ग्रामीण भारत और एचआईवी की रोकथाम

…..ग्रामीण भारत और एचआईवी की रोकथा
…..भारत में जिस तरह से एड्‌स की बीमारी अपने पांव पसार रही है, उससे लोगों की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है. शहर तो शहर, अब भारत के गांवों में भी यह बीमारी पूरी तरह दस्तक दे रही है. यही वजह है कि अब ग्रामीण भारत में भी इससे निबटने के लिए पंचायत प्रतिनिधियों और महिला सदस्यों ने इसके ख़िला़फ कमर कस ली है. मुरादाबाद ज़िले के कई गांवों की पंचायत प्रतिनिधियों ने कार्यशाला वग़ैरह कर गांववालों को जागरूक करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. इनमें से ही एक अगवानपुर गांव की महिला प्रधान कमला देवी का कहना है कि उनको मालूम है कि एचआईवी एड्‌स काफी तेज़ी से बढ़ रहा है. लोगों का प्रतिनिधि होने के नाते हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि इसकी रोकथाम के लिए हम लोगों को जागरुक करें. 49 वर्षीय कमला देवी सहित कई महिला प्रधानों का मानना है कि जागरुकता से ही ग्रामीणों में इस महामारी को फैलने से रोका जा सकता है. उनका मानना है कि महिलाओं को ख़ुद को चारदीवारी के ही अंदर बंद नहीं रखना चाहिए, बल्कि समाज सेवा के लिए भी आगे आना चाहिए. ख़ुद का उदाहरण देते हुए कमला देवी ने बताया कि बचपन से ही उन्हें समाज सेवा में दिलचस्पी थी लेकिन शादी के बाद शुरुआत में वह घर तक ही सीमित रहीं, पर धीरे-धीरे उनके पति ने उनकी नेतृत्व क्षमता और समुदाय के कल्याण के लिए काम करने की इच्छा को महसूस किया. उसके बाद उन्हें स्थानीय राजनीति में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया. फिर कमला देवी ने चार साल तक पंचायत सदस्य के तौर पर काम किया. भारतीय संविधान के 73 वें संशोधन अधिनियम के तहत 1993 में गांव से लेकर  ज़िला स्तर तक एक तीन स्तरीय शासन प्रणाली की व्यवस्था शुरू की गई. इस क़ानून के तहत, ग्राम पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण दिया गया. ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को आरक्षण देना इस दिशा में पहला संवैधानिक क़दम था. इस क़ानून में राज्यों के ढांचे को बदलने की क्षमता थी. रसोईघर से लेकर पंचायतों तककी पहुंच ने अनिच्छा से ही सही, लेकिन उनकी नेतृत्व क्षमता को स्वीकार करने पर लोगों को मज़बूर किया. पंचायत नेताओं के तौर पर उनकी पहचान सक्रिय नागरिकों के रूप में हो रही है.  जब अगवानपुर पंचायत को महिलाओं के आरक्षित घोषित किया गया, तब कमला देवी प्रधान की चुनाव लड़ी और जीत भी गईं. शुरुआत में कमला देवी को कर्तव्यों के निर्वाह में कुछ द़िक्क़तें आईं, लेकिन बहुत जल्द ही उन्होंने अपने मजबूत संकल्प से इस चुनौती को पार कर लिया और पिछले चार साल से सफल प्रधान के रूप में काम कर रही हैं. कमला देवी ने कहा कि प्रधान बन जाने के बाद मैं अपने बच्चों के सपने को पूरा कर सकती हूं. एक एनजीओ एसएआरडीएस, जो कार्यशाला और प्रशिक्षण के माध्यम से एचआईवी-एड्‌स की रोकथाम में लोगों को जागरूक कर रहा है और विभिन्न परियोजनाओं को भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों में लागू कर रहा है. इसके द्वारा आयोजित कार्यशाला में भाग लेने के बाद कमला देवी ने लोगों को एचआईवी-एड्‌स के कारण और उसके प्रभाव के बारे में बताकर एक नई पहल की. महिलाओं को एक नहीं, कई स्तरों पर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उन्हें स्वास्थ्य-संबंधी समस्या के साथ-साथ बच्चों को कुपोषण, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और अवैध व्यापार का सामना करना पड़ रहा है. आईसीडीएस के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा, आजीविका के लिए नरेगा का प्रावधान और एचआईवी को रोकने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है, पिछले कुछ वर्षों से मुरादाबाद के गांवों में इसके लिए मुख़र आंदोलन चलाया जा रहा है.
उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक जोख़िम (एचआईवी-एड्‌स के नज़रिए से) वाले ज़िला मुरादाबाद की इस महिला प्रधान ने पारंपरिक मानसिकता और घिसी-पिटी सामाजिक मान्यताओं को अपनी कार्यक्षमता से लगातार चुनौती दी है. हालांकि, इनके लिए एचआईवी-एड्‌स जैसी समस्याओं से जूझना कोई नई बात नहीं थी. फिर भी उसे विभिन्न जाति और मान्यताओं वाले समुदाय में प्रचलित इससे संबंधित मिथकों और इस पर लगे कलंकों का सामना करना था. इसके प्रति प्रतिबद्धता ने ही उसे इन चुनौतियों से लड़ने में मदद की. वह स्वीकार करती हैं कि सोसायटी फॉर ऑल राउंड डेवलपमेंट (एसएआरडी) के प्रयासों ने इसके लिए प्रतिबद्ध होने में मदद की. वे कहती हैं कि इस संगठन द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला मेंें उनके साथ कई महिला प्रधानों ने भाग लिया. जिसमें सभी को एचआईवी और एड्‌स से जुड़े कई आयाम और उससे हमारे गांव को होने वाले ख़तरे को बताया गया.
सोसायटी फॉर ऑल राउंड डेवलपमेंट (एसएआरडी) ऑक्सफेम इंडिया के सहयोग से चलने वाला राष्ट्रीय-स्तर का एक ग़ैर-सरकारी संगठन है. जो उत्तरप्रदेश के बांदा, मऊ, इटावा, देवरिया और मुरादाबाद ज़िलों के सभ्य समाजों सहित चुनिंदा मंत्रालयों, विभागों, औद्योगिक घरानों और उनके संबंधित कार्यक्षेत्रों की मदद से मेनस्ट्रीमिंग एचआईवी-एड्‌स इंटरवेंशन्स परियोजना को प्रभावशाली तरीक़े से लागू कर रहा है. परियोजना का उद्देश्यएच आईवी मुख्य-धारा को सरकारी कार्यालयों और नेताओं, नीति-निर्धारकों और दूसरे कार्यकर्ताओं सहित छह मंत्रालयों तक अपनी पहुंच बनाता है, ताकि एचआईवी और सेक्सुअल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ (एसआरएच) से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच के लिए एक अच्छा माहौल बन सके. एसएआरडी के सीईओ सुधीर भटनागर का मानना है कि इसकी शुरुआत आईसीटीसी, एआरटी केंद्रों, एएससीएस और एचआईवी नेटवर्किंग समूहों जैसे विभागों, सरकारी प्रयासों की सदद से एक एचआईवी और लिंग नीति बनाकर की जा सकती है. जिससे परियोजना में अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकते हैं. संगठन का मानना है कि विभिन्न विकास प्रक्रियाओं के परिणाम स्वरूप ही एचआईवी-एड्‌स की वजह है. इसलिए एक प्रभावी और कुशल नज़रिया से ही इसका समाधान खोजा जा सकता है. इस परियोजना ने इन पंचायती राज संस्थाओं को ग्रामीण और ताल्लुका स्तर पर जागरूकता ़फैलाने में काफी मदद मिली. संगठन का मानना है कि इन पीआरआई सदस्यों को गांवों में एचआईवी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए काफी सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है.
कमला देवी ने वॉल-पेंटिंग जैसी कई दूसरे पहलों के साथ इस बीमारी से ग्रामीणों को जागरूक करने का काम किया है और उन जैसी कई महिला पीआरआई में इसकी समझ एसएआरडी-ऑक्सफेम द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के माध्यम से आई. इन वॉल-पेटिंग के ज़रिए लोगों तक जागरूकता संदेश पहुंचाने में काफी मदद मिली है. इसके लिए महिला प्रधानों ने उन वॉल-पेंटिंग को ऐसी जगह लगाया कि सभी इस जानकारी से अवगत हो सकें. वॉव-पेंटिंग के अलावा उन्होंने ग्राम-सभा और घर-घर तक जा कर भी एचआईवी और एड्‌स के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का अभियान चलाया. इस दौरान शहरों से गांवों में आए लोगों को उन्होंने नियमित एचआईवी जांच के लिए भी प्रोत्साहित किया. महिला ग्राम प्रधानों ने बताया कि ऐसे पहल की वजह से ही गांव वाले ख़ासकर महिलाएं एचआईवी-एड्‌स की रोकथाम और उसके प्रति जागरूक हो रही हैं. एक ग्राम-सभा के दौरान महिला प्रधानों ने गर्व से कहा कि आज अगवानपुर ग्राम पंचायत इस महामारी से निपटने के लिए जागरूक और सक्षम है.यह धीरे-धीरे हो रहा है, लेकिन बदलाव की प्रक्रिया चल रही है. ऑक्सफेम इंडिया की कार्यक्रम अधिकारी रिचा कालरा कहती हैं, संभवत: इस समस्या ने हमें अधिक भयभीत नहीं किया है, लेकिन हम इससे भी लड़ने के लिए तैयार हैं. रसोई से पंचायतों तक, ये महिलाएं  परिवार और समुदायों में लैंगिक संबंधों की स्थिति बदलने की शुरुआत भर हैं. हालांकि, ऐसी ऐतिहासिक पहल महिला पीआरआई की मदद से की गई है, लेकिन एसएआरडी को लगता है कि एचआईवी-एड्‌स के प्रसार को रोकने के लिए और भी कड़े क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है.
(लेखक डेवलपमेंट कम्युनिकेशन कंसल्टेंट हैं.)

