कोई नहीं करता जनता की परवाह

यह सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की ही नाकामयाबी की कहानी है. कोई भी दल जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से नहीं कर रहा है. मायावती ख़ुद को दलित की बेटी कहती हैं, लेकिन इनके राज में दलित ही सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं. मुलायम सिंह ख़ुद को धरती पुत्र कहलाना पसंद करते हैं, लेकिन ज़मीनी लड़ाई से वह भी परहेज़ करते हैं.

समाजवादी पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ता से शायद हाथ न धोना पड़ता, अगर उसकी सरकार क़ानून व्यवस्था पर ज़रा भी ध्यान देती. लेकिन अ़फसोस, तब सत्ता के नशे में चूर मुलायम सिंह को अपनी ख़ामियां नहीं दिखीं. नतीजा यह हुआ कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रदेश की लचर क़ानून व्यवस्था का ऐसा ढिंढोरा पीटा कि मुलायम सिंह पैदल हो गए. सारे समीकरण और भविष्यवाणियां धरी की धरी रह गईं. उधर, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही मायावती ने क़ानून-व्यवस्था को सुधारने का बीड़ा उठा लिया. जनता मायावती  से कुछ और भी उम्मीदें लगा बैठी, लेकिन उसे इस सरकार की हक़ीक़त जानने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. जनता की सारी उम्मीदें तार-तार हो गईं. मायावती जनता की भलाई के लिए कम अपनी पार्टी का एजेंडा पूरा करने के लिए ज़्यादा लालायित थीं.

जनता से अधिक ध्यान उन्होंने बुतों पर दिया. मायावती सरकार की तुलना मुलायम सरकार के पिछले कार्यकाल से की जाए तो दोनों के बीच कोई अंतर नहीं दिखता. कुछ मामलों में तो मुलायम सरकार वर्तमान सरकार से बेहतर थी. यह तो मायावती सरकार की ख़ुशनसीबी है कि उसके सामने एक मज़बूत विपक्ष का अभाव है. प्रदेश में नंबर दो की हैसियत रखने वाली समाजवादी पार्टी ने आगरा अधिवेशन के बाद ज़रूर कुछ तेज़ी दिखाई है. उसके कार्यकर्ता मायावती सरकार के ख़िला़फ सड़कों पर दिख भी रहे हैं, लेकिन पार्टी द्वारा क़ानून-व्यवस्था और अन्य ज़रूरी मुद्दों को अभी भी ठीक से हवा नहीं दी जा रही है, जिसके सहारे शासन की नींद उड़ाई जा सके. यह हालत तब है, जबकि मुख्यमंत्री मायावती स्वयं स्वीकार कर चुकी हैं कि प्रदेश की क़ानून-व्यवस्था ठीक नहीं है. विक्रम सिंह को हटाकर कर्मवीर सिंह को नया डीजीपी बनाने की वजह भी प्रदेश की बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था पर लगाम लगाना ही था. लेकिन, अभी तक क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए मायावती द्वारा उठाए गए सारे क़दम हवा-हवाई साबित हुए हैं.

प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है. महिलाओं के उत्पीड़न और उनके प्रति अन्य अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए सभी ज़िलों में महिला थानों की स्थापना करने की घोषणा की गई थी, लेकिन अभी तक कुछ ज़िलों में ही महिला थाने खुल सके हैं. उन थानों की हालत भी काफी बुरी है, वहां न पर्याप्त फोर्स है और न ही संसाधन. मायावती ने अभिसूचना संगठन को पुनर्गठित और मज़बूत करने के लिए इसका एक अलग संवर्ग गठित करने का निर्णय लिया था. अभिसूचना संगठन को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण ख़रीदने के लिए पैसा भी मिल गया है, लेकिन संगठन को मज़बूत करने का काम कछुआ गति से चल रहा है.

आला अ़फसरों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए गठित किए गए अंतर्विषयक विशेष अनुसंधान दल की हालत स़फेद हाथी बनकर रह गई है. मुख्यमंत्री के पास भ्रष्टाचार की शिकायतों का अंबार लगा हुआ है. इसमें मंत्री से लेकर अधिकारियों तक की शिकायतें शामिल हैं. प्रदेश में फिदायीन हमलों  से निपटने के लिए एनएसजी कमांडो की तरह दो हज़ार कमांडो तैयार करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन आज तक कमांडो चयन की प्रक्रिया ही चल रही है. शासन के एक आला अ़फसर के अनुसार, मुख्यमंत्री ने क़ानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए जो क़दम उठाए थे, वे मील के पत्थर साबित हो सकते हैं, बशर्ते मुख्यमंत्री यह समीक्षा भी कर लेतीं कि उन क़दमों पर कितना अमल हुआ है? मुख्यमंत्री के क़रीबी अधिकारियों को एक दूसरे को नीचा दिखाने से ही फुर्सत नहीं मिलती.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *