग्रेस से सांसद हुआ करते थे. उनका असर अब भी बाक़ी है. वह इस सीट से कभी नहीं हारे. 1984 में वह कांग्रेस में नहीं थे, तब भी वह किसी तरह हारते-हारते जीत गए थे. तब कांग्रेस की लहर थी.
इधर मुस्लिम बहुल क्षेत्र किशनगंज में कांगेेस की जीत पूरी तरह उम्मीदवार असरारूल हक़की व्यक्तिगत जीत है. इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार असरारूल हक़ को किशनगंज में दो लाख 39 हज़ार वोट मिले, पर जब वह 1998 में वहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे, तब भी उन्हें दो लाख 30 हज़ार मत मिले थे. एनसीपी उम्मीदवार के रूप में 1999 में असरारूल हक़ को एक लाख 97 हज़ार मत मिले थे. याद रहे कि सपा और एनसीपी का किशनगंज में अपना कोई ख़ास जनाधार नहीं है.
यानी कुल मिलाकर कांग्रेस में बिहार में अपने बलबूते पुनर्जीवित हो जाने की कोई ताक़त ़िफलहाल दिखाई नहीं पड़ती. उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार के नेतृत्व वाली यादव-ठाकुर अतिवादिता के कारण मायावती ने दलित-ब्राह्मण समीकरण बनाया. वहां ब्राह्मणों और ठाकुरों के बीच वर्चस्व को लेकर पुरानी प्रतिद्वंद्विता रही है. इसी कारण वह 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती विजयी रहीं. पर अब उत्तर प्रदेश में मायावती के कुशासन के कारण उपजे असंतोष से कांग्रेस को लोक सभा चुनाव में इस बार बढ़त मिली. वैसे भी राहुल गांधी के रूप में ब्राह्मणों को नेहरू परिवार से एक नेता मिल गया है. आम ब्राह्मणों में जो भावना राहुल गांधी के प्रति देखी जा रही है, वह सोनिया गांधी के प्रति नहीं देखी गई. पर यूपी से अलग बिहार में नीतीश सरकार के ख़िला़फ अभी कोई जन असंतोष नज़र नहीं आ रहा है. ऐसा सुशासन, बेहतर क़ानून-व्यवस्था व विकास के कारण हो रहा है. हां, शिक्षकों की बहाली में गड़बड़ी हो रही है. कदाचार के आधार पर प्राप्त अंक पत्रों को शिक्षक की नौकरी का आधार बना दिया गया है. इसलिए बहाल हो रहे अधिकतर शिक्षक अयोग्य हैं. राजस्व बढ़ाने के लिए राजग के सत्ता में आने के बाद बिहार में जगह-जगह शराब की दुकानें खोलने की अनुमति राज्य सरकार ने दे दी है. इससे समाज की सेहत बिगड़ रही है, तो उदंडता बढ़ रही है. हालांंकि हाल में नीतीश सरकार ने यह ़फैसला किया है कि अब शराब की नई दुकान खोलने की अनुमति नहीं मिलेगी. पर पहले ही इतनी अधिक दुकानें खुलवा दी गई हैं कि इनमें से अनेक दुकानों को बंद कराने के लिए भी जन आंदोलन की ज़रूरत है.
सरकारी दफ्तरों में बढ़ रही घूसखोरी के ख़िला़फ बिहार में जनांदोलन किया जा सकता है, पर कोई भी कारगर जनांदोलन लालू-पासवान की मदद के बिना कांग्रेस नहीं चला सकती. अब भी लड़ाकू  राजनीतिक जमात लालू के पास ही है, जिसका लाभ कांग्रेस उठा कर नीतीश सरकार को परेशानी में डाल सकती है. उसके साथ राजग के विरोध में ख़ुद को एक शालीन व अनुशासित विकल्प के रूप में पेश कर सकती है. याद रहे कि राजनीति से अपराधियों के धीरे-धीरे सफाए के बाद अब कांग्रेस की तरह अपेक्षाकृत शालीन राजनीति को बिहार की जनता देर-सवेर पसंद करेगी. लालू की राजनीति शालीन नहीं रही है. ख़ुद को सुधारने की क्षमता उनमें काफी कम है. हालांकि राज्य में कोई आंदोलन हो, तो राजद, लोजपा और कांग्रेस के वैसे कार्यकर्ता और नेता छंट जाएंगे जो स़िर्फ सत्ता की मलाई खाने के लिए ही किसी दल में रहा करते हैं. इनमें से कई लोग सत्ताधारी राजग की ओर रुख़ भी कर रहे हैं.
किसी बड़े जन असंतोष की अनुपस्थिति मेेंं किसी जातीय समूह को नीतीश कुमार के प्रभाव से खींच कर अपनी राजनीतिक ताक़त बढ़ा ले, यह कांग्रेस के लिए ़िफलहाल संभव नहीं दिख रहा है. इसलिए कि नीतीश कुमार जैसा दिन रात काम करके रिजल्ट देने वाले मुख्यमंत्री विरले होते हैं.
