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कांग्रेस और भाजपा में कुछ तो फर्क़ हो

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कांग्रेस की सरकार है, अच्छा हो कि कांग्रेस लोकसभा में प्रस्ताव लाए कि जब तक देश आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं हो जाता या कम से कम आर्थिक मंदी के दौर से निकल नहीं आता, तब तक सभी सांसद साधारण श्रेणी में यात्रा करेंगे. पैसे की बचत तो तभी हो पाएगी. यह क़दम दिखावटी ही सही, पर कांग्रेस ने उठाए तो, लेकिन इनका विरोध जिस तरह भाजपा ने किया, वह अच्छा नहीं लगा.

विपक्ष का नेता शेर होता है जो दिन रात आम लोगों की तकली़फों को लेकर सरकार पर गरजता रहता है तथा सरकार को मजबूर करता है कि वह आम लोगों के हितों को अनदेखा न करे, उनकी समस्याएं सुलझाए. लालकृष्ण आडवाणी का एक भी बयान या उनका एक भी इशारा इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कहना ग़लत है. कहना चाहिए कि वे इस कसौटी के आस-पास भी नहीं हैं.

बहुत अच्छा लगा सरकार का उदाहरण पेश करने वाला काम, जैसे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को पांच सितारा होटलों से निकाल कर सरकारी गेस्ट हाउसों में भेजना, इसी तरह बहुत अच्छा लगा सोनिया गांधी और राहुल गांधी का साधारण श्रेणी में यात्रा करना. यह और बात है कि सांसदों को हवाई जहाज और रेल में एक्ज़ीक्यूटिव श्रेणी में यात्रा करने का अधिकार है और उसका पैसा लोकसभा देती है.

कांग्रेस की सरकार है, अच्छा हो कि कांग्रेस लोकसभा में प्रस्ताव लाए कि जब तक देश आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं हो जाता या कम से कम आर्थिक मंदी के दौर से निकल नहीं आता, तब तक सभी सांसद साधारण श्रेणी में यात्रा करेंगे. पैसे की बचत तो तभी हो पाएगी. यह क़दम दिखावटी ही सही, पर कांग्रेस ने उठाए तो, लेकिन इनका विरोध जिस तरह भाजपा ने किया, वह अच्छा नहीं लगा. बेहतर यह होता कि भाजपा कहती कि यह कांग्रेस का नाटक है और हम लोकसभा में प्रस्ताव लाएंगे कि सभी सांसद व मंत्री अब साधारण श्रेणी में यात्रा करने के साथ कुछ प्रतिशत वेतन भी कम लेंगे. लेकिन भाजपा यह करना नहीं चाहती या शायद उसकी सोच ही कहीं भटक गई है.

अगर सोच न भटकती तो भाजपा को जनता की महंगाई से त्रस्त ज़िंदगी नज़र आ जाती. प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते वह महंगाई को लेकर सरकार पर दबाव बनाती और देश में लोगों के पास जाती और कहती कि उन्होंने उसे चुनकर ग़लती की है. लेकिन भाजपा ने ऐसा क्यों नहीं किया, इसके पीछे के कारण तलाशने के लिए ज़्यादा दिमाग़ नहीं दौड़ाना पड़ेगा. सन नब्बे से पहले भाजपा व्यापारियों की पार्टी मानी जाती थी. नेतृत्व भले अटल जी व आडवाणी जी का था पर दल की नीतियों पर छाप व्यापारियों के हित वाली थी. नब्बे के बाद इसीलिए भाजपा को रोजी-रोटी शोषण, बीमारी नज़र नहीं आई, नज़र आया राममंदिर और बाबरी मस्जिद.

