ममता जी, ज़रा आम आदमी की असली परेशानी भी सुनिए.

आदरणीया ममता जी,
आपने अपनी रेल में हर तबके को जगह देने की कोशिश की है. रेल बजट में कई घोषणाएं भी की हैं. तुरंतो ट्रेन चलाने की बात की है तो ग़रीबों को इज्ज़त नवाजी है. युवाओं से लेकर महिलाओं, छात्रों, बुज़ुर्गों का ख्याल रखा है, लेकिन आसमानी घोषणाओं के बीच आम जनता की परेशानी कहीं पीछे छूट गई है.रेल में आम जनता को यात्रा करते व़क्त आम तौर कुछ परेशानियों से हमेशा रूबरू होना पड़ता है. ये परेशानियां हर ट्रेन में हर यात्रा में होती है. उन्हीं परेशानियों का ज़िक्र है. यह परेशानी आम यात्री की है, जो स्लीपर क्लास में सफर करता है. उम्मीद है आप ज़रा ध्यान देंगी.

किसी की यात्रा पहली परेशानी होती है टिकट की. ख़ास तौर पर त्यौहारों और गर्मियों में. ममता ने तत्काल बुकिंग की सीमा को पांच दिन से घटाकर दो दिन कर दी है, लेकिन इससे टिकट की समस्या का माकूल हल होता नहीं दिखता. जब से ई-टिकटिंग की व्यवस्था शुरू हुई है, तब से इंटरनेट के  ज़रिए बुकिंग कराने वाली रेलवे आरक्षण की दुकानें गली-मोहल्लों में खुल गई हैं. ये रेलवे आरक्षण वाले मुसाफिरों से मनमाने पैसे लेकर उनके  टिकट कंफर्म कराती हैं.कंफर्म्ड टिकट दिलाने के लिए इन लोगों ने अपनी सांठगांठ रेलवे के भीतर कर रखी है. ये अलग-अलग कोटों के ज़रिए यात्रियों के टिकट कंफर्म कराते हैं. अकेले रायपुर में ऐसी दर्जनों दुकानें हैं. जहां यात्रा से एक दिन पहले ली गई टिकट गारंटी के साथ कंफर्म की जाती है, वहीं सीधे रास्ते से दस या बारह वेटिंग नंबर वालों का टिकट कंफर्म नहीं होता. यह समस्या दिखने में छोटी हो सकती है, लेकिन रोज़ाना सैकड़ों लोग इसे झेलते और लुटते हैं. जो टिकट विशेष लोगों और विशेष परिस्थितियों के लिए होते हैं, उसका इस्तेमाल रेलवे में बैठे लोग दो नंबर के पैसे बनाने के लिए कर रहे हैं.

टिकट न मिलने की दूसरी वजह है. एजेंट और दलालों का फैला जाल. आप नई दिल्ली स्टेशन चले जाइए. आरक्षण केंद्र के अंदर और बाहर आपको कई दलाल मिल जाएंगे जो स्लीपर को दो सौ से तीन सौ और एसी के पांच सौ से सात सौ रूपये ज़्यादा लेकर कंफर्म टिकट देते हैं. हां, हो सकता है कि ये यात्रा आपको किसी दूसरे के नाम से करनी पड़े. ये दलाल इस बात से अच्छी तरह वाक़ि़फ होते हैं, कि कौन सी ट्रेन में टिकट का टोटा होता है. इन टिकटों की बुकिंग ये अलग-अलग नामों से पहले ही करा लेते हैं. इसके लिए इनके  कारिंदे रोज़ाना रिज़र्वेशन की लाइन में लगे होते हैं. अलग-अलग ट्रेनों में अलग-अलग नाम से ये टिकट लेते हैं और फिर मुसाफिरों को ये टिकट बेच देते हैं. कुछ तो अपनी पैठ इतनी अच्छी बना लेते हैं कि वो काउंटर के अंदर बैठकर फर्जी नामों से टिकट बनवाते हैं.

यात्रियों को अगली द़िक्क़त झेलनी पड़ती है ट्रेन में यात्रा करते व़क्त, द़ि़क्कत होती है टीटीई की मनमानी से, अगर आपका टिकट कंफर्म नहीं है और अगर आपकी वेटिंग एक से दस के बीच में हो तो आप आश्वस्त मत होइए कि आपको सीट मिल जाएगी.  टीटीई टिकट उसी को देगा जो उसे हरे-हरे नोट देगा. दरअसल ये टीटीई भ्रष्टाचार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और कोई इनके  अधिकार पर हमला बोले, ये किसी भी सूरत में इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते.

मैं आपको हाल की घटना बताता हूं. मैं 16 जून को छत्तीसगढ़ संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में दिल्ली से बिलासपुर जा रहा था. टिकट तत्काल की थी. वेटिंग 6 और 7.  मुझे लगा सीट होगी तो मिल ही जाएगी. थोड़ी दूर के बाद देखा कई यात्री जिनकी वेटिंग पचास -साठ है, वे टीटीई के पास से सीट लेकर ख़ुशी-ख़ुशी लौट रहे हैं. मैं भी टीटीई के  पास पहुंचा. मैंने कहा- साहब मेरी वेटिंग 6 और 7 है, मेरी सीट कंफर्म नहीं हुई है और आपने उन लोगों को भी सीट दे दी, जिनके  पास जनरल की टिकट है. टीटीई साहब ने मुझे ऊपर से नीचे देखा. फिर बोले, आप कहां बैठे हैं?  मैंने कहा फलां बोगी में. इस पर बोले-वहीं बैठिए, मैं आ रहा हूं. मैं चुपचाप उनकी बातों पर यक़ीन करके चला गया, लेकिन मेरे बाद कई लोग गए और अपना टिकट कंफर्म करा आए.  इस बीच बगल में बैठे शख्स ने मुझे बताया कि कटनी से कोई बारात बुक है. उन्होंने क़रीब पचास सीटें बुक कराई हैं. वे सीटें टीटीई डेढ़ सौ रुपये में बांट रहा है.

इस बीच टीटीई साहब पास आए. मैंने उनसे दो सीट मांगी. उन्होंने छूटते ही कहा-300 रुपये. मैंने एक परिचित टीटीई का हवाला दिया, उनसे बात कराई तो उन्होंने इतनी रियायत दी कि बिना पैसे के  मुझे एक सीट देने को राज़ी हुए. लोगों की जेब पर डाका डालने वाला वह टीटीई मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैंने उसके  पैसे चुरा लिए हों. जब मैंने उसे कहा कि मेरी वेटिंग 6 और 7 नंबर की है, तो वह कह रहा था कि सीट मैं एक ही दूंगा, मुझे बाक़ी लोगों को भी देखना है…ऐसे बोला जैसे वह ट्रेन का टीटीई न हो, ट्रेन उसके  बाप की हो, और इसका सारा सिस्टम उसकी रखैल हो. जिसे जैसे चाहे वह नचा सकता हो.  बहरहाल, मैंने सीट लेने से मना कर दिया. मैंने उसका नाम पूछा तो उसने नाम नहीं बताया. उसने नेमप्लेट भी नहीं लगाया था. जब मैंने उससे शिकायत करने को कहा तो उसने उलटा मुझे धमकी दी कि मैं तुम्हें चाहूं तो अभी अंदर करा सकता हूं. मैं उसकी गुंडागर्दी देखकर दंग रह गया. यह हाल स़िर्फ उस टीटीई का नहीं है या इस घटना का भुक्तभोगी स़िर्फ मैं ही नहीं हूं. आप सब भी कभी न कभी इस तरह के वाकये से दो चार होते होंगे. कोई टीटीई से लड़ता होगा और ज़्यादातर लोग नोट दे देते होंगे, लेकिन लोगों के  विरोध के  बाद इन टीटीइयों का यह गोरखधंधा बदस्तूर चलता रहता है. ममता जी, इस पर लगाम लगाने की व्यवस्था आप बजट में तो नहीं कर सकतीं, लेकिन बजट से बाहर इन बेईमान टीटीइयों पर लगाम कसिए.

तीसरी समस्या है खान-पान की. ममता जी, आपने एलान कर दिया है कि खाने में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय व्यंजनों को जगह मिलेगी और खाने की गुणवत्ता जांची जाएगी. लेकिन असल समस्या पैंट्री कार में मिलने वाला ऊंची क़ीमत पर घटिया खाना है. पहले 10 रुपये में दो समोसे मिलते थे, लेकिन अब 15 रुपये के मिलने लगे हैं और समोसे के भीतर क्या होता है…स़िर्फ आलू. साथ में लाल सॉस जैसा कुछ, जो दिखता तो लाल है लेकिन न मीठा होता है न खट्टा. आप अंबिकापुर में पुलिस लाइन वाले राजेश स्वीट्स के समोसे खाइये या हल्दीराम के  (एक जगह दो तरह की बेहतरीन चटनी मिलती है तो दूसरी जगह काजू किशमिश भरा हुआ समोसा), लेकिन फिर भी दोनों जगहों पर दो समोसे 10 रुपये में मिल जाएंगे.

दोनों जगहों का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं कि यहां के समोसे ही सबसे बेहतर होते हैं. इसी तरह सुबह नाश्ते में दो सूखे ब्रेड और कटलेट मिलता है-25 रुपये में. ब्रेड को ब्रेड बटर कहते हैं, लेकिन प्रयोगशाला में रिसर्च करा लीजिए तब भी आपको बटर नहीं मिलेगा. अब खाने की बात करते हैं. रेलवे का खाना माशाअल्लाह. पैसे आपसे लेंगे 35 और 60 रुपये, लेकिन खाना इतना घटिया कि भूख थोड़ी कम लगी हो तो गले से नहीं उतर सकता. चलिए अब आपको बताते हैं कि 35 रुपये वाला खाना कैसे 60 रुपये वाला खाना बन जाता है. 35 रुपये वाले खाने का 60 रुपया इसलिए लिया जाता है क्योंकि इसकी सब्ज़ी में तीन चार टुकड़े पनीर के डाले होते हैं. परांठे की जगह लंबी पतली रोटी होती है, जिसे ये लोग रूमाली रोटी कहते हैं. चावल में दो चार दाने जीरे के  डाल कर जीरा फ्राई कहते हैं और इस तरह हो जाती है स्पेशल थाली तैयार.  हालांकि क़ीमत आईआरसीटीसी की तय क़ीमत के मुताबिक है, लेकिन अव्वल तो ये रेट ज़्यादा हैं और दूसरे निर्धारित गुणवत्ता का पालन नहीं होता. ममता जी, पीने के पानी की समस्या भी बड़ी ज़्यादा है. गर्मी के दिनों में पानी कहीं ठंडा नहीं मिलता. नागपुर और झांसी में तीन रुपये में ठंडा मिनरल वाटर एक पाउच मिलता है. बाक़ी स्टेशनों पर ऐसे स्टॉल खोलने की ज़रूरत है.

इसके अलावा सफाई रेलवे की सदाबहार समस्या है. अगर बोगी पुरानी हुई तो उससे बदबू आती है. फिर कई डिब्बों में टॉयलेट काफी गंदा होता है और पानी की द़ि़क्क़त भी होती है. कभी पानी ख़त्म हो जाता है कभी टॉयलेट का पानी बोगी में बहने लगता है. हालांकि ये समस्याएं रोज़मर्रा की नहीं हैं, पर ऐसी समस्याएं खड़ी हों तो इससे निपटने के इंतज़ाम होेने चाहिए. जैसे एसी बोगी में साफ-सफाई का ज़िम्मा एटेंडेंट के  पास होता है. वैसा ही एक अटेंडेंट स्लीपर में भी होना चाहिए. इससे स्लीपर में साफ -सफाई रहेगी और यात्रियों की सुरक्षा भी बेहतर हो जाएगी. इसके बदले आप प्रति यात्री पांच रुपये ज़्यादा ले लें, तो न कोई यात्री नाराज़ होगा, न ही आपका वोटबैंक नाराज़ होगा. ममता जी, बजट में हमने तो आपकी बातें सुन लीं. अब आपकी बारी है तनिक हमारी भी सुन लें. एक आम आदमी

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