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करकरे की मेहनत बेकार करने वालों की जांच क्यों नहीं

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हेमंत करकरे को मालेगांव बम विस्फोट की जांच सौंपी गई थी. हेमंत ने जांच को पूर्णता पर ले जाने के क्रम में अपने संघ के सूत्रों का इस्तेमाल किया. हेमंत करकरे के पिता कमलाकर करकरे वामपंथी विचारधारा के थे, जबकि मां कुमुदिनी करकरे आरएसएस की बेहद सक्रिय और वरिष्ठ सदस्य थीं. हेमंत करकरे पर अपनी मां की छाप ज़्यादा थी और वह अक्सर संघ मुख्यालय में जाया करते थे.

म लोगों में बहुत से ऐसे होंगे जिन्हें पिछली छब्बीस नवंबर को मुंबई में हुए आतंकी तांडव की याद होगी. हो सकता है कई ऐसे भी हों, जो इसे भूल गए हों. उस हमले में हमारे कई जांबाज़ शहीद हुए थे. हेमंत करकरे उनमें से एक थे. हेमंत करकरे की पत्नी ने घटना के तीन महीने के बाद कहा था कि ङ्गगोली से नहीं, सियासत से शहीद हुए हेमंत करकरेङ्घ. क्यों कहा था कविता करकरे ने ऐसा, उस समय हम नहीं समझ पाए, पर आज हमें उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए.

हेमंत करकरे को मालेगांव बम विस्फोट की जांच सौंपी गई थी. हेमंत ने जांच को पूर्णता पर ले जाने के क्रम में अपने संघ के सूत्रों का इस्तेमाल किया. हेमंत करकरे के पिता कमलाकर करकरे वामपंथी विचारधारा के थे, जबकि मां कुमुदिनी करकरे आरएसएस की बेहद सक्रिय और वरिष्ठ सदस्य थीं. हेमंत करकरे पर अपनी मां की छाप ज़्यादा थी और वह अक्सर संघ मुख्यालय में जाया करते थे. उनके संपर्क संघ, विहिप और बजरंग दल के नेताओं से इसी कारण से थे, जिनका उन्होंने मालेगांव बम विस्फोट की जांच की तह में जाने के लिए बख़ूबी इस्तेमाल किया. हेमंत करकरे के सामने सवाल था कि वह अपनी आस्था का ध्यान रखें या अपने कर्तव्य पालन का, और करकरे ने अपनी धार्मिक आस्था को एक तऱफ रख कर्तव्य पालन की कठोर चुनौती को अपना आदर्श बनाया. हेमंत करकरे की जांच में तथ्य खुलने लगे. उनके पास साध्वी प्रज्ञा के ख़िला़फ पुख्ता और पर्याप्त सबूत इकट्‌ठे हो गए. हेमंत करकरे की टीम के सामने दयानंद पांडे ने 29 सितंबर के मालेगांव धमाके में शामिल होने की बात भी क़बूल कर ली. हेमंत करकरे एटीएस के मुखिया थे और एटीएस ने काफी साख बना ली थी. उसने हेमंत करकरे की निगरानी में इस बात की सावधानी बरती कि आरोपियों के बयान को अदालत से मान्यता मिल जाए.
हेमंत करकरे ने अपनी शहादत से पहले इसे पूरी तरह पुख्ता कर लिया था कि दयानंद पांडे ही वह शख्स है जिसने साध्वी प्रज्ञा सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के साथ मिलकर मालेगांव विस्फोट की साज़िश रची थी. कर्नल श्रीकांत पुरोहित, रामजी, राइका, सुनील डांगे, अभिनव भारत के संस्थापक सदस्य समीर कुलकर्णी, अजय राहिरकर, राकेश धावड़े, संजय चौधरी, राहुल पांडे, दिलीप पाटीदार, शिवनारायण सिंह, श्यामलाल साहू, धावले, रमेश उपाध्याय के क़बूलनामे और उनकी निशानदेही पर हासिल किए गए सबूत अदालत में सभी आरोपियों को अपराधी साबित करेंगे, इसका भरोसा करकरे को था. सभी आरोपियों के बयान पुलिस उपायुक्त के सामने दर्ज़ किए गए थे, जिन्हें मकोका अदालत ने मंज़ूर भी कर लिया था.

कर्नल पुरोहित ने कुछ आरोपियों को मिथुन चक्रवर्ती के नाम से नांदेड़ में जब बम बनाने की ट्रेनिंग दी थी, तब भी उनका रिश्ता साध्वी प्रज्ञा से था. करकरे ने पता लगा लिया था कि यह गिरोह न केवल मालेगांव धमाके में शामिल था बल्कि 2006 में नांदेड़ में हुए धमाकों में, 2003 में अजमेर धमाकों में, 2004 में जालना और परभणी बम धमाकों में तथा 2007 में पुणे के खिड़की स्थित वाइनयार्ड चर्च पर हमलों का भी ज़िम्मेदार है. हेमंत करकरे ने यह भी पता लगा लिया था कि समीर और साध्वी प्रज्ञा के पुराने रिश्ते थे, क्योंकि दोनों ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य थे.

हेमंत करकरे की जगह आए एटीएस चीफ के.पी. रघुवंशी ने पहला बयान तो यह दिया था कि जांच उसी दिशा में चलेगी जिसे हेमंत करकरे ने तय किया था. पर हुआ उल्टा. सभी आरोपी मकोका से बरी हो गए और अब साधारण न्यायायिक हिरासत में हैं. के.पी. रघुवंशी और महाराष्ट्र सरकार की स़िफारिश के बाद शहीद हुए लोगों को अशोक चक्र से सम्मानित किया गया, लेकिन शहीद सिपाही शिशिर शिंदे को केवल कीर्ति चक्र दिया गया.