भारत में जिस तरह से एड्‌स की बीमारी अपने पांव पसार रही है, उससे लोगों की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है. शहर तो शहर, अब भारत के गांवों में भी यह बीमारी पूरी तरह दस्तक दे रही है. यही वजह है कि अब ग्रामीण भारत में भी इससे निबटने के लिए पंचायत प्रतिनिधियों और महिला सदस्यों ने इसके ख़िला़फ कमर कस ली है. मुरादाबाद ज़िले के कई गांवों की पंचायत प्रतिनिधियों ने कार्यशाला वग़ैरह कर गांववालों को जागरूक करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. इनमें से ही एक अगवानपुर गांव की महिला प्रधान कमला देवी का कहना है कि उनको मालूम है कि एचआईवी एड्‌स काफी तेज़ी से बढ़ रहा है. लोगों का प्रतिनिधि होने के नाते हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि इसकी रोकथाम के लिए हम लोगों को जागरुक करें. 49 वर्षीय कमला देवी सहित कई महिला प्रधानों का मानना है कि जागरुकता से ही ग्रामीणों में इस महामारी को फैलने से रोका जा सकता है. उनका मानना है कि महिलाओं को ख़ुद को चारदीवारी के ही अंदर बंद नहीं रखना चाहिए, बल्कि समाज सेवा के लिए भी आगे आना चाहिए. ख़ुद का उदाहरण देते हुए कमला देवी ने बताया कि बचपन से ही उन्हें समाज सेवा में दिलचस्पी थी लेकिन शादी के बाद शुरुआत में वह घर तक ही सीमित रहीं, पर धीरे-धीरे उनके पति ने उनकी नेतृत्व क्षमता और समुदाय के कल्याण के लिए काम करने की इच्छा को महसूस किया. उसके बाद उन्हें स्थानीय राजनीति में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया. फिर कमला देवी ने चार साल तक पंचायत सदस्य के तौर पर काम किया. भारतीय संविधान के 73 वें संशोधन अधिनियम के तहत 1993 में गांव से लेकर  ज़िला स्तर तक एक तीन स्तरीय शासन प्रणाली की व्यवस्था शुरू की गई. इस क़ानून के तहत, ग्राम पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण दिया गया. ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को आरक्षण देना इस दिशा में पहला संवैधानिक क़दम था. इस क़ानून में राज्यों के ढांचे को बदलने की क्षमता थी. रसोईघर से लेकर पंचायतों तककी पहुंच ने अनिच्छा से ही सही, लेकिन उनकी नेतृत्व क्षमता को स्वीकार करने पर लोगों को मज़बूर किया. पंचायत नेताओं के तौर पर उनकी पहचान सक्रिय नागरिकों के रूप में हो रही है.  जब अगवानपुर पंचायत को महिलाओं के आरक्षित घोषित किया गया, तब कमला देवी प्रधान की चुनाव लड़ी और जीत भी गईं. शुरुआत में कमला देवी को कर्तव्यों के निर्वाह में कुछ द़िक्क़तें आईं, लेकिन बहुत जल्द ही उन्होंने अपने मजबूत संकल्प से इस चुनौती को पार कर लिया और पिछले चार साल से सफल प्रधान के रूप में काम कर रही हैं. कमला देवी ने कहा कि प्रधान बन जाने के बाद मैं अपने बच्चों के सपने को पूरा कर सकती हूं. एक एनजीओ एसएआरडीएस, जो कार्यशाला और प्रशिक्षण के माध्यम से एचआईवी-एड्‌स की रोकथाम में लोगों को जागरूक कर रहा है और विभिन्न परियोजनाओं को भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों में लागू कर रहा है. इसके द्वारा आयोजित कार्यशाला में भाग लेने के बाद कमला देवी ने लोगों को एचआईवी-एड्‌स के कारण और उसके प्रभाव के बारे में बताकर एक नई पहल की. महिलाओं को एक नहीं, कई स्तरों पर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उन्हें स्वास्थ्य-संबंधी समस्या के साथ-साथ बच्चों को कुपोषण, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और अवैध व्यापार का सामना करना पड़ रहा है. आईसीडीएस के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा, आजीविका के लिए नरेगा का प्रावधान और एचआईवी को रोकने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है, पिछले कुछ वर्षों से मुरादाबाद के गांवों में इसके लिए मुख़र आंदोलन चलाया जा रहा है.

उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक जोख़िम (एचआईवी-एड्‌स के नज़रिए से) वाले ज़िला मुरादाबाद की इस महिला प्रधान ने पारंपरिक मानसिकता और घिसी-पिटी सामाजिक मान्यताओं को अपनी कार्यक्षमता से लगातार चुनौती दी है. हालांकि, इनके लिए एचआईवी-एड्‌स जैसी समस्याओं से जूझना कोई नई बात नहीं थी. फिर भी उसे विभिन्न जाति और मान्यताओं वाले समुदाय में प्रचलित इससे संबंधित मिथकों और इस पर लगे कलंकों का सामना करना था. इसके प्रति प्रतिबद्धता ने ही उसे इन चुनौतियों से लड़ने में मदद की. वह स्वीकार करती हैं कि सोसायटी फॉर ऑल राउंड डेवलपमेंट (एसएआरडी) के प्रयासों ने इसके लिए प्रतिबद्ध होने में मदद की. वे कहती हैं कि इस संगठन द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला मेंें उनके साथ कई महिला प्रधानों ने भाग लिया. जिसमें सभी को एचआईवी और एड्‌स से जुड़े कई आयाम और उससे हमारे गांव को होने वाले ख़तरे को बताया गया.

सोसायटी फॉर ऑल राउंड डेवलपमेंट (एसएआरडी) ऑक्सफेम इंडिया के सहयोग से चलने वाला राष्ट्रीय-स्तर का एक ग़ैर-सरकारी संगठन है. जो उत्तरप्रदेश के बांदा, मऊ, इटावा, देवरिया और मुरादाबाद ज़िलों के सभ्य समाजों सहित चुनिंदा मंत्रालयों, विभागों, औद्योगिक घरानों और उनके संबंधित कार्यक्षेत्रों की मदद से मेनस्ट्रीमिंग एचआईवी-एड्‌स इंटरवेंशन्स परियोजना को प्रभावशाली तरीक़े से लागू कर रहा है. परियोजना का उद्देश्यएच आईवी मुख्य-धारा को सरकारी कार्यालयों और नेताओं, नीति-निर्धारकों और दूसरे कार्यकर्ताओं सहित छह मंत्रालयों तक अपनी पहुंच बनाता है, ताकि एचआईवी और सेक्सुअल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ (एसआरएच) से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच के लिए एक अच्छा माहौल बन सके. एसएआरडी के सीईओ सुधीर भटनागर का मानना है कि इसकी शुरुआत आईसीटीसी, एआरटी केंद्रों, एएससीएस और एचआईवी नेटवर्किंग समूहों जैसे विभागों, सरकारी प्रयासों की सदद से एक एचआईवी और लिंग नीति बनाकर की जा सकती है. जिससे परियोजना में अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकते हैं. संगठन का मानना है कि विभिन्न विकास प्रक्रियाओं के परिणाम स्वरूप ही एचआईवी-एड्‌स की वजह है. इसलिए एक प्रभावी और कुशल नज़रिया से ही इसका समाधान खोजा जा सकता है. इस परियोजना ने इन पंचायती राज संस्थाओं को ग्रामीण और ताल्लुका स्तर पर जागरूकता ़फैलाने में काफी मदद मिली. संगठन का मानना है कि इन पीआरआई सदस्यों को गांवों में एचआईवी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए काफी सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है.

कमला देवी ने वॉल-पेंटिंग जैसी कई दूसरे पहलों के साथ इस बीमारी से ग्रामीणों को जागरूक करने का काम किया है और उन जैसी कई महिला पीआरआई में इसकी समझ एसएआरडी-ऑक्सफेम द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के माध्यम से आई. इन वॉल-पेटिंग के ज़रिए लोगों तक जागरूकता संदेश पहुंचाने में काफी मदद मिली है. इसके लिए महिला प्रधानों ने उन वॉल-पेंटिंग को ऐसी जगह लगाया कि सभी इस जानकारी से अवगत हो सकें. वॉव-पेंटिंग के अलावा उन्होंने ग्राम-सभा और घर-घर तक जा कर भी एचआईवी और एड्‌स के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का अभियान चलाया. इस दौरान शहरों से गांवों में आए लोगों को उन्होंने नियमित एचआईवी जांच के लिए भी प्रोत्साहित किया. महिला ग्राम प्रधानों ने बताया कि…..

                   (लेखक डेवलपमेंट कम्युनिकेशन कंसल्टेंट हैं.)

                                      पूरी ख़बर के लिए पढ़िए चौथी दुनिया…..

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