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डॉक्टर की हर चूक को आपराधिक नहीं माना जाना चाहिए

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यह बेहद दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर चिकित्सकीय संस्थानों में स्वास्थ्य शिक्षा, मरीज प्रबंधन और इसमें निवेश से संबंधित सुविधाओं का ख्याल नहीं रखा जाता है. अस्पतालों और चिकित्सा से जुड़े लोग जैसे-जैसे व्यवसायीकरण और कॉरपोरेट संस्कृति अपना रहे हैं, उसी अनुपात में मरीज और डॉक्टरों के बीच संबंधों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं.

सुप्रीमकोर्ट के मुताबिक़, एक डॉक्टर किसी मरीज की मौत का ज़िम्मेदार तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक उसकी लापरवाही साबित नहीं हो जाती. साथ ही उसका रवैया मरीजों के जीवन और सुरक्षा के लिहाज से राज्य के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में भी आता हो. लेकिन, यदि कोई मरीज अपने इलाज और सर्जिकल ऑपरेशन के लिए राजी है तो ऐसे में डॉक्टरों की हर लापरवाही अपराध की श्रेणी में नहीं आएगी. इसे अपराध तभी माना जा सकता है कि जब डॉक्टरों की घोर लापरवाही की वजह से किसी मरीज़ की ज़िंदगी काफी नाजुक हो जाए या उनकी लापरवाही मरीजों की मौत की वजह बन जाए.

यदि किसी मरीज की मौत दुर्घटनावश होती है तो इसे अपराध से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए. इस तरह के मामले सुरक्षा या नागरिक दायित्व में तो आ सकते हैं, लेकिन इन्हें अपराध की संज्ञा नहीं दी जा सकती. कोई मामला अपराध की श्रेणी में तभी माना जाएगा, जब अभियुक्त नैतिक तौर उस अपराध के लिए ज़िम्मेदार हो. यदि लापरवाही का स्तर अधिक हो जाए तो सामान्य नियमों के अनुसार यह निश्चित तौर पर अपराध माना जाएगा.

चिकित्सीय लापरवाही के संदर्भ में आम भारतीयों की जागरूकता बढ़ रही है. साथ ही अस्पताल प्रबंधन को तमाम सुविधाएं, पेशेवराना रवैया और चिकित्सकीय जांच प्रणालियों को लेकर शिकायतों का भी सामना करना पड़ रहा है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कुछ मरीजों ने डॉक्टरों के विरुद्ध क़ानूनी मामले भी दर्ज़ कराए और प्रबंधन की लापरवाही को साबित किया. साथ ही उन्होंने मुआवजा भी लिया.नतीजतन, लापरवाही से जुड़े कई मामलों पर क़ानूनी फैसले दिए गए.

हालांकि इस तरह के क़ानूनी मामलों ने डॉक्टरों के उत्साह को कम भी किया है, क्योंकि इलाज के दौरान हमेशा उनके दिमाग़ में यह आशंका बनी रहती है कि भले ही उनका प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ रहे, लेकिन किसी कारणवश यदि मरीज की मौत हो जाती है तो बेवजह उन्हें क़ानूनी पचड़ों में फंसना पड़ सकता है. यदि किसी मरीज की मौत चिकित्सकीय त्रुटि की वजह से होती है तो इसका क़सूरवार डॉक्टरों को नहीं माना जा सकता है.

हालांकि पहले सुप्रीमकोर्ट की राय इन मामलों में बिल्कुल अलग थी, लेकिन हाल में मार्टिन एफ डिसूजा बनाम मो. इश्फाक़ के मामले ने सारा माज़रा ही बदल दिया. इस संदर्भ में फैसला माननीय न्यायाधीश मारकंडे काटजू और न्यायाधीश आर एम लोढ़ा की सम्मिलित पीठ ने दिया.

सुप्रीमकोर्ट के मुताबिक़,  डॉक्टरों के ख़िला़फ फौजदारी, दीवानी और उपभोक्ता मंच में मामले दर्ज़ किए जाते हैं, वह उनकी लापरवाही का ही नतीजा होता है. इसलिए डॉक्टरों को अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी समझनी चाहिए. इस संदर्भ में सारा मामला उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब और एएनआर के मामले में दिए गए फैसले से स्पष्ट हो जाता है.

हालांकि समस्या तब खड़ी होती है, जब इन मामलों की व्याख्या करने का सवाल सामने आता है. चिकित्सकों को अपने काम में कुशलता और जानकारी का बख़ूबी इस्तेमाल करना चाहिए और साथ ही सावधानी भी बरतनी चाहिए. नियमों के लिहाज से प्रतिद्वंद्विता और सावधानी में किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए.

जैकब मैथ्यू के मामले में कहा गया कि साधारण लापरवाही के लिए केवल दीवानी, जबकि किसी बड़ी लापरवाही के लिए फौजदारी मुक़दमों के तहत मामला दर्ज़ किया जा सकता है. दीवानी अपराधों के तहत डॉक्टरों को हर्जाना देना पड़ सकता है, जबकि फौजदारी मामलों में उन्हें जेल की सजा भी हो सकती है. हालांकि साधारण और बड़ी लापरवाही के मामलों पर विशेषज्ञों में मतभेद हो सकते हैं.

क़ानून भी चिकित्सा विज्ञान की तरह ही एक मुकम्मल विज्ञान नहीं है. कोई भी आदमी इसके बारे में पूर्वानुमान नहीं लगा सकता है. यह मामलों के तथ्य और परिस्थिति विशेष पर निर्भर करता है. साथ ही इस बात पर भी कि मामले की सुनवाई कौन न्यायाधीश कर रहा है. लेकिन, इन सबके बीच चिकित्सकीय लापरवाही से संबद्ध सामान्य बातों को समझने की ज़रूरत है.

उच्चतम न्यायालय ने इन मामलों पर फैसला देने से पहले दो ख़ास पहलुओं पर ध्यान दिया. पहला यह कि न्यायाधीश चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं, अत: वे इन मामलों की सुनवाई एक सामान्य नागरिक की तरह ही करेंगे. नतीजतन, इस तरह की लापरवाही के मामले में उनसे भी चूक हो सकती है. दूसरा यह कि इन मामलों में सामंजस्य बनाने की ज़रूरत है. जिन डॉक्टरों की वजह से मौत होती है, उन्हें इसके लिए दंडित किया जाना चाहिए. लेकिन हमें यह भी सोचने की ज़रूरत है कि यदि उनकी छोटी-मोटी ग़लतियों के लिए हमेशा दंडित किया जाएगा तो वे चिकित्सकीय पेशे को ही  छोड़ देंगे. इस तरह की मानवीय भूल हर किसी से हो सकती है. ऐसे में तो कोई भी डॉक्टर धैर्य और सहज भाव से काम नहीं कर पाएगा. समाज की सेवा कर रहे इन डॉक्टरों के विरुद्ध हमेशा इस तरह के निर्णय उचित नहीं हैं. परिस्थिति विशेष में इस तरह के फैसले नहीं लिए जाने चाहिए. उपरोक्त दोनों बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीमकोर्ट को चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित सामान्य सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा करने की ज़रूरत है.

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