हम सभी एक राष्ट्र के तौर पर नस्लवाद के प्रति हमेशा से संवेदनशील रहे हैं और रहेंगे भी. हाल में नस्ल और नस्लवाद से संबंधित ऐसे कई मामले सामने आएं, जिन्होंने मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. पिछले दिनो ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हुए हमलों ने इस देश में नस्लवाद को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. यह हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही थे, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्लवादी नीतियों के ख़िला़फ मुहिम छेड़ी थी. पहली बार दक्षिण अफ्रीका के पीटर मरित्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन पर नस्लवादी भेदभाव से दो-चार होने के बाद उन्होंने इसकी मुख़ाल़फत शुरू की, जो 19 वीं सदी के अंत में पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद के खिला़फ जंग की प्रतीक बनी. जब भारत आज़ाद हुआ तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में नस्ल के आधार पर समानता को भी शामिल किया गया. बाद में भारत ने नस्लीय भेदभाव के ख़िला़फ अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सहित कई वैश्विक समझौतों पर हस्ताक्षर किए. लेकिन, ऐसे में यह बेहद ही आश्चर्य करने वाला है, जब किसी भारतीय को ही नस्लवाद और नस्लवादी व्यवहार का दोषी पाया जाता है.
क्रिकेट विश्वकप के दौरान इएसपीएन के विज्ञापन, इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट मैच में सांवले रंगों वाली चीयर लीडर्स की जगह सा़फ और गोरे रंगों वाली चीयर्स लीडर्स, सोनी इंडियन आइडल के प्रतिभागी प्रशांत तमांग पर रेडियो जॉकी की कथित टिप्पणी या एंड्रयू साइमंड्स विवाद जिसमें हरभजन सिंह पर साइमंड्स को मंकी (बंदर) कहने का आरोप लगा था, आदि प्रमुख उदाहरण हमारे सामने है. इस तरह नस्लवाद हमारी बुद्धिजीवी चेतना का अंग बन चुका है. अभी हाल ही में उत्तर-पूर्व के एक वरिष्ठ और सम्माननीय नेता ने आरोप लगाया कि वह भी इस देश में नस्लवादी टिप्पणियों का शिकार होते रहे हैं. क्या हम वाक़ई एक राष्ट्र के तौर पर नस्लवादी हैं?
क्या पुरातन जाति व्यवस्था या इससे जुड़ी ग़ैर-ज़रूरी अस्पृश्यता ( अब इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के मुताबिक़ प्रतिबंधित कर दिया गया है) भी इसके लिए ज़िम्मेदार है? हालांकि जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता अभी भी इस देश में एक कड़वी सच्चाई है. क्या उपर्युक्त भी एक वजह नहीं है जिससे किसी समुदाय, जाति व म़जहब विशेष को पसंद या नापसंद करने का चलन बन पड़ा हो अथवा क्या यह स़िर्फ गोरे रंग के प्रति पूर्वाग्रह या भ्रम है? आख़िरकार गोरा रंग इस देश में उच्च जाति के आर्यन से जो जुड़ा हुआ है. हालांकि यह बंधन भी काफी पहले तोड़ा जा चुका है. अंतरजातीय और अंतरनस्लीय वैवाहिक संबंधों की वजह से आज हर जाति और समुदाय में सांवले रंग के लोग हैं. केवल यही नहीं, एक ही परिवार में अलग-अलग रंगों के भी सदस्य हैं.
