भीड़ से डर लग रहा है वामपंथियों को

आइला प्रभावित इलाकों में राहत नहीं पहुंचने से उफना आक्रोश

वे दृश्य किसी के लिए मनोरंजक थे तो किसी का गुमान पापड़ की तरह चूर-चूर कर देने वाले. 33 सालों से राज कर रहे वामपंथियों ने शायद इसकी कल्पना न की होगी. 25 मई को राज्य में आए  चक्रवाती तूफान आइला के बाद भूखे-प्यासे कई रातें गुज़ार देने वाले पीड़ित समझ नहीं पा रहे हैं कि 33 साल पहले क्या उन्होंने ही ऐसी संवेदनहीन सरकार को चुना था? चक्रवात के आठ-दस दिन बाद तक लाखों लोगों तक राहत सामग्री पहुंचने और उसके वितरण में राजनीतिक भेदभाव के आरोपों के बीच वामपंथियों की दुर्गति के दृश्य चर्चा के विषय बने हुए हैं.
दो जून को उत्तर 24 परगना के हिंगलगंज में लोगों ने वहां के विधायक गोपाल गायन को पकड़कर कीचड़ में टहलाया. वह तूफान के नौ दिन बाद अपनी जनता का हाल-चाल पूछने गए थे. नाराज़ लोगों के हाथों में झाड़ू व चप्पल भी थे. हालात बेहद ख़तरनाक थे. एक ऐतिहासिक अपमान वाली वारदात हो सकती थी. आख़िर में माकपा वालों के हाथ-पैर जोड़ने के बाद लोगों ने विधायक जी को सिर व कुर्ते पर कीचड़ पोतकर छोड़ दिया. इसी जगह कुछ देर बाद एक विद्यालय में चल रहे राहत शिविर में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्‌टाचार्य पहुंचे तो लोगों ने 32 साल के विकास का ब्योरा मांग दिया. मुख्यमंत्री सफाई देने लगे और लोगों ने उन्हें झिड़क दिया. सारे मंत्री-संतरी बगलें झांकने लगे. लोग पूछ रहे थे कि बगल की नदी ने जो कहर बरपाया है, उस पर बांध कब बनेगा? अभी 31 मई को मुख्यमंत्री गोसाबा इलाक़े में थे. कमरे में बैठा एक ‘सर्वहारा’ जब कुछ ज़्यादा नाराज़ हो गया तो मुख्यमंत्री बिफर उठे और कहा, अगर तुमने मुंह बंद नहीं किया तो मैं कमरे से बाहर निकलवा दूंगा. हालांकि बाद में जनता ने गुस्सा बीडीओ अमिय भूषण चक्रवर्ती पर निकाला और उनके कपड़े फाड़ दिए. एयरकंडीशंड वाम दुर्ग  में झक सफेद धोती-कुर्ता पहनकर विराजमान रहने वाले मुख्यमंत्री कीचड़ व पसीने की उमस भरे राहत शिविरों के दौरे कर जनता को दिलासा दे रहे हैं, पर ऐसा लगता है कि कुछ देर हो गई है.
जनता के आक्रोश से प्रशासन कितना घबराया हुआ है, इसकी मिसाल पहली जून को दक्षिण 24 परगना जिले में बासंती में देखने को मिली, जब अधिकारियों ने राहत कार्य में लगे मज़दूरों को प्रखंड कार्यालय में लगे एक कमरे में बंद कर दिया और उन्हें मुख्यमंत्री के वापस लौटने के बाद ही बाहर निकाला. हालांकि प्रशासन का तर्क था कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया. राज्य के मानवाधिकार संगठनों ने इस करतूत की निंदा की. यहां तक कि राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष एन. सी. सील ने कहा कि अगर इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज़ कराई जाती है तो वह ज़रूर कार्रवाई करेंगे. सवाल इठता है कि क्या अधिकारियों को डर था कि मुख्यमंत्री राहत बंटवारे की गति के बारे में न पूछ दें. कैसी विडंबना है कि एक समय अपनी जनसभाओं में ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ देखकर ख़ुश होने वाले माकपा नेताओं को अब भीड़ से डर लगने लगा है.
