विकास की बलि चढ़ता पर्यावरण

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[पर्यावरणीय संतुलन बरक़रार रखने वाले क़रीब 13 लाख वृक्षों को भी इस कथित विकास की बेदी पर बलि होना पड़ेगा. इस जंगल में दुनिया भर के क़रीब 280 क्लोन्स लाकर संरक्षित किए गए हैं, जो एक अमूल्य धरोहर है. खनन शुरू हुआ तो यह धरोहर नष्ट हो जाएगी. प्रदूषण के चलते चंद्रपुर ज़िले में अम्लीय वर्षा होती है.]

[बंडू धोतरे इन खदानों के विरोध और जंगल बचाने की मांग करते हुए दो बार आमरण अनशन कर चुके हैं. पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री जयराम रमेश की ओर से इन कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द किए जाने के आश्वासन के बाद ही उन्होंने अनशन ख़त्म किया.]

[दण्डकारण्य के जंगल की जैव-विविधता (बायोडायवर्सिटी) सैकड़ों वर्ष पुरानी है. राष्ट्रीय वन नीति 1988 के मुताबिक़ सभी प्रदेशों में कम से कम 33 प्रतिशत जंगल होने चाहिए. पिछले विधानसभा सत्र में महाराष्ट्र के वन मंत्री ने प्रदेश में 20 प्रतिशत जंगल होने की बात कही थी. हालांकि उपग्रह चित्रों के मुताबिक़ महज़14 फीसदी जंगल इस राज्य में बचे हैं.]

vikas ki bali chadhata paryavaranहाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव सर पर आ चुके हैं और इस चुनाव में बिजली की भीषण कटौती एक बड़ा मुद्दा है. इसी बात को लेकर प्रदेश सरकार बिजली के नाम पर जैव-विविधता और पर्यावरण को नष्ट करने पर आमादा है. सरकार बिजली के मसले पर संजीदगी दिखाकर जनता की सहानुभूति हासिल करने की मंशा रखती है. हालांकि,  चंद्रपुर की जनता और सैकड़ों पर्यावरणवादी सरकार को वन्य जीव संरक्षण कानून की याद दिलाने में जुटे हैं, जो जंगलों के भीतर दूसरे कामों की इजाज़त नहीं देता.

क्या बिजली की किल्लत दूर करने के नाम पर सदियों पुराने जंगल, जैव विविधता, पर्यावरण और वनवासियों के जीवन को दांव पर लगाया जा सकता है? क्या इसके लिए हरे-भरे जंगल को खदान में तब्दील करना सही होगा? कुछ इसी तरह के सवाल आज महाराष्ट्र के चंद्रपुर ज़िले की जनता सरकार से पूछ रही है. 

चंद्रपुर ज़िले के लोहारा गांव निवासी किशोर तलांडी समूचे गांव, समुदाय एवं जंगल से जुड़ी समस्या बयां करते हैं. वह कहते हैं-बाहर के जो लोग लकड़ियां बेच रहे हैं, कुछ दिनों बाद वे भी नहीं बेच पाएंगे, क्योंकि जंगल नहीं बचेगा. इधर काम नहीं मिलेगा, जो रुपये मिलेंगे वे लोग उड़ा देंगे और फिर कटोरा लेकर भीख मांगना पड़ेगा. आज मैं यहां दो सौ से तीन सौ रुपये तक कमा लेता हूं. लेकिन आगे क्या होगा?

उल्लेखनीय है कि चंद्रपुर ज़िले का ताडोबा अंधेरी टाइगर रिज़र्व बाघों के लिए स्वर्ग माना जाता है. लेकिन वहां के बफर ज़ोन में एक या दो नहीं बल्कि छह कोयला खदानें प्रस्तावित हैं. प्रस्तावित खनन क्षेत्र जुनोना संरक्षित वन क्षेत्र के अलावा लोहारा गांव की सीमा में स्थित है और कोल परियोजना के कोर क्षेत्र में स्थित लोहारा गांव को विस्थापित किया जाना है. महाराष्ट्र के गोदिंया ज़िले के तिरोडा में प्रस्तावित अदाणी ग्रुप्स लिमिटेड के पावर प्लांट के लिए आवश्यक कोयले की आपूर्ति हेतु कोयला मंत्रालय की ओर से अदाणी ग्रुप को चंद्रपुर शहर से महज़ 6 किलोमीटर की दूरी पर और ताडोबा अंधेरी टाइगर रिज़र्व से महज़ 10 किलोमीटर की दूरी पर लोहारा ईस्ट और लोहारा वेस्ट दो कोल ब्लॉक आवंटित किए जा चुके हैं.

इस बात को लेकर पूरे चंद्रपुर के लोगों में आक्रोश है और जनता सड़कों पर उतर चुकी है. लोहारा के 42 वर्षीय प्रकाश वेलादी से जब पूछा गया कि आपका घर जब अदाणी माइंस की भेंट चढ़ जाएगा तो क्या करोगे? जवाब में उन्होंने कहा घर कैसे जाएगा, हम जाएंगे नहीं तो कैसे जाएगा? हम सब मिलकर रोकेंगे, हम सदियों से यहां रह रहे हैं, जंगल हमारा है और हम जंगल के हैं.

हालांकि, लोहारा के सरपंच दयानंद बंकुवाले कंपनी का पक्ष लेते हैं, वह कहते हैं -पर्यावरण से हमें क्या मिलेगा? दूसरी ओर 36 वर्षीय औद्योगिक वर्कर प्रकाश वाडई कहते हैं- कंपनी के पक्ष में लोहारा के किसी ग्रामीण ने हस्ताक्षर नहीं किया था, हमने तो इस परियोजना के विरोध में सरपंच को हस्ताक्षर दिए थे. उसी के कवरिंग लेटर को अदाणी के पक्ष में बदल कर कलेक्टर को दे दिया गया. हमको हटाने की कोशिश हुई तो सड़कों पर आएंगे और ज़रूरत पड़ी तो जान भी देंगे.