फिर भी गोरे रंग के प्रति हमारा लगाव हमारे विचारों में आता है. साथ ही अवचेतन और कभी-कभी तो यह विभिन्न रंग के लोगों के साथ व्यवहार भी अलग-अलग करता है. प्राय: भारतीय अवधारणा में सुंदरता का मतलब ही गोरा रंग होता है. क्या हमारे प्राय: सभी देवी-देवता गोरे रंग के और सभी दानव काले रंगों के नहीं हैं? तभी से माना गया कि काले रंग से जुड़ना अपराध है, जबकि गोरे रंग का मतलब सदाचारी, शुद्ध, सुंदर और सर्वगुण संपन्न होना है. भारतीयों में गोरे रंग के प्रति आकर्षण इस देश के बाज़ार में फेयरनेस क्रीम और इसी तरह के दूसरे कई उत्पादों के ज़रिए आया. आप बस वादा करें कि अमुक उत्पाद आपके गोरे रंग को बढ़ाता है तो आप कोई भी घटिया उत्पाद इस देश में बेच सकते हैं. हमारे वैवाहिक विज्ञापनों में भी गोरे रंग वाली दुल्हनों को ही प्राथमिकता मिलती है. इस देश में अधिकांश पुरुष गोरे रंग वाली पत्नियों की ही इच्छा रखते हैं, ताकि कम से कम उनके बच्चे तो गोरे हों. यदि आपका बच्चा गोरे रंग का है तो आप बड़ी ही आसानी से उसके लिए योग्य वर या वधू तलाश सकते हैं. अधिकांशत: यह बात लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के मामले में अधिक लागू होती है.
कई अफ्रीकी नागरिक भारतीयों द्वारा नस्लीय भेदभाव का आरोप लगाते रहे हैं. अफ्रीकियों की अपेक्षा अधिक गोरे रंग का होने की वजह से बहुत से भारतीय ख़ुद को उनसे श्रेष्ठ मानते हैं. एक व़क्त ऐसा भी था, जब यह आरोप लगा कि गोरे रंग के पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग गोरे रंग की ही एयर होस्टेस, टीवी न्यूज़ रीडर, अभिनेता और अभिनेत्रियों का चयन करते हैं. अभी भी अधिकांश सफल अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने वास्तविक रंगों के बजाय मेकअप में शूटिंग करते हैं. बॉलीवुड के सबसे सफल अभिनेता और अभिनेत्रियां भले ही वे गोरे रंग के नहीं हैं, लेकिन उनके चित्र हमेशा गोरे रंगों में ही होते हैं. कम से कम हम में से अधिकांश उन्हें ऐसे ही जानते हैं. दैनिक जीवन में ऐसे कई शब्द हैं, जो नस्लीय हैं और साथ ही वे हमारी बोलचाल का हिस्सा भी हैं. मल्लू, चिंकी, सरदारजी, गुज्जू, पुंजू और बिहारी जैसे शब्द हमारी शब्दावली का हिस्सा बनते जा रहे हैं. इस तरह व्यवहार और बोलचाल के अंदाज़ पर कई तरह की कहानियां व चुटकुले भी बन जाते हैं. हम सब बिहारी, सरदारजी, मुल्लू और गुज्जू पर बने चुटकुलों को बड़े चाव से सुनते-सुनाते हैं. लेकिन क्या इससे यह साबित होता है कि हम नस्लवादी हैं?
इस तरह के पूर्वाग्रह स़िर्फ भारत और भारतीयों में ही नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की यही हक़ीक़त है. नस्ल, लिंग और क्षेत्रीयता से संबंधित कुछ दंतकथाएं या इतिहास भी प्रचलन में चले आ रहे होते हैं. इस तरह उक्त सभी हमारी चेतना में जाति और समुदाय विशेष के प्रति एक पूर्वाग्रह बन जाते है. धीरे-धीरे इसे हम स्वाभाविक तौर पर लेने लगते है और फिर धीरे-धीरे इसे प्राकृतिक रूप में स्वीकार भी करने लगते हैं. कम से कम अधिकांश लोग तो ऐसा ही करते हैं.
