मानवाधिकार और राष्ट्रों की संप्रभुता

आज मानवाधिकार और उनका पालन या उल्लंघन वैश्विक महत्ता रखता है और सभी देश इनकीअहमियत से वाक़ि़फ हैं. हालांकि समस्या तब होती है, जब वैश्विक मानवाधिकारों के पालन से किसी देश की संप्रभुता से टकराव की स्थिति पैदा होती है. 1940 तक मानवाधिकार राष्ट्रों के अधिकार-क्षेत्र में थे. राष्ट्र की संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सर्वोच्च माना जाता था. संप्रभुता की सर्वोच्च शक्ति पर सवाल खड़े करने का कोई भी प्रयास दबाया जाता था.

1919 की वर्साय संधि में जर्मनी के कैसर विल्हेम द्वितीय सहित युद्ध के लिए ज़िम्मेदार सभी व्यक्तियों की जांच और सज़ा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल बनाने की बात थी लेकिन विजयी देशों ने इसे नहीं माना क्योंकि उन्हें इस तरह की किसी शक्ति का इस्तेमाल भविष्य में ख़ुद पर होने का डर था. इसी तरह आर्मीनिया में 1915 में हुए नरसंहारों के दोषियों को भी सज़ा नहीं दी जा सकी. पहले विश्व युद्ध में हुई इन ग़लतियों ने दूसरे विश्व युद्ध का रास्ता खोला. इससे सबक़ लेते हुए इसके बाद बड़े राज्याधिकारियों पर मुक़दमे के लिए अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनलों की व्यवस्था की गई.
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आने से चीज़ें और बदलीं. धीरे-धीरे मानवाधिकार के ख़याल ने सुरक्षा परिषद के फैसलों को दिशा दी. फिर भी संयुक्त राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी समस्या राष्ट्र की संप्रभुता और मानवाधिकारों का संतुलन बनाने की है. यह एक अहम और टेढ़ा सवाल है. हालांकि एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कभी-कभी संप्रभुता के नाम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दख़ल न देने को सही नहीं ठहराया जा सकता, ऐसी परिस्थितियां युद्ध अपराध, नरसंहार, तानाशाही की अतिवादिता के रूप में सामने आती रही हैं. कई मामलों में यूएन ने हस्तक्षेप भी किया. विभिन्न मानवाधिकार सम्मेलनों में तय किए मानदंडों ने भी इस मामले में अहम भूमिका निभाई है. हालांकि इस तरह के हस्तक्षेप के कई आलोचक भी हैं, जिन्हें लगता है कि यह तरीक़ा अप्रभावी है और अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सज़ा का कोई प्रावधान न होने की वजह से ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकता. हालांकि ऐसे आलोचक दूसरे प्रावधान जैसे अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों को भूल जाते हैं. इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून ऐसे अपराधों को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं रहे हैं लेकिन यह भी मानना होगा कि इस मामले में काफी तऱक्क़ी हुई है. दक्षिण अफ्रीका में अपार्थाइड का ख़ात्मा सफलता का एक ऐसा ही उदाहरण है.
यहां मानवाधिकार के क्षेत्रीय सिस्टमों पर भी ध्यान देना होगा, ख़ासकर यूरोपियन यूनियन. यह वैश्विक न्यायक्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय क़ानून में व्यक्ति की बदलती भूमिका को समझने के लिए ज़रूरी है.
19वीं सदी में राज्य की संप्रभुता और घरेलू न्यायक्षेत्र के सिद्धांत सर्वोच्च थे. जिन्हें आज मानवाधिकार कहा जाता है वह उस समय राज्य के क्षेत्राधिकार में थे. इसमें अहम बदलाव 1919 में लीग ऑफ नेशंस(राष्ट्रसंघ) बनने से आया. वर्साय की संधि के 13वें भाग में राष्ट्रसंघ के साथ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बनाने की बात भी थी. इस तरह राष्ट्रसंघ के बनने के साथ ही हम मानवाधिकारों और राज्य की संप्रभुता के लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सोच में बदलाव देखते हैं.
