मदद के नाम पर धूल झोंक रहा है अमेरिका

अमेरिकी संसद के विदेश मामलों की समिति ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के  लिए दी जाने वाली रक़म में तीन गुना वृद्धि करते हुए मामले को अमेरिकी संसद के  दोनों सदनों में बहस के  लिए भेज दिया है. वहां से स्वीकृति मिलने के  बाद लगभग 1.5 बिलियन डॉलर की सहायता राशि पाकिस्तान को अगले पांच साल तक अमेरिका द्वारा दी जाएगी. इस सहायता राशि को अमेरिकी कांग्रेस की मंज़ूरी से पांच साल से अधिक समय के  लिए बढ़ाया भी जा सकता है.  अमेरिकी सीनेटर जॉन केरी और रिचर्ड लौगर के  सर्वदलीय प्रस्ताव से तैयार किए गए इस विधेयक में पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता के  लिए जो शर्तें रखी गई हैं, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मसार करने वाली हैं. वहीं जॉन केरी इस बात का भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार कर रहे हैं कि उनके  प्रस्ताव में पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि में किसी तरह की कोई शर्त नहीं रखी गई है. लेकिन वास्तविकता यह है कि इस विधेयक में अमेरिकी संसद द्वारा कई ऐसे प्रस्ताव दिए गए हैं जो किसी भी देश के  लिए अपमानजनक हैं और जिन पर ग़ौर करना ज़रूरी है. सबसे पहले तो अमेरिका इस प्रस्ताव और मदद की धनराशि के  ज़रिए दुनिया भर को यह बताना चाहता है कि वह पाकिस्तान की जनता का हितैषी है और इतनी बड़ी धनराशि तो वह  पाकिस्तान की जनता के  बेहतर और सुरक्षित जीवन के लिए दे रहा है. यह अपने आप में हास्यास्पद है. सहायता धनराशि के  इस प्रस्ताव को सदन में भेजते हुए अपनी प्रेस कॉफ्रेंस में समिति ने कहा कि इस क़ानून को बहुत ही सघनता से पारित करना होगा और इसे समय-समय पर ऑडिट भी करते रहना होगा. जिसके लिए समिति का तर्क है कि वह पाकिस्तान की जनता का हितैषी है और वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इस सहायता धनराशि का सीधा ़फायदा पाकिस्तान की जनता को मिले, जिसके  लिए वह दी जा रही है. इसके  ज़रिए अमेरिकी सरकार पाकिस्तान की जनता को क्या यह संदेश देना चाहती है कि पाकिस्तान सरकार और न्यायिक व्यवस्था नागरिकों के  हितों को नहीं समझती. क्या पाकिस्तानी नागरिकों को उसका हक़ दिलाने को अब विदेशी सरकार अपना कर्तव्य मानेगी और वह अब पाकिस्तान सरकार की भूमिका में इस कदर आ जाएगी कि वह नागरिकों का नुमाइंदा बन जाए?  वहीं इस क़ानून की असलियत कुछ और ही कहानी बयान करती है. इस सहायता के पीछे अमेरिकी शर्तों  पर ग़ौर करें तो तस्वीर ख़ुद-ब-ख़ुद साफ हो जाती है. अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान सरकार अमेरिकी जांच दल को इस बात की खुली छूट दे कि वह उन लोगों पर नज़र रख सके  जो दुनिया भर में नाभकीय शस्त्रों की ख़रीद- ़फरोख्त में लिप्त हो सकते हैं. लिहाजा पाकिस्तान सरकार अमेरिकी ख़ु़िफया एंजेंसी को पाकिस्तान में अपना नेटवर्क फैलाने की इजा़ज़त दे. अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान सरकार ऐसे लोगों को देश के बाहर यात्रा करने पर पाबंदी लगाए, जो भविष्य में किसी अन्य देश को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी बेच सकते हैं. विधेयक में इस संदर्भ का साफ मतलब है कि अमेरिका एक बार फिर से पाकिस्तान में एक हीरो की भूमिका अदा करने वाले ए. क्यू ख़ान पर शिकंजा कसना चाहता है. इस विधेयक का दूसरा