यही वजह है कि गुज्जू और मारवाड़ी धन से अपने अधिक लगाव के लिए अथवा मल्लू या बिहारी काम की तलाश में कहीं भी जाने के लिए जाना जाता है.मल्लू भाषा के लिहाज से ख़ास तरह की उच्चारण शैली होने की वजह से उपहास का पात्र बनते हैं. यही हाल बिहारियों और जाटो का है. सरदारजी और इंडियन (पढ़ें रेड इंडियन) पर इतने चुटकुले बन चुके हैं कि उनका मज़ाक चुटकुलों के ज़रिए ही उड़ाया जाता है. कुछ लोग मानते हैं कि यह सब एक स्वस्थ व्यवहार के तौर पर तभी तक स्वीकृत है, जब तक कि सामने वाला उसे उसी म़जाकिया अंदाज़ में स्वीकार करता है और आपसी सौहार्द के साथ हंसी-मज़ाक का लुत्फ उठाता है. इस तरह सामाजिकता का भी विकास होता है. दरअसल यह हमारा बेपरवाह और अशोभनीय बर्ताव ही है, जो सारे विवादों को जन्म देता है. निश्चित तौर पर यह घृणित नस्लीयता और ग़ुलामी जैसी विकृत मानसिकताओं की श्रेणी में नहीं आता है. साथ ही यह तब तक नस्लीय भेदभाव नहीं है, जब तक कि ऐसा किसी को अपमानित करने के इरादे से न कहा गया हो.
जब कोई किसी सरदार या मुल्लू का म़जाक उड़ाता है तो निश्चित तौर पर उसमें किसी को अपमानित करने की मंशा नहीं होती है, क्योंकि दोनों ही भारतीय समाज एक सफल हिस्से हैं. लेकिन, समस्या वहां शुरू होती है, जब दोनों पक्ष इन अवसरों का इस्तेमाल पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर एक दूसरे के सामाजिक हितों को नुक़सान पहुंचाने के लिए करते हैं. इस तरह के पूर्वाग्रहों से उपजी हिंसा इतना गंभीर रूप धारण कर लेती है, जिससे एक राष्ट्र बिखर सकता है. 1970 के दशक में पाकिस्तान का बंटवारा इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. गनीमत है कि भारतीय संदर्भ में ऐसा कभी नहीं हुआ.
पंजाब में यदि अलगाव सफल नहीं हो सका तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दो समुदायों के बीच रोटी-बेटी (जीवनयापन और वैवाहिक संबंध) का संबंध था. ठीक इसी तरह यदि हम साथ-साथ रहते हैं, समाज में अंतरजातीय, अंतरधर्मीय, अंतर्समुदायी व अंतरक्षेत्रीय विवाह का चलन बढ़ता है तो ऐसा हर लक्षण और पूर्वाग्रह अपना ज़हर धीरे-धीरे खोता जाएगा. और तब यदि कोई इस तरह के मज़ाक व टिप्पणियां करता है तो भी उनसे कोई ऐसी प्रतिक्रिया पैदा नहीं होगी, जिससे समस्याएं सामने आएं. भारतीय समाज पारंपरिक तौर पर हमेशा से ही इतना खुला रहा है कि यहां सभी लोग आसानी से रह सकते हैं. यही वजह है कि आज यह सलाद के कटोरे जैसा है, जिसमें सब कुछ घुला मिला रहता है. एक विविध जातीय और नस्लीय समाज होने की वजह से अक्सर ऐसा व्यवहार सामने आ जाता है, लेकिन यह तब तक असामान्य बात नहीं है जब तक कि इसे दूसरों को बग़ैर ठेस पहुंचाए नेक इरादे से कहा गया हो. जिस दिन हमारा समाज समझदार और शिक्षित हो जाएगा, उस दिन हर किसी को यह अहसास होगा. इस तरह की बातें समय के मुताबिक़ बदलनी होंगी और बतौर समाज हमें और अधिक परिपक्व होना पड़ेगा. ऐसा तभी हो सकता है, जबकि हम हर मामले में सभ्य और सुशिक्षित होंगे.
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