इस मसले पर पर्यावरणवादियों की भी अपनी राय है. पर्यावरणवादी सुरेश चोपने के मुताबिक-चंद्रपुर ज़िले में पहले से ही 36 खदानें संचालित की जा रही हैं, लेकिन यह सबसे बड़ी खदान होगी, जिससे क़रीब 1,750 हेक्टेयर में फैला हरा-भरा जंगल ही नष्ट नहीं होगा, बल्कि पहले से पानी की समस्या का सामना कर रहे चंद्रपुर में पानी का अकाल पड़ जाएगा. समस्या बेहद विकराल होने जा रही है क्योंकि ज़िले में कुल 22 खदानें प्रस्तावित हैं, जिसमें से छह खदानें जंगल काटकर बनने वाली हैं. ताडोबा टाइगर रिज़र्व के बफर ज़ोन और आसपास अदाणी के अलावा, मुरली एग्रो, औरंगाबाद पावर, स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन और सनफ्लेक्स कंपनियों की नज़र गड़ी है. 

एक ओर जहां अदाणी गु्रप को खनन के लिए दो हज़ार हेक्टेयर से अधिक भूमि लीज पर दिए जाने से पर्यावरणवादियों समेत चंद्रपुर की जनता को भविष्य में भू-जल स्तर में भीषण गिरावट का डर सता रहा है, वहीं पहले से ही प्रदूषण की चादर से ढंका चंद्रपुर ज़िला और अधिक प्रदूषित हो जाएगा. स्थानीय विधायक सुधीर एस मुन्गंटीवार कहते हैं -इंडस्ट्री लगाने के बदले दोगुना जंगल लगाने की बात महज़ काग़ज़ों तक रही है. जंगल के बदले जंगल लगाने की जो बात कही जाती है, सरकार दिखाए कि कहां जंगल लगाए गए हैं? यहां पर पहले ही बहुत सी माइंस हैं. जितना रोजगार मिला, इससे ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ा. जिसके पास खेती थी उसे तो जमीन का मुआवजा मिल गया, लेकिन जो खेत मजदूर था वह बेरोजगार हो गया.

अदाणी की माईन्स के कारण लोहारा गांव विस्थापित होगा, जबकि मामला, घंटाचौकी, चकबोड़ा, पदमापुर, दुर्गापुर, निंबाड़ा, वयगांव जैसे कई गांव प्रभावित होंगे. लोहारा में ज़मीन के मुआवजे के तौर पर 8 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से दिये जाने की बात कही जा रही है. बाकी गांवों को कोई मुआवजा नहीं मिलने वाला है. स्थानीय ग्रामीणों में से महज 25 फीसदी लोगों के पास खेती है, करीब 60 फीसदी लोग एफडीसीएम में मजदूरी करके पेट पालते हैं. जबकि शेष लोग अन्य स्थानों पर मजदूरी करते हैं.

लोगों पर पड़ने वाले असर को तो जाने दें, पर्यावरणीय संतुलन बरकरार रखने वाले करीब 13 लाख वृक्षों को भी इस कथित विकास की बेदी पर बलि होना पड़ेगा. इस जंगल में दुनिया भर के करीब 280 क्लोन्स लाकर संरक्षित किए गए हैं, जो एक अमूल्य धरोहर है. खनन शुरु हुआ तो यह धरोहर नष्ट हो जाएगी. प्रदूषण के चलते चंद्रपुर जिले में अम्लीय वर्षा होती है. खदानों की संख्या बढ़ेगी तो प्रदूषण भी बढ़ेगा, ऐसे में अम्लीय वर्षा की मात्रा भी बढ़ जाएगी.

ये जंगल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दक्षिणवर्ती कॉरीडोर का हिस्सा होने की वजह से बाघों के प्रजनन एवं इनके अस्तित्व के लिए जंगल ज़रूरी है. नेचुरल क्लब नामक संस्था से सम्बद्ध पर्यावरणकर्मी प्रकाश कामडे कहते हैं -यह कॉरीडोर यदि नष्ट हुआ तो बाघों का प्रजनन प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायेगा, जिसका सीधा असर बाघों की संख्या पर पड़ेगा. साथ ही जानवरों का इंसान से सीधा टकराव भी बढ़ जायेगा. पर्यावरणविद बंडू धोतरे बताते हैं -पिछले चार वर्षों में में 55 लोग बाघों के हमले से मारे गए हैं, 1,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं और हजारों जानवर भी मारे गए हैं. ताडोबा में 45 बाघों के होने की बात कही जा रही है, जिसमें से 6 लोहारा स्थित प्रस्तावित अदाणी माइन्स के क्षेत्र में ही हैं. दूसरी ओर यह क्षेत्र 18 पशु प्रजातियों समेत करीब 225 प्रजातियों के पेड़ भी हैं. यहां रहने वाले बाघ और तेंदुए समेत 9 प्रजातियां लुप्तप्राय हैं. अगर जंगल काटकर यहां खनन शुरू होता है तो खुदाई में हर दिन 55 टन विस्फोटक इस्तेमाल होगा, जो बाघों समेत अन्य वन्य प्राणियों, पर्यावरण एवं वनवासियों के लिए…..

                               पूरी ख़बर के लिए पढ़िए चौथी दुनिया…..

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