मानवाधिकारों के जुड़े क़ानून के विकास में दूसरे विश्व युद्ध का बड़ा प्रभाव रहा. यह युद्ध अबतक का सबसे भयावह और डरावना युद्ध था और अंतरराष्ट्रीय शांति और मानवाधिकार के लिए एक सिस्टम बनाने की ज़रूरत सबको साफ दिखाई दी. इस युद्ध के दौरान लोगों ने जो क्रूरता देखी, उसने मानवाधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को प्रतिबद्ध कर दिया.
यहां न्यूरेमबर्ग ट्रायल का उल्लेख ज़रूरी है. होलोकॉस्ट (नाजियों के द्वारा किए गए जुर्म) के मुजरिमों पर मुक़दमा चलाया गया. न्यूरेमबर्ग ट्रायल कई सिलसिलेवार मुक़दमे थे जो नाजी जर्मनी के अहम राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक नेताओं के ख़िला़फ चलाए गए थे. जर्मन शहर न्यूरेमबर्ग में हुए ये मुक़दमे 1945-1946 में पैलेस ऑफ जस्टिस में हुए थे. इस ट्रायल में बचाव पक्ष के वकीलों ने यह दलील दी कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून संप्रभु राष्ट्रों के कार्यों से जुड़ा है, ऐसे में आरोपितों पर अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता. ऐतिहासिक राज्य-केंद्रित नीति को छोड़ते हुए जजों ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए इन व्यक्तियों को अंतरराष्ट्रीय क़ानून की जद में करार दिया.
अब अगर कोई  अकेला व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय क़ानून की जद में है तो फिर उसे उसी क़ानून के तहत सुरक्षा पाने का भी हक़ भी है. इस तरह व्यक्ति स्तर पर जवाबदेही का यह फैसला अपने साथ ही मानवाधिकारों के प्रति अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना को भी जोड़े हुए है. इस तरह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के प्रति व्यक्ति की जवाबदेही उसे इनका संरक्षण का लाभुक भी बनाती हैं.
मानवाधिकार के सिद्धांत के विकास में न्यूरेमबर्ग एक अहम क़दम था. पहली बार व्यक्ति (इंडिविजुअल) के स्तर पर अधिकार और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के महत्व को माना गया. यह पहले की उस नीति से अलग था जिसमें लोगों को नहीं स़िर्फ राज्यों को ही इन क़ानूनों के क्षेत्र में समझा जाता था.
राज्य संप्रभुता और मानवाधिकार के संबंधों का जो वर्तमान स्वरूप हम देखते हैं, उसमें सबसे अहम संयुक्त राष्ट्र का गठन और उसके प्रयास थे. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दो मूल्यों- राज्य संप्रभुता के सम्मान के पुराने सिद्धांत और मानवाधिकार के सम्मान के नए सिद्धांत-को यूएन के चार्टर में एक साथ मिलाया गया. हालांकि यह मेल आसान नहीं रहा है और इसमें गतिरोध भी कम नहीं हैं.
यूएन चार्टर का अनुच्छेद 2(7) कहता है- इस चार्टर में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यूएन को किसी राष्ट्र-राज्य के घरेलू मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिले या सदस्यों को ऐसे मामले, यूएन के सामने लाने को मजबूर करे. इस भाग को पढ़ने से यह साफ लगता है कि यूएन किसी के आंतरिक मामले में कोई दख़ल नहीं देना चाहता. अंतरराष्ट्रीय क़ानून का मूल यह है कि कोई भी राष्ट्र दूसरे के मामले में दख़ल नहीं देगा और यह अनुच्छेद 2(7) में भी झलकता है.