हेमंत करकरे यहीं नहीं रुके. उनकी जांच ने उन्हें बताया कि साध्वी प्रज्ञा ने पंचमढ़ी, मध्य प्रदेश में अरबी और चीनी भाषा सीखी, जिसके लिए शिक्षक कर्नल पुरोहित ने उपलब्ध कराए. अहमदाबाद के एक आश्रम में पांच सौ लोगों को आतंक फैलाने की ट्रेनिंग भी कर्नल पुरोहित ने ही दी थी. हेमंत करकरे की जांच में साबित हुआ कि इस ग्रुप का नेटवर्क भारत से बाहर इस्लामिक देशों तक फैला हुआ था. वहां दहशत फैलाने का प्रशिक्षण तो दिया ही जाता था, साथ ही आर्थिक मदद भी दी जाती थी. विदेशों में फैले इनके साथी इन्हें आरडीएक्स भी उपलब्ध कराते थे. हेमंत करकरे ने इस बात की भी जांच की थी कि भारत में सक्रिय कुछ देशों की खुफिया एजेंसियों की नांदेड़ और मालेगांव बम धमाकों में क्या कोई भूमिका थी? कुछ भारतीय साधुओं और एक देश के खुफिया अधिकारियों के बीच क्या कोई तालमेल था? हेमंत करकरे की मौत के बाद इस बात की जांच नहीं हुई कि मुंबई की उस इमारत में, जिसमें ज़्यादातर इज़राइली नागरिक रहते थे, कैसे दो आतंकवादी दो महीनों तक रहे, वहां खाना व हथियारों का ज़खीरा इकट्‌ठा करते रहे और किसी को पता ही नहीं चला.
हेमंत करकरे शहीद हो गए. बहसें चलीं, अख़बारों में शंकाएं भी आईं कि उनकी मौत कैसे हुई, लेकिन कोई जांच नहीं हुई. पर जिस बात पर सबसे ज़्यादा आश्चर्य है, वह यह कि हेमंत करकरे की सारी मेहनत पर पानी कैसे फिर गया. हेमंत करकरे ने इन सारे आरोपियों पर मकोका लगवाने के लिए स़िफारिश की थी. संघ, विहिप और बजरंग दल से जुड़े लोगों ने हेमंत करकरे पर काफी घटिया आरोप लगाए थे. हेमंत करकरे की शहादत के बाद इन आरोपियों पर मकोका लगा, लेकिन आरोप इतने लचर लगाए गए कि उन्हें अदालत ने मकोका लगाने लायक माना ही नहीं. अदालत में महाराष्ट्र पुलिस और सरकार ने कैसी पैरवी की कि उन पर से मकोका हटाने का अदालत ने निर्णय दे दिया. या तो आरोप लगाने में ही कोई चूक हो गई या फिर आरोपों को साबित करने में पुलिस और वकीलों ने असावधानी बरती. सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही मीडिया ने कोई छानबीन की कि यह कैसे हो गया.
हेमंत करकरे की जगह आए एटीएस चीफ के.पी. रघुवंशी ने पहला बयान तो यह दिया था कि जांच उसी दिशा में चलेगी जिसे हेमंत करकरे ने तय किया था. पर हुआ उल्टा. सभी आरोपी मकोका से बरी हो गए और अब साधारण न्यायायिक हिरासत में हैं. के.पी. रघुवंशी और महाराष्ट्र सरकार की स़िफारिश के बाद शहीद हुए लोगों को अशोक चक्र से सम्मानित किया गया, लेकिन शहीद सिपाही शिशिर शिंदे को केवल कीर्ति चक्र दिया गया. शिशिर शिंदे सीएसटी पर तैनात थे, जहां उन्होंने हमलावरों का डट कर मुक़ाबला किया और शहीद हो गए. आख़िर में हेमंत करकरे के हिंदुत्व के बारे में. एक हिंदुत्व प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित का है जो निरपराधियों की हत्या कर दहशत फैलाता है और दूसरा हिंदुत्व हेमंत करकरे का है जो उन्हें कर्तव्य पर डटे रहने की प्रेरणा देता है, यहां तक कि जान देने में भी आगे रहना सिखाता है. हेमंत करकरे के हिंदुत्व से प्रज्ञा और पुरोहित जैसे लोग भले सीख न लें लेकिन लाखों प्रेरित होंगे, पर कहीं न कहीं शर्म भी आएगी कि शहीद हेमंत करकरे की मेहनत पर जानबूझ कर पानी फिर गया और हमारी सरकार ने वकीलों और पुलिस अधिकारियों पर ज़िम्मेदारी तय नहीं की, जिनकी लापरवाही की वजह से मकोका हटा. अगर ऐसा ही रहा तो ये अपराधी आसानी से छूट जाएंगे, क्योंकि हमारी क़ानून-व्यवस्था का दुरुपयोग अक्सर होता है, और अपराधी शान से आज़ाद घूमते रहते हैं. अभिनव भारत की अध्यक्ष हिमानी सावरकर हैं, जो नाथू राम गोडसे के भाई की बेटी हैं और वीर सावरकर की बहू. इसी संगठन ने मालेगांव सहित कई जगहों पर धमाकों की साज़िश रची. आज भी यह संगठन काम कर रहा है. क्या कोई इस पर नज़र रख रहा है या हमें अभी कई और धमाकों का इंतज़ार है, जिसमें बेकसूर मारे जाने वाले हों?

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