कश्मीर की जनता को उमर अबदुल्ला से अतिशुद्धता नहीं चाहिए, उन्हें तो बस अपने लिए एक बेहतर ज़िंदगी चाहिए. जीवन का मतलब सुरक्षा, बुनियादी सुविधाएं और आत्मसम्मान की सलामती से है. युवा उमर की ईमानदारी और आशावान व्यक्तित्व से काफी उम्मीदें जगी हैं, जो ख़तरनाक भी हैं, क्योंकि बड़ी उम्मीदों से ही बड़ी निराशा भी पैदा हो सकती है.
हमारे सार्वजनिक जीवन में कुछ ही रसीले स्कैंडल होते हैं. ऐसा इसलिए नहीं है कि हमारे नेता बहुत संयमी हैं, बल्कि इसलिए कि जनता ज़रूरी तौर पर सेक्स को स्कैंडल से जोड़ कर नहीं देखती. मज़े की बात यह है कि राजनेता अब भी सोचते हैं कि यौन संबंधी आरोप लगाना जायज़ है. ख़ासकर अगर आप उमर अब्दुल्ला की तरह अच्छे दिखते हैं, तो इस तरह की बाधाएं तो आनी ही हैं.
तो, उमर के जल्दबाज़ी में दिए गए इस्ती़फे का क्या मतलब है? जब आप कश्मीर के चंचल पानी में प्रवेश करते हैं तो आप कभी न कभी पानी के अंदर की चट्टान से अपना अंगूठा घायल कर ही लेंगे. उमर की जल्दबाज़ी में एक अपरिपक्वता दिखती है. उनके पिता फारूक़-जो अपनी जवानी के दिनों में डल झील के आसपास मोटरसाइकिल की रेस लगाने के लिए मशहूर रहे हैं-ने इसका एक बेहतर रास्ता निकाल लिया होता, ताकि जनता भी आश्वस्त हो जाती और विपक्ष पर हंसती ही. हालांकि हंसने के लिए सबसे ज़रूरी यह जानना है कि कैसे और उससे भी अहम यह कि कब
हंसना है.
उमर ने इस्ती़फे की पेशकश की, क्योंकि वह इन आरोपों के साथ काम नहीं कर सकते थे. आख़िर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि वे जब तक आरोपों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक और भी मेहनत करके काम करते रहें. सभी मान रहे थे कि वह निर्दोष हैं. मतदाताओं ने उन्हें काम करने के लिए वोट दिया था, न कि इसलिए कि वह विधानसभा की
खींचतान में भावुक हो जाएं.
आमतौर पर हमारे देश में लोग राजनीतिज्ञों की निजी ज़िंदगी से सरोकार नहीं रखते. वास्तविक स्कैंडल तो वह होता है जो राजनेता खुलेआम करता है. भ्रष्टाचार आजकल निंदनीय कृत्य नहीं है. सब कुछ खुलेआम है. यह दोनों दिशाओं में काम करता है. आज संत होने से आप चुनाव नहीं जीत सकते. न ही किसी की निजी ज़िंदगी पर कीचड़ उछालने से आपको कुछ ज़्यादा राजनीतिक लाभ मिलेगा.
हालिया इतिहास में जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी के बाद सबसे बड़े नाम हैं. उनके ऊपर उस दौर में ऐसे आपत्तिजनक आरोप लगते थे जिसकी कल्पना उस दौर में नहीं की जा सकती थी. उनके विश्वसनीय निजी सचिव एम ओ मथाई ने जनता के बीच कुछ विवादित मुद्दों को नेहरू की मौत के बाद रखा. इन आरोपों और विवादों से जीवित रहते हुए नेहरू कभी विचलित नहीं हुए और न ही उनकी मौत के बाद इन विवादों ने उनकी साख पर कभी सवालिया निशान लगाया. महात्मा गांधी ने भी कभी किसी खोजी प्रवृत्ति के इंसान की ज़रूरत नहीं समझी जो उनके निजी जीवन को जनता के सामने रखता. यह काम गांधी ने ख़ुद ही अपनी जीवनी में बड़ी ईमानदारी और दक्षता के साथ कर दिया. वह किताब आज़ादी के अठारह साल पहले ही प्रकाशित कर दी गई, और उसे राजनीति से संन्यास लेने के बाद धनार्जन करने के लिए नहीं रखा. किताब में किए ख़ुलासे के बाद भी अंग्रेजी हुक़ूमत गांधी से उभरते ख़तरे को थामने के लिए कुछ नहीं कर सकी. आख़िर ऐसा क्यों?
हमारे देश में भी लोग गॉसिप में उतनी ही रुचि रखते हैं जितना किसी दूसरे देश में. लेकिन जब व़क्त़फैसला करने का हो, तो इन मुद्दों को वे दरकिनार कर देते हैं. वे राजनेता जो चारित्रिक हस्तक्षेप की चुनौतियों को झेल लेते हैं, शिखर तक पहुंच जाते हैं. वहीं चरित्रवान अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में विफल हो जाते हैं, क्योंकि वे राजनीति के खेल की चुनौती में विफल हो जाते हैं.
कश्मीर की जनता को उमर अबदुल्ला से अतिशुद्धता नहीं चाहिए, उन्हें तो बस अपने लिए एक बेहतर ज़िंदगी चाहिए. जीवन का मतलब सुरक्षा, बुनियादी सुविधाएं और आत्मसम्मान की सलामती से है. युवा उमर की ईमानदारी और आशावान व्यक्तित्व से काफी उम्मीदें जगी हैं, जो ख़तरनाक भी हैं क्योंकि बड़ी उम्मीदों से ही बड़ी निराशा भी पैदा हो सकती है. इस समय एक चेतावनी भी दे दूं-निराशा राजनीति का स्वाईन फ्लू है. एक और चूक उमर को कभी भी घेर सकती है.
तो क्या उमर अपना संतुलन खो बैठे? राजनीति में ़फौलादी इरादों का कोई ख़ास लाभ नहीं, लचीले इरादे ज़्यादा ़फायदेमंद होते हैं. उमर जनवरी से इस पद पर हैं और इसलिए अभी सत्ता संभालने में थोड़ी अनिश्चितता दिखती है. सार्वजनिक जीवन में प्रशासन नेता की अनिश्चितता को तुरंत जनता तक पहुंचा देता है. ऐसे मुद्दों पर भीड़ जुटाने में माहिर नेता किसी भी समय ऐसी सरकार को मुश्किलों में डाल सकते हैं. इससे बचने का कोई गणित नहीं है. अनुभव इसमें एक हद तक ही मदद कर सकता है. युवा नेताओं में वह स्व-महत्व का भाव देखने को मिलता है जो उस कहावत में छुपा है, जिसे राष्ट्रपति ट्रूमैन बार-बार दोहराते थे-द बक स्टाप्स हेयर (पैसा यहीं रुकता है). मेरे पास इससे बेहतर सुझाव है. अगर आप ज़्यादा पलटियां खाते हैं, तो आप फ्लॉप हो जाते हैं.
कश्मीर की राजनीति बेहद प्रासंगिक है. पाकिस्तान इसकी हर हलचल पर नज़र रखता है. उमर और महबूबा मुफ्ती के रूप में जो नई पीढ़ी उभर कर आई है, एक सवाल खड़ा करती है. क्या वे अगली पीढ़ी को सेकुलर, प्रजातांत्रिक और समृद्धि की ओर बढ़ते भारत के साथ भावनात्मक और मानसिक एकीकरण की ओर लेकर जाएंगे या फिर एक बंद गली की ओर? उनकी क्षमता, भाषा और सोच पर बहुत कुछ निर्भर करता है. यह उनकी परंपरा में मिली क़िस्मत से उनकी मुलाक़ात है, वे प्रजातांत्रिक राजनीति की पहली ही बाधा से हार नहीं मान सकते. शहीद बनने के लिए इस्ती़फा देना संतों का काम है. शहीदों के लिए मौत ही सबसे अहम है. कश्मीर को तो ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए जो ज़िंदगी दे सके.
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