आपत्तिजनक पहलू पाकिस्तान को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों की कतार में खड़ा करने का है. इस विधेयक के ज़रिए अमेरिकी सरकार चाहती है कि वह पाकिस्तान की आर्थिक और सैन्य मदद इसलिए करे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके  कि पाकिस्तान ऐसे लोगों या समूहों की मदद नहीं कर रहा है जो पड़ोसी मुल्कों में आतंकवाद को चला रहे हैं. लिहाजा इस शर्त के  ज़रिए अमेरिका यह साबित करना चाहता है कि पाकिस्तान सरकार अफ़ग़ानिस्तान और भारत में आतंकवाद को संचालित करता है और उसे अब यह बात क़बूल करके  इस तरह के  सभी संगठनों पर लगाम कसने और उन्हें ख़त्म करने की ज़रूरत है. अमेरिका चाहता है कि आज जब उसकी ख़ुद की नीतियों के  चलते आतंकवाद दुनिया भर के  लिए ख़तरा बन चुका है, ऐसे में वह सारी ज़िम्मेदारी पाकिस्तान के  सिर पर डाल सके  और तालिबान व अलक़ायदा जैसे संगठनों का पाकिस्तान से सीधा तार जोड़ सके. अमेरिकी कोशिश है कि वह दुनिया भर को यह साबित कर दे कि पाकिस्तान आज आतंकवादियों के लिए एक स्वर्ग बन चुका है. लिहाजा आतंक के  ख़िला़़फ उसकी जंग में पाकिस्तान एक बड़ा ख़तरा है, जिससे निपटने के  लिए पूरी दुनिया को एक साथ होना ज़रूरी है. इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि पाकिस्तानी सैनिकों को अमेरिकी ट्रेनिंग दी जाए. इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में उन पाकिस्तानी सैनिकों को शामिल करने की बात है जो पाकिस्तान के  न्यूक्लियर टेस्ट के  बाद प्रतिबंध के चलते अमेरिका से ट्रेनिंग नहीं ले पाए. इसके  ज़रिए अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तानी सेना में वह अपनी पैठ सीधे तौर पर बना सके  और ज़रूरत पड़ने पर देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को अलग करते हुए वह आतंक के  ख़िला़फ युद्ध में सेना से सीधे संपर्क में रह सके. इस विधेयक में यह भी साफ है कि अमेरिका को दी जाने वाली सैनिक सहायता सीधे तौर पर पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों को ख़त्म करने, आतंक के  नेटवर्क का सफाया करने और वह भी तब दी जाए जब पाकिस्तान अपनी तऱफ से इस आतंकी नेटवर्क को पूरी तरह समाप्त कर दे. इन सभी शर्तों पर सावधानी पूर्वक ग़ौर करें तो साफ है कि इस विधेयक में कई ऐसी बातें कही गई हैं जो किसी भी पाकिस्तानी के  लिए शर्मनाक है और वह किसी क़ीमत पर अमेरिका की इन शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं होगा. विधेयक की कुछ बातें सीधे पाकिस्तान को कठघरे में खड़ी करती हैं. इसमें एक साज़िश की बू आती है, जिसके  तहत अमेरिका पाकिस्तानियों को आतंकवादी और आतंकवादियों के  लिए एक सुरक्षित पनाहगार घोषित करना चाहता है. वे  यह साबित करना चाहते हैं कि पाकिस्तान के  राजनीतिज्ञों और सरकारी अफसरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके  साथ ही वे पाकिस्तान के  कुछ अहम लोगों को देशद्रोही भी साबित करना चाहते हैं, जबकि देश की जनता उन्हें अपना मसीहा मानती है. मसलन, अमेरिका चाहता है कि वह एक बार फिर से डॉ. ए. क्यू. ख़ान पर अपना शिकंजा कसे और उनके  ऊपर साफ तौर पर निगरानी रखे. सवाल यह उठता है कि अगर अमेरिका पाकिस्तान में इस कदर दखलंंदाज़ी कर सकता है तो क्या हमारे हुक्मरानों को अमेरिका द्वारा इज़राइल को किए जा रहे न्युक्लियर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर सवाल नहीं उठाना चाहिए या फिर ख़ुद अमेरिका  को इस मामले में अपनी सफाई दुनिया के  सामने नहीं रखनी चाहिए? इन शर्तों के  साथ अगर अमेरिका पाकिस्तान को आतंक के  ख़िला़फ युद्ध में मदद करना चाहता है तो यहां सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान कैसे आतंकवादियों की चपेट में आ गया?  क्या इसके  लिए अमेरिका की नीतियां और अफ़ग़ानिस्तान में जारी नाटो का युद्ध कारण नहीं है? क्या इसके  लिए अमेरिकी द्रोन मिसाइलों का पाकिस्तान के  रिहाइशी इलाक़ों पर गिराया जाना ज़िम्मेदार नहीं, जिसमें हज़ारों बेगुनाह पाकिस्तानी मारे जा रहे हैं. जबकि इस बात को ख़ुद अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी मान चुकी हैं कि पाकिस्तान की इस हालत के  पीछे तीस साल की अमेरिकी नीतियां ज़िम्मेदार हैं. अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के  फैलाए आतंक और फिर उसके  ख़ात्मे की कोशिश के  चलते आज पाकिस्तान का नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस और क़बाइली इलाक़े आतंकवादियों का अड्‌डा बन चुके हैं. इस अंतरराष्ट्रीय समस्या से लड़ने के  लिए पाकिस्तानी सेना मोर्चा संभाले हुए है. अब तक के  इस युद्ध में हज़ारों पाकिस्तानी सैनिक और अफसर अपनी जान गंवा चुके  हैं. क्या इन सैनिकों की क़ुर्बानी इसलिए है कि अमेरिका पाकिस्तानी सेना पर सवाल खड़ा करे और उस पर आतंकवादियों के साथ सांठगांठ का आरोप लगाए?  वहीं इस युद्ध का शिकार पाकिस्तानी नागरिक बन रहे हैं. लाखों की संख्या में आज पाकिस्तानी नागरिक अपना सब कुछ गंवा कर शरणार्थी  कैंपों में रहने के  लिए आ रहे हैं. इस युद्ध के  चलते पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आज चरमरा चुकी है. इन सबके बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान एक आतंक को पनाह देने वाला देश लगता है. अपने हज़ारों सिपाहियों की जान को दांव पर लगाकर और लाखों नागरिकों की जिंदगी को ख़तरे में डालकर जो देश आतंक के  ख़िला़फ इस युद्ध में अपनी भूमिका अदा कर रहा है, क्या उसके  लिए ऐसे शब्द सही हैं और क्या उस पर मुसीबत की इस घड़ी में ऐसी शर्तें लागू करने को उचित ठहराया जा सकता है?  क्या दुनिया के  तमाम देश महज़ तमाशा देखते रहेंगे और पाकिस्तान को अपनी समस्याओं से ख़ुद ही निज़ात पाना होगा? हमारी अमेरिका के  साथ-साथ उन सभी देशों से अपील है कि उन्हें अपनी ग़लती के  अहसास मात्र से कुछ नहीं होगा और अपनी ग़लतियों को पाकिस्तान के  सिर मढ़ने से समस्या ख़त्म होने के  बजाए और बढ़ ही सकती है. तालिबान के  ख़िला़फ जारी इस जंग के  इतिहास को देखा जाए तो इससे पहले भी जब-जब पाकिस्तान ने तालिबान के  ख़िला़फ कार्रवाई की है, तालिबान और शक्तिशाली और आक्रामक तेवर के  साथ उभरा है.  लिहाजा पाकिस्तान की आर्थिक मदद के  साथ-साथ उन लाखों लोगों के  पुनर्वास को प्राथमिकता देनी होगी जो सीधे तौर पर आतंक के  ख़िला़फ इस पश्चिमी युद्ध से प्रभावित हो रहे हैं. आज इस युद्ध में वह घर-बार सहित अपनी रोजी-रोटी के  लिए दर-दर भटक रहे हैं, और अगर उन्हें जल्द पाकिस्तान सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद नहीं दी गई तो उनके  सामने एक तऱफ भूख, लाचारी और बेबसी होगी और दूसरी तऱफ एक ऐसी उम्मीद, जो इन्हें अपने पेट के लिए किसी भी रास्ते पर जाने को मजबूर  कर देगी.

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