साफ स्वच्छ हाथ बेहतर स्वास्थय का राज

[साल 2005 के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में संक्रामक रोगों से मरने वालों की कुल संख्या 29 फीसदी है और चिंता की बात यह है कि यह संख्या बढ़ती जा रही है. जिसकी मुख्य वजह है विभिन्न प्रकार की फ्लू से होने वाली बीमारियों में इज़ा़फा होना. यदि मुख्य वजहों पर ध्यान दें तो सबसे ब़ड़ी वजह है, हाइज़िन यानी स्वच्छ रहने में लापरवाही बरतना. जबकि संक्रामक बीमारियों से बचाव का इलाज ही है-स्वच्छता.]

saph-swachh-hat-behatar-swaदेश इन दिनों स्वाइन-फ्लू के आतंक से दहशत में है. इसके ख़ौ़फ का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि, ज़रा सी सर्दी-खांसी हुई नहीं कि इसकी जंच के लिए  लोग अस्पताल में लंबी कतार में नज़र आने लगते हैं. व़क्त-बेव़क्त कई दूसरे फ्लू के आने से रातों की नींद पहले ही उड़ी रहती है. एसोचैम की रिपोर्ट कहती है कि भारत में बीमारियों की प्रकृति में व्यापक बदलाव आया है. 1950 से 1990 के दशक तक जहां संक्रामक रोग शायद ही महामारी की शक्ल अख्तियार करते थे. वहीं अब शहरीकरण, औद्योगिकरण, वैज्ञानिक विकास और सामाजिक-व्यवस्था के तौर-तरीक़ों में बदलाव के साथ-साथ बीमारियों का स्तर तो व्यापक हुआ ही, इसका स्वरूप भी बदल गया. आज मोटापा, डायबिटीज़ जैसी बीमारियां हमारे लाइफस्टाइल को काफी प्रभावित कर रही हैं. जहां पोलियो, चेचक, टेटनस जैसी बीमारियों पर हमने लगभग फतह पा लिया है, वहीं एचआईवी-एड्‌स, डेंगू, फ्लू जैसी संक्रामक बीमारियां रह-रह कर अपना प्रकोप दिखलाने लगी हैं.

साल 2005 के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में संक्रामक रोगों से मरने वालों की कुल संख्या 29 फीसदी है और चिंता की बात यह है कि यह संख्या बढ़ती जा रही है. जिसकी मुख्य वजह है विभिन्न प्रकार की फ्लू से होने वाली बीमारियों में इज़ा़फा होना. यदि मुख्य वजहों पर ध्यान दें तो सबसे ब़ड़ी वजह है, हाइज़िन यानी स्वच्छ रहने में लापरवाही बरतना. जबकि संक्रामक बीमारियों से बचाव का इलाज ही है-स्वच्छता. इस लिहाज़ से खाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले भोजन की शुद्धता व स्वच्छता, आस-पास के वातावरण, दैनिक इस्तेमाल की चीज़ें और हमारे हाथों की स्वच्छता (जिससे हम किसी चीज के संपर्क में आते हैं) काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. आमतौर पर देखा गया है कि बाक़ी चीज़ों के प्रति तो हम सजग रहते हैं लेकिन लापरवाही दिखती है हाथों की सफाई में,जो कि सबसे अहम है. 

…..ग्लोबल हाइज़िन काउंसिल और डेटॉल द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारतीय, हाथों की स्वच्छता के प्रति काफी लापरवाह होते हैं. साथ ही,

 …..केवल 42 प्रतिशत भारतीयों को ही यह लगता है कि फ्लू और संक्रमण रोकने के लिए हाथों की स्वच्छता एक कारगर हथियार है.
खांसने-छींकने के बाद 29 प्रतिशत भारतीय हाथों को ठीक से साफ नहीं करते हैं.
…..70 प्रतिशत भारतीय साबुन से हाथ धोने के सही तरीक़े (कम से कम 20 सेकेंड तक) का पालन नहीं करते हैं.
…..26 प्रतिशत भारतीय यह नहीं मानते कि छींकते-खांसते व़क्त मुंह और नाक को ढंकने से फ्लू और सर्दी जैसी बीमारियां दूर हो सकती हैं.
…..70 प्रतिशत लोग ज़्यादातर इस्तेमाल होने वाली चीज़ों जैसे फोन, जूते-चप्पल इत्यादि के इस्तेमाल के बाद हाथों को साफ करने में यक़ीन नहीं रखते.
…..नौ प्रतिशत भारतीय केवल पानी से हाथ धोकर ही काम चला लते हैं.
…… इसके अलावा पांच में से तीन अभिभावकों यानी 59 प्रतिशत माता-पिता ने स्वीकार किया कि उनके बच्चे दोपहर या रात के खाने के बीच नाश्ते के दौरान, पहले या बाद में हाथ नहीं धोते.

जबकि हाइज़िन काउंसिल के भारतीय प्रतिनिधि व पुष्पांजली क्रॉसले अस्पताल के माइक्रो-बायलॉजी एंड इम्यूनोलॉजी एंड इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी के चेयरमैन डॉ नरेन्द्र सैनी के मुताबिक़ छींकने-खांसने के दौरान एहतियात बरतने से हम कई संक्रामक बीमारियों से बच सकते हैं. ग़ौरतलब है कि खांसते या छींकते समय क़रीब 19,500 कीटाणु हमारे मुंह से बाहर आते हैं और ध्यान देने की बात है कि 24 घंटे तक जीवित भी रहते हैं. इनकी तादाद जाड़े के मौसम में और भी अधिक हो जाती है और ये अधिक समय तक जीवित भी रह सकते हैं.
इस सर्वे के मुताबिक़ पूरी दुनिया में 50 फीसदी बीमारियां केवल संक्रमण से ही होती हैं.

डॉक्टरों के सुझाव के मुताबिक़ हाइज़िन(स्वच्छता) बरतने के लिए इन बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए-
थोड़ा-सा साबुन हाथ में लेकर घिसें. इस दरम्यान अंगुलियों के बीच में, नाखुनों में, और हाथ को दोनों ओर घुमा कर सा़फ करें.

…..हाथ धोने के बाद उसे साफ तथा सूखे तौलिए से पोंछे.
…..खांसते व छींकते व़क्त ध्यान रखें कि आपके मुंह से रोगाणु आसपास न फैलें, खांसते या छींकते समय टिश्यू पेपर या रूमाल का प्रयोग करें ताकि रोगाणु कम से कम फैले. इस्तेमाल हो चुके टि्‌श्यू को तुरंत फेंक दें और रूमाल को ख़ुद और दूसरों से दूर रखें. 
…..अपने मुंह, नाक और आंखों को हाथों से छूने से बचें, क्योंकि हमारे हाथों के…..

रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।

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रीतिका सोनाली

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