पिथौरागढ़ में ज़मीन पर बरसी मौत


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देवभूमि उत्तराखंड के लिए प्राकृतिक आपदा एक नियति बन गई है. पिथौरागढ़ ज़िले के ला, झेकला और बेडूमहर गांव में आई आपदा ने रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ तहसील में आई ग्यारह वर्ष पहले की भीषण तबाही की याद दिला दी. पिछले एक दशक में आई सरकारों ने आपदा से निपटने के पुख्ता इंतजामों के बजाय उनके आने का इंतज़ार ही किया. सरकार की भूमिका स़िर्फ मुआवजा बांटने तक ही सीमित रही. ज़िला मुख्यालय पिथौरागढ़ से क़रीब 90 किलोमीटर दूर मुनश्यारी तहसील के तीन गांवों ला, झेकला और बेडूहार में रात ढ़ाई बजे के क़रीब मौत बन कर फटे बादल ने पूरे गांव में तबाही का मंजर बिखेर दिया. शुक्रवार की वह रात इन ग्रामीणों के लिए काली रात बन कर आई, जिसमें बादल फटने के बाद हुए भूस्खलन के मलबे में 43 लोग ज़मींदोज हो गए. इस दैवी आपदा का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि ला और झेकला गांव के एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा.
दाफा के ग्रामीणों के अनुसार शनिवार की सुबह पांच बजे जब वे लोग जागे तो ला और झेकला गांव का ऩक्शा ही पूरी तरह से बदला हुआ था. गांव के खेत मलबे से पटे हुए थे. ला गांव में कुल सात परिवार और झेकला गांव में कुल पांच परिवार रहते थे. इसमें क्रमश: 26 एवं 12 लोग मलबे में दब गए. शनिवार देर रात तक ला गांव में मलबे से चन्द्र सिंह, नंदन सिंह, जगदीश, बलवन्त, गंगा सिंह, लक्ष्मण सिंह, नवीन सिंह, त्रिभुवन सिंह और तुलसी देवी के शव को निकाला गया. चार शव जल से बह कर जाकुला नदी के किनारे पहुंच गए थे. वहां से कमला देवी, गोविंद सिंह, मोहन सिंह एंव विमला के शव बरामद किए गए. इस तबाही के शिकार मानवों के साथ ही भारी संख्या में पालतू जीव- जानवर भी हुए. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि ला गांव में कुल चार दर्जन बकरियां, एक दर्जन बैल, 10 गाय, चार भैस, दो बछड़े और एक दर्जन के  क़रीब कुत्ते-बिल्ली भी काल के गाल में समा गए. इस गांव की पांच सौ नाली (पहाड़ी इलाकों में ज़मीन की माप की इकाई) ज़मीन में बोई गई धान, सोयाबीन की ़फसल अब रेत और पत्थरों के ढेर में दफन हो गए हैं. झेकला गांव में दो बैल, चार गाय, एक भैस, चार बाछियां भी मलबे में दब गए. इस गांव की लगभग सौ नाली ज़मीन मलबे में पट गई. इन गांवों को जोड़ने वाले तीन पैदल पुल, पेयजल योजना, हाईटेंशन तार पूरी तरह से तबाह हो गए. फलदार पेड़ों और बाग- बगीचों का तो कहीं नामो निशान भी नहीं बचा.
सरकार ने मिलने वाले शवों का मौके पर ही पोस्टमार्टम करने की व्यवस्था के साथ 108 आपात वाहन पहुंचा दिए. बेडूमहर गांव पर भी इस आपदा का कहर टूटा, इस गांव के भी लगभग आधा दर्जन लोग मलबे की चपेट में आ कर घायल हो गए.

बार-बार टूटा है कहर

इस जगह के लोग बार-बार आई आपदा को याद कर सिहर उठते हैं. अगस्त 1977 में तवाघाट में 44 लोग मारे गए. वर्ष1983 में धामगांव के दस लोग मलबे में दब गए. वर्ष 1996 में बेरीनाम तहसील के केलकोट और रताली में भूस्खलन से 18 लोगों की मौत हुई थी. 1998 में मालपा गांव के हादसे को लोग आज भी भुला नहीं पाए हैं, इस हादसे में पांच दर्जन कैलाश यात्रियों सहित 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. 2000 में पिथौरागढ़ ज़िले के हुडकी गांव में भूस्खलन में 19 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. 2002 में टिहरी ज़िले की घनसाली तहसील की बुढ़ाकेदार क्षेत्र में आई दैवी आपदा में चार गांव के 28 लोग काल के गाल में समा गए थे, उसी वर्ष टिहरी ज़िले के एक गांव में बादल फटने से दस ग्रामीणों की मौत हो गई थी. 2007 में बरम में आई तबाही में डेढ़ दर्जन लोग मारे गए थे. 2008 में भी चमोली ज़िले के हेमकुंड मार्ग पर ग्लेशियर टूट कर गिरने के कारण 11 लोगों की मौत हो गई.

हादसे के बाद बस रस्मअदायगी

मुनश्यारी कीआपदा की ख़बर मिलते ही सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक उसी दिन घटनास्थल पर पहुंच गए.  उनके इस कार्यक्रम के चलते निश्चित रूप से बचाव राहत कार्य में भारी बाधा उत्पन्न हुई. इन आपदाओं में मारे गए लोगों के परिजनों को एक लाख रुपये की सरकारी सहायता दिए जाने पर सूबे का प्रतिपक्ष मुखर हो उठा है. नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत कहते हैं कि आपदा प्रबंधन अधिनियम में पहले से यह व्यवस्था है कि आपदा में मारे गए मृतक के परिजनों को एक लाख एवं घायल को पच्चीस हज़ार रुपये ज़िला प्रशासन तत्काल राहत के तौर पर प्रदान करेगा. मुख्यमंत्री के पहुंचने पर आपदा पीड़ितों को कम से कम मृतक के परिजनों को पांच लाख की सहायता देनी चाहिए थी. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या कहते हैं कि यह पूरी घटना सरकार और आपदा प्रबंधन की लापरवाही का नतीजा है. उन्होंने कहा कि इस तरह की आपदाओं को रोकने के लिए ठोस उपाय की ज़रूरत है. कांग्रेस के सांसद अजय टम्टा ने दो दिनों तक आपदा प्रभावितों के मध्य सरकार द्वारा रोटी-पानी कपड़ा तक की व्यवस्था न कर पाने पर गहरी आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार में बैठे लोग जनहित को भूल कर अपनी नेतागीरी चमकाने में लगे हैं. भारत सरकार में मंत्री हरीश रावत का भी आपदा प्रभावित क्षेत्र में ख़ाली हाथ आना लोगों को पसंद नहीं आया, इस आपदा प्रभावित क्षेत्र में सत्ता एवं विपक्ष के नेता अपने आश्वासन व आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला रहे हैं.

हालांकि आवश्यकता है कि पिथौरागढ़ के संवेदनशील समझे जाने वाले 60 गांवों को कहीं और बसाने एवं आपदा पीड़ितों की हर संभव मदद में दलगत भावना से ऊपर उठ कर कार्य करने की. इस पूरे आपदा प्रभावित क्षेत्र में आईटीबीपी के जवानों ने जिस दरियादिली से लोगों की सेवा की है उससे लोगों में उनके प्रति श्रद्धा की भावना देखी गई.


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