यूएन का एक अहम मक़सद मानवाधिकारों की सुरक्षा है. यह लोगों को मानव के तौैर पर देखता है, किसी देश के नागरिक के तौर पर नहीं. मानवाधिकारों ने ही सुरक्षा परिषद की नीतियों की दिशा भी निर्धारित की है. हालांकि यह विकास आसान नहीं रहा है. कई दशकों तक परिषद कुछ ही घटनाओं में एकजुट होकर कोई प्रतिबंध लगा सकी. इनमें से एक अहम वाकया 1950 का है, जब परिषद ने देशों को हस्तक्षेप की इजाज़त दी और कोरियाई गणतंत्र (दक्षिण कोरिया) की संप्रभुता की रक्षा की. 1960 में परिषद ने कांगो की संप्रभुता की रक्षा के लिए वहां चल रहे एक घरेलू अलगाववादी संघर्ष के ख़िला़फ हस्तक्षेप किया.
मानवाधिकार की सुरक्षा के लिए उठाए क़दमों में अहम उदाहरण दक्षिण रोडेशिया (जिंबाब्वे) और दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकारों के ख़िला़फ लगाए प्रतिबंध थे. ये कुछ उदाहरण जहां यूएन ने यह स्वीकार करते हुए कि मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा ज़रूरी है, अतिवादी शक्तियों के ख़िला़फ काम किया. अब सवाल यह उठता है कि यूएन के पास इनके ख़िला़फ काम करने के लिए क्या तरीक़े हैं और यह क्या क़दम उठा सकती है?
कई सम्मेलनों और चर्चाओं के माध्यम से मानवाधिकारों से जुड़े कई समझौते, संधियां और दिशानिर्देश उभर कर सामने आए हैं. जब कोई राज्य/राष्ट्र इन संधियों को मानता है तो वह इन अधिकारों के पालन के लिए क़ानूनी तौर पर बंध जाता है. हालांकि संधियों पर हस्ताक्षर तो पहला क़दम ही है, इसका यह मतलब नहीं कि मनवाधिकार ज़मीनी स्तर पर भी लागू हो रहे हैं. इसी वजह से सदस्य देशों को समय-समय पर अपने यहां मानवाधिकारों की स्थिति की रिपोर्ट भेजनी पड़ती है.
इसके अलावा ग़ैर-सरकारी संगठन भी भरोसेमंद और स्वतंत्र सूचना का ज़रिया हैं. कई संगठनों ने अपनी रिपोर्ट के ज़रिए संधियों पर नज़र रखने वाली यूएन संस्थाओं, जैसे, महिलाओं के ख़िला़फ भेदभाव उन्मूलन समिति, महिला-स्थिति आयोग, मानवाधिकार के उच्चायुक्त आदि को मानवाधिकारों की स्थिति पर ख़ास नज़र रखने को मजबूर किया है.
सबसे महत्वपूर्ण शक्ति अंतरराष्ट्रीय दबाव की है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सबसे बड़ा डर वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा गंवाने का होता है.
कोई राज्य मानवाधिकारों की सुरक्षा के बिना पूर्ण संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता. मानवाधिकार और संप्रभुता की बराबर अहमियत से राज्यों पर दोतऱफा ज़िम्मेदारी पड़ जाती है-बाहर से अपनी संप्रभुता का सम्मान और आंतरिक तौर पर अपनी जनता का सम्मान और ख़ुशहाली बनाए रखना.
इस तरह से हम पाते हैं कि मानवाधिकार सिद्धांतों के विकास ने संप्रभुता के सिद्धांत पर बड़ा असर डाला है. जब कोई सरकार मानवाधिकारों की रक्षा में असफल रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके लिए दखलअंदाज़ी कर सकता है. यह दखलअंदाज़ी संप्रभुता को खंडित करने के लिए नहीं बल्कि यह याद दिलाने के  लिए है कि शासन का मतलब किसी भू-भाग का मालिक होना नहीं है, शासन के कुछ नियमों का पालन करना भी है. राज्य की संप्रभुता उसके नेताओं की नहीं उसके नागरिकों की संप्रभुता है. उम्मीद है कि यह मानव-आधारित सोच आने वाले वर्षों में और विकसित होगी और होलोकॉस्ट जैसी त्रासदी कभी दोहराई नहीं जाएगी

»लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *