सूचना के अधिकार को मज़बूती देनी होगी

[कई सरकारी विभागों और संस्थाओं जैसे न्यायपालिका ने जानकारी मांगने और पाने को बहुत महंगा बना दिया है. सूचना पाने की क़ीमत को कुछ एजेंसियों और विभागों ने लोगों की पहुंच से ऊपर कर दिया है. इससे इस अधिकार की मूल आत्मा ही क्षतिग्रस्त हुई है. जब सूचना साझा करने के तरीक़ों का मूल्य तय करने का अधिकार विभिन्न राज्य सरकारों और स्वायत्त संस्थाओं को दे दिया गया है, तब वे क़ीमत को बेमतलब बढ़ाकर सूचना साझा न करने का बहाना गढ़ ले रहे हैं.]

suchana ke adhikar ko majbuti deni hogiक्टूबर 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) लागू हुआ था. उस घटना को तीन साल से ज़्यादा हो गए हैं. इसके लागू होने के कुछ ही दिनों के अंदर लोग यह भी आशंका व्यक्त करने लगे कि इस अधिनियम को लागू करने में पूरी ईमानदारी नहीं बरती जा रही. यह लग रहा था कि कुछ लोगों के स्वार्थ के कारण इस अधिनियम की आत्मा को मारा जा रहा था.

जब सरकार की ओर से इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों को कमज़ोर करने की कोशिश हुई थी तो इस पर काफी हो-हल्ला मचा था. सरकार किसी आधिकारिक नोट-शीट पर लिखी जानकारी को प्रशासनिक ज़रूरत और अधिकारियों को प्रताड़ना से बचाने के नाम पर इस अधिनियम के दायरे से बाहर कना चाहती थी.

हालांकि इन सब के बीच लोग यह नहीं समझ पाए थे कि यह अधिनियम अभी शैशवास्था में था और पूरी ताक़त से काम करने में इस व़क्त लगेगा. जल्द ही लोग इस अधिनियम से मिले अधिकार के महत्व और शक्ति को समझने लगे. अब वे इस अधिनियम का इस्तेमाल अपने अधिकारों से जुड़े सभी मामलों में करने लगे हैं.

हालांकि शुरुआत में आरटीआई के अंतर्गत सूचना मांगने वाली बहुत कम याचिकाएं थीं, आज हर विभाग और एजेंसी में सूचना मांगने वाले आवेदनों की भरमार है. इससे न केवल जनता के बीच किसी भी सरकारी जानकारी को मांगने के लिए आरटीआई के इस्तेमाल को लेकर विश्वास बढ़ा है, बल्कि इससे सरकारी कार्यालयों और विभागों को बहुत पारदर्शी भी बनाया है, जो कि इस अधिनियम का मूल उद्देश्य था.

केंद्रीय सूचना आयोग और अन्य राज्य सूचना आयोगों ने आरटीआई के तहत आई अपीलों पर कई अहम फैसले किए हैं. इससे आधिकारिक रिकार्डों पर लगा ताला खुल रहा है. साथ ही इसने उस ऑफिसियल सिक्रेट्‌स एक्ट, 1923 को कमज़ोर किया है, जिसका इस्तेमाल कोई भी नौकरशाह जनता को राज्य-सुरक्षा और बड़े जनहित के बहाने से जानकारी न देने के लिए करता था. 

अब इन फैसलों के बाद बड़े जनहित के इस सिद्धांत को ही अलग तरीक़े से व्याख्यायित करके केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग शाखाओं के जनता के साथ जानकारी साझा करने का आधार बनाया जा रहा है. अब आरटीआई के तहत जानकारी पाने का हक़ भले ही मज़बूत हो गया है लेकिन अभी भी इस हक़ को और मज़बूत करने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत है, ताकि यह सरकारी महकमों पर नियंत्रण का एक कारगर हथियार बन सके.

यह सच है कि आरटीआई के अंतर्गत आने वाले आवेदनों की संख्या बहुत बढ़ी है लेकिन अभी भी में इसमें बहुत ज़्यादा इजा़फे की गुंजाइश है. लोगों के बीच आरटीआई के तहत मिलने वाली शक्तियों के बारे में और जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है.

कई सरकारी विभागों और संस्थाओं जैसे न्यायपालिका ने जानकारी मांगने और पाने को बहुत महंगा बना दिया है. सूचना पाने की क़ीमत को कुछ एजेंसियों और विभागों ने लोगों की पहुंच से ऊपर कर दिया है. इससे इस अधिकार की मूल आत्मा ही क्षतिग्रस्त हुई है. जब सूचना साझा करने के तरीक़ों का मूल्य तय करने का अधिकार विभिन्न राज्य सरकारों और स्वायत्त संस्थाओं को दे दिया गया है, तब वे क़ीमत को बेमतलब बढ़ाकर सूचना साझा न करने का बहाना गढ़ ले रहे हैं.

सूचना पाने के अगंभीर प्रयासों को हतोत्साहित करने के लिए बढ़ाई गई यह क़ीमत कुछ ऐसे सच्चे आवेदनकर्ताओं को भी परेशान कर रही है जिनके पास सूचना पाने के लिए ज़रूरी पैसे नहीं हैं. हालांकि अधिनियम में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों से कोई मूल्य नहीं लेने का प्रावधान है लेकिन हमें यह समझना होगा कि हमारे देश में ऐसे कई हैं जो भले ही ग़रीबी रेखा से नीचे न हों लेकिन उससे कोई ख़ास बेहतर हालात में नहीं हैं. ऐसे लोग सूचना पाने के लिए एक मोटी रक़म नहीं ख़र्च कर सकते.

इसके अलावा एक और समस्या जो अधिकार के लागू होने के बाद सामने आई है, वह सूचना देने के लिए तैयार किए गए तंत्र में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी की है. इसी वजह से विभिन्न सूचना आयोगों और सरकारी संस्थाओं में लंबित आवेदनों की कतार है.

अब जबकि कई सरकारी अफसरों को समय सीमा के अंदर सूचना न देने के लिए जुर्माने का सामना करना पड़ा है और उन्हें यह जुर्माना अपनी जेब से चुकाना पड़ा है, तब से सरकारी कर्मचारी और अधिकारी इस अधिनियम के तहत आने वाली याचिकाओं पर कार्रवाई करने और निर्धारित 30 दिनों के भीतर सूचना देने के लिए तत्पर रहते हैं.

आज अधिकतर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं, इन विभागों के आम कामकाज पर असर पड़ा है. चूंकि आरटीआई के मामलों में काम नहीं करने से सीधे उनकी जेब पर असर पर पड़ता है इसलिए वे सबसे पहले उन्हीं मामलों को उठाते हैं.

ऐसी समस्याएं इसलिए भी उठी हैं क्योंकि कई सरकारी विभागों और संस्थाओं ने अभी भी अपनी आंतरिक जानकारी को सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं रखा है. इससे सूचना देने में देरी या पूरी तरह से मना करने की बातें भी सामने आती हैं. जब न्यायपालिका के कंप्यूटराइजेशन के लिए नेशनल पॉलिसी एंड एक्शन प्लान पर जानकारी की अर्ज़ी क़ानून मंत्रालय…..

(लेखक प. बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्तविचार  उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से संबंध नहीं है.) 
                                                                                                        पूरी ख़बर के लिए पढ़िए चौथी दुनिया…..

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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