वैसे भी अपनी भारी हार के बाद लालू प्रसाद इन दिनों  कुंभला गए हैं. हर छोटी-बड़ी हार के बाद वह थोड़े ठंडे पड़ ही जाते हैं. केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करके कांग्रेस ने लालू को उनकी औकात बता दी है. तब से वह और भी विनम्र व दबे-दबे नज़र आ रहे हैं. ऐसे भी चारा घोटाले से संबंधित जारी मुकदमों के कारण लालू प्रसाद ़िफलहाल कांग्रेस से झगड़ा नहीं कर सकते. हां, राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि मुकदमों से निपट लेने के बाद उन्हें भाजपा से भी मिल कर राजनीति कर लेने में कोई परहेज नहीं होगा, यदि कांग्रेस के छुटभैया नेतागण लालू प्रसाद का मज़ाक उड़ाना जारी रखेंगे और कांग्रेस उनसे तालेमल नहीं करेगी तो.
लालू प्रसाद को नज़दीक से और अधिक दिनों से जानने वाले लोग जानते हैं कि लालू प्रसाद को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए लचीलापन अपनाने में कभी कोई झिझक नहीं हुई. भागलपुर का दंगा 1989 में हुआ था. उस साल के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद लोकसभा के लिए चुन लिए गए थे. तब भाजपा और कम्युनिस्टों के समर्थन से केंद्र में वीपी सिंह की सरकार चल रही थी. बिहार में भी विधानसभा का चुनाव होने को था और लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. उन्हें लगा कि बिहार में भी भाजपा की मदद लेनी पड़ेगी. इस पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद ने लोकसभा में तब अपने भाषण में कहा था कि भागलपुर दंगे में भाजपा या आरएसएस का कोई हाथ नहीं है. उनके इस भाषण के टैक्स्ट को बाद में बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता यशवंत सिन्हा ने सदन में सुनाया था. याद रहे कि यशवंत सिन्हा तब इस बात पर नाराज़ थे कि दंगा जांच रपट में यह आरोप लगाया गया कि भागलपुर दंगे के लिए आडवाणी ज़िम्मेदार थे. लालू शासनकाल में जब भागलपुर दंगे की जांच रपट प्रकाशित हुई, तब तक लालू प्रसाद को अपनी सरकार चलाने के लिए भाजपा की मदद की ज़रूरत नहीं रह गई थी. उन दिनों पटना के राजनीतिक हलकों में यह अफवाह भी गर्म था कि यदि लालू प्रसाद को कांग्रेस ने अधिक परेशान किया, तो वह कोई चौंकाने वाला राजनीतिक क़दम भी उठा सकते हैं. इसलिए कांग्रेस को लालू प्रसाद की इस टिप्पणी से संतुष्ट हो जाना चाहिए था कि कांग्रेस से चुनावी तालमेल नहीं करना हमारी भूल थी.
राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कांग्रेस ने लालू प्रसाद का गर्म दिमाग़ ठंडा करने के लिए और उन्हें सबक़ सिखाने के लिए यह अच्छा किया कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया. इससे बिहार कांग्रेस के कई नेता व कार्यकर्ता खुश हैं. वे लालू प्रसाद से दुखी चल रहे हैं, क्योंकि गत लोक सभा चुनाव के समय लालू प्रसाद ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था.  पर वह तो बीती बात हो गई. अब यदि कांग्रेस लालू के साथ मिल कर नीतीश सरकार के ख़िला़फ बिहार में अभियान नहीं चलाएगी, तो कांग्रेस को बाद में लालू प्रसाद की तर्ज पर ही यह अफसोस ज़ाहिर करना पड़ेगा कि लालू प्रसाद को दुत्कार कर हमने भूल की. वैसे कांग्रेस यदि यह काम अभी नहीं करना चाहती है तो वह बिहार विधान सभा के 17 उपचुनावों में भी अकेले अपना भाग्य अजमा कर देख ले. हाल में लोक सभा चुनाव के बाद हुए फतुहा विधानसभा उप चुनाव में भी कांग्रेस उम्मीदवार की ज़मानत ज़ब्त हुई. वहां भी जद-यू की जीत हुई. वहां लालू-पासवान की मिलीजुली ताक़त की भी हार हुई है. अब बिहार की राजनीति के महाबली लालू नहीं, बल्कि  नीतीश हैं. कांग्रेस को तो अब बिहार में अपनी उपस्थिति जताने के लिए वर्तमान महाबली के ख़िला़फ पूर्व महाबली को साथ लेकर ही राजनीति करनी पड़ेगी. यदि कांग्रेस समझती है कि लालू प्रसाद को साथ लेने के कारण उसकी छवि ख़राब होगी तो यह तर्क भी अनेक लोगों को सही नहीं लगता है. इसलिए कि कांग्रेस ने द्रमुक का साथ लेने के लिए तो करुणानिधि परिवार के सदस्यों की छवि का कोई ध्यान नहीं रखा. हाल में भी कांग्रेस ने बिहार में लोकसभा चुनाव में कुछ विवादास्पद लोगों को टिकट देने के मामले में भी अपनी छवि का कोई ध्यान नहीं रखा.

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