दक्षिण 24 परगना के सुंदरवन के 14 ग्राम पंचायतों में से 12 पंचायत बुरी तरह तबाह हैं. 50 हज़ार घर टूट गए हैं और क़रीब ढाई लाख लोग खुले आसमान के नीचे आ गए हैं. बंगाल में धान काटकर फिर धान ही बोया जाता है और चक्रवात से लाखोंं हेक्टेयर में लगी ़फसल तो डूब ही गई है, घरों में रखा धान भी पानी से सड़ गया. लोगों के सामने पूरे साल के आहार की चिंता है. कृषि वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि चक्रवात प्रभावित इलाक़ों में भूमि की उर्वरता फिर से बहाल करने में भी कुछ समय लग जाएगा.
धीरे-धीरे पानी उतर रहा है और इसी के साथ बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ रहा है. एक मोटे प्रशासनिक अनुमान में बताया गया है कि केवल गोसाबा में ही 80 हज़ार नलकूप पानी में डूबे हुए हैं. प्रभावित इलाक़े के लोगों को भोजन, पानी और दवा की काफी ज़रूरत है. हालांकि दक्षिण 24 परगना के लिए सरकार ने सेना के 20 मेडिकल दल भेजे हैं. 25 मई को आए तूफान के बाद तीन जून को सेना के डॉक्टरों, इंजीनियरों, नौसेना के जहाजों व वायुसेना के विमानों को अलर्ट किया गया. यानी सरकार सात दिन तक नुकसान प्रभावित इलाकों का जायजा तक नहीं ले पाई थी. जनता के आक्रोश और बदनामी के बाद अब सरकार चेत गई है और युद्ध स्तर पर राहत चलाने का भरोसा दे रही है.
सुंदरवन व आसपास के इलाक़ों में आइला के घाव पर राहत में भेदभाव के आरोप नमक समान हैं. राज्य में राहत की राजनीति तेज़ हो गई है. दिल्ली में मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही ममता बनर्जी ने आपदा राहत के बारे में राजीव गांधी के फार्मूले-पीएम टू डीएम का हवाला दिया. उनका सुझाव इन आशंकाओं को लेकर आया कि वाममोर्चा सरकार राहत का उपयोग सही तरीक़े से नहीं करेगी. हालांकि राज्य सरकार ने इसका तीखा विरोध किया और अब तक की परंपरा के हिसाब से ही राहत बंट रहा है. वैसे प्वाइंट ज़ीरो से शिकायतें लगातार आ रही हैं. बाली पंचायत पर आरएसपी का क़ब्ज़ा है, जहां तृणमूल समर्थक भेदभाव की शिकायत कर रहे हैं. यह इलाक़ा जयनगर संसदीय क्षेत्र में आता है, जहां से इस बार तणमूल समर्थित एसयूसीआई को जीत मिली है. मथुरापुर सीट भी ममता ने वामपंथियों से छीनी है और इसका एक बड़ा इलाक़ा भी आइला की चपेट में है. वैसे, भेदभाव के आरोपों से प्रशासन व वाममोर्चा के नुमांइदे इंकार कर रहे हैं, पर धुंआ उठ रहा है तो समझा जा सकता है कि आग लगी है. सप्ताह में पांच दिन बंगाल में रहने वाले अपने फार्मूले पर अमल करते हुए ममता व उनके कुछ मंत्री आइला प्रभावित इलाक़ों में दौड़ लगा रहे हैं. ममता ने रेलवे के ज़रिए भी कुछ राहत सामग्री भिजवाई है. सुंदरवन के दुर्गम इलाक़े में राहत पहुंचाने में कुछ द़िक्कतें भी हैं, क्योंकि ज़्यादातर इलाक़ों में नौकाओं के ज़रिए ही जाया जा सकता है. सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव है, तो इसके लिए वाममोर्चा सरकार ही ज़िम्मेदार है. गोसाबा के कई इलाक़ों में नौका से राहत सामग्री उतार कर रिक्शा-वैन से भेजी जा रही है, क्योंकि मिनी ट्रकों का रास्ता नहीं है.
इसे एक महज़ संयोग कहेंगे कि राज्य में चुनावी तूफान से घायल वामपंथी अपनी चोट सहला ही रहे थे कि राज्य में आइला का कहर बरप गया. राहत वितरण की लचर इंतज़ाम व भेदभाव के आरोपों को देखते हुए सरकार अगर अब भी नहीं चेती तो 2011 का विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं है.

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