कांग्रेस से कहना चाहते हैं कि आप एक्ज़ीक्यूटिव श्रेणी में यात्रा करें, हमें कोई परेशानी नहीं लेकिन एक बार आलू की क़ीमत पर नज़र डालिए. ये आलू देश के ग़रीब और खाना न तलाश पाने वाले अभागे लोगों का सहारा हुआ करता था, आज वह अमीरों की पहुंच बन गया है. दालें, आटा, मोटा अनाज एक भी वस्तु ऐसी नहीं है जो आम आदमी की पहुंच में हो. सब्ज़ियां और फल तो उसकी पहुंच से महीनों पहले दूर जा चुके हैं. लिखते हुए तकली़फ होती है, लेकिन सच्चाई है कि बच्चों के मुंह से दूध भी दूर हो चुका है. नए पैदा हुए बच्चे मां के दूध से भी वंचित हो रहे हैं क्योंकि मां को शारीरिक पोषण ही नहीं मिल पा रहा है कि वह अपने ही पैदा किए बच्चे को पिलाने लायक़ दूध अपने शरीर में बना सके. और अब शरद पवार, जिन्हें कृषि मंत्रालय शायद इसीलिए मिला है कि वे देश में महंगाई बढ़ाने में जमाखोरों की मदद करें. उनका बयान आया है कि चावल का,यानी धान का उत्पादन कम है. इसीलिए उसका भाव बढ़ने वाला है. उनका बयान आते ही चावल की क़ीमतों में देशव्यापी उछाल आया है. आप, जो यह लेख पढ़ रहे हैं,जब चावल लेने जाएंगे तो पाएंगे, कि भाव कल से ज़्यादा बढ़े हुए हैं. शरद पवार बयान न देते तो भी भाव, हो सकता है बढ़ते, लेकिन कुछ दिन बाद बढ़ते. शरद पवार का मुख्य काम देश में कृषि पैदावार को संतुलित बना उत्पादन बढ़ाना है लेकिन यह काम करने की उन्हें ़फुर्सत कहां. चावल व्यापारियों के साथ खड़े पवार को कौन सीख देगा पता नहीं.

इस सरकार ने हिंदू, मुसलमान, ग़रीब खेतिहर, मेहनत कश जनता को बढ़ती महंगाई की जकड़ में पहुंचा दिया है. सरकार इससे लड़ती तो अच्छा लगता बजाय इसके कि ख़र्च बचाने के लिए बचकानी कवायद करने के. सरकार विश्वसनीयता खोने के कगार पर पहुंच रही है. वहीं अ़फसोस इस बात का है कि देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठने का दावा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी की ज़ुबान ख़ामोश है. उन्हें महंगाई से कोई लेना देना नहीं है. उनकी रणनीति आज भी हिंदू मुसलमान को बांट, हिंदू भावना भड़का दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने की है. उन्होंने साबित कर दिया है कि वे प्रधानमंत्री के पद के लायक़ तो थे ही नहीं. नेता विरोधी दल के लायक़ भी नहीं है.

विपक्ष का नेता शेर होता है जो दिन रात आम लोगों की तकली़फों को लेकर सरकार पर गरजता रहता है तथा सरकार को मजबूर करता है कि वह आम लोगों के हितों को अनदेखा न करे, उनकी समस्याएं सुलझाए. लालकृष्ण आडवाणी का एक भी बयान या उनका एक भी इशारा इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कहना ग़लत है. कहना चाहिए कि वे इस कसौटी के आसपास भी नहीं है.

पार्टी के नेता को पार्टी को सही दिशा में ले जाने की ज़िम्मेदारी का पालन करना चाहिए. पर जैसे वे दिशाहीन और आम आदमी से दूर हैं वैसा ही उन्होंने अपनी पार्टी को बना दिया है. इसीलिए भाजपा जनता की तकली़फों से कभी परेशान ही नहीं होती. उसकी परेशानी के स्वर जब भी सुनने को मिलते हैं, जनता के दर्द से दूर, दर्द बढ़ाने वाले ही होते हैं. आंसू पोंछने की जगह ख़ून के आंसू लाने वाले होते हैं. भाजपा के संगठन सालों से हिंदू मुसलमान की पैरवी का आलाप कर रहे हैं जिन्हें अब लोग सुनना नहीं चाहते. वे ऐसी पार्टी चाहते हैं जो उनकी तकली़फों को समझकर राजनीतिक मांगे करे और दबाव बढ़ाए. क्या कांग्रेस और भाजपा के कर्णधार आम आदमी की तकली़फ को समझने की कभी कोशिश करेंगे, यह सवालिया निशान है.

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