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मोसाद का आग़ाज़

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15 मई, 1948 को ब्रिटिश हुकूमत से मिली आज़ादी के बाद भी इज़रायल पर अरबों का हमला जारी रहा. इस तरह अरबों से सुरक्षा और इज़रायल की संप्रभुता को बरक़रार रखना एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि, इज़रायल के आज़ाद देश के तौर पर अस्तित्व मेंआने से पहले कई यहूदी ख़ु़फिया और गुप्त संगठन थे, जिन्हें अपने विरोधियों से निपटने के लिए ख़ु़फिया सूचनाओं की ज़रूरत होती थी.

इज़रायल की ख़ु़फिया एजेंसी मोसाद के बारे में इतना कहना ही काफी होगा कि स़िर्फ भगवान ही सब कुछ जानता है और वह मोसाद के लिए काम करता है. ऐसा हम यूं ही नहीं कह रहे. इसका सबूत है मोसाद के कारनामे, जिसने पूरी दुनिया को ऐसा कहने पर मज़बूर कर दिया.

15 मई, 1948 को ब्रिटिश हुकूमत से मिली आज़ादी के बाद भी इज़रायल पर अरबों का हमला जारी रहा. इस तरह अरबों से सुरक्षा और इज़रायल की संप्रभुता को बरक़रार रखना एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि इज़रायल के आज़ाद देश के तौर पर अस्तित्व मेंआने से पहले कई यहूदी ख़ु़फिया और गुप्त संगठन थे, जिन्हें अपने विरोधियों से निपटने के लिए ख़ु़फिया सूचनाओं की ज़रूरत होती थी. इनका मक़सद था यहूदियों को अरबों के आतंक से बचाना. राज्य बनने की घोषणा और अरबों के बर्बर रवैये ने एक नई ख़ु़फिया एजेंसी की ज़रूरत को जन्म दिया. ज़रूरत नए ख़ु़फिया तंत्र को विकसित करने की, ताकि इसकी संप्रभुता को क़ायम रखा जा सके. इन्हीं सारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जुलाई 1949 में इज़रायली ख़ु़फिया एजेंसी मोसाद ने इस दुनिया में पहली बार क़दम रखा. शुरुआती समय में इसने विदेश मंत्रालय के तहत काम करना शुरू किया, लेकिन जल्द ही इसकी कमान प्रधानमंत्री के हाथों में चली गई. अपने ख़ु़फिया कारनामों की वजह से ही यह दुनिया की सबसे बेहतरीन और शातिर ख़ु़फिया एजेंसियों में शुमार होने लगा. मोसाद ने धीरे-धीरे हर मुल्क़ में अपने पांव पसारने शुरू कर दिए. ऐसा कोई देश नहीं, जहां मोसाद के एजेंट मौजूद न हों. अमेरिका से लेकर यूरोपीय देश- जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नार्वे और रूस तक. इन सभी देशों में इसके ख़ु़फिया एजेंटों ने अपनी पकड़ काफी मज़बूत बना ली है. कई देशों में तो मोसाद के कारनामे ही इसकी मौजूदगी का एहसास कराने के लिए काफी है. मसलन, नाज़ी युद्ध के अपराधी एडोल्फ इक़मैन को मोसाद ने अर्जेंटीना से खोज निकाला, तो वहीं बैलेस्टिक एक्सपर्ट गेराल्ड बुल की बेल्जियम में हत्या के पीछे मोसाद को ही ज़िम्मेदार माना जाता है.

जर्मनी में नाज़ी युद्ध अपराधियों के ख़िला़फ मोसाद का अभियान भी जगज़ाहिर ही है. मोसाद के बारे में यहां तक कहा जाता है कि एक बार उसके निशाने पर आने के बाद दुश्मनों का ख़ात्मा तय है और उसने इसे साबित भी किया. ब्लैक सितंबर के सदस्य अली हसन सालमेह की तलाश में नार्वे के होटल में एक वेटर की हत्या बताती है कि मोसाद की मौजूदगी हर जगह है. मध्य-पूर्व के देशों में मिस्र और ईरान में तो वह साठ के दशक से ही सक्रिय है. जब शाह के शासन को बरक़रार रखने के लिए उसने सीआईए के साथ मिलकर वामपंथियों के ख़िला़फ अपनी मुहिम छेड़ी थी.

वहीं इराक के परमाणु हथियार बनाने के मंसूबों पर पानी फेरने वाला और कोई नहीं मोसाद ही था. जबकि फिलीस्तीन के ख़िला़फ इसकी मुहिम तो सबसे ख़तरनाक दौर में है और इसमें मोसाद की भूमिका आए दिन सुर्ख़ियों में बनी रहती है. लेबनान और सीरिया के विरुद्ध मोसाद की जंग सबसे पुरानी है और मोसाद ने कुख्यात ब्लैक सेप्टेंबर के सरगना अली हसन सालमेह को लेबनान में ही एक साज़िश के तहत कार बम ब्लास्ट में मार डाला था. सीरिया में मोसाद की पहुंच यहां तक थी कि सीरिया के राष्ट्रपति के क़रीबी को ही उसने अपना जासूस बना लिया था, जो बाद में रक्षा मंत्री पद का दावेदार भी बना. इस तरह देखा जाए तो मोसाद अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए कहीं भी और कुछ भी कर सकता है. ऐसा नहीं है कि मोसाद के अड्डे इन्हीं देशों तक सिमटे हुए हैं. भारत और पाकिस्तान में भी इसने अपनी जड़ें इतनी मज़बूत कर ली हैं कि दोनों देशों कीख़ु़फिया एजेंसियों को जो बात पता नहीं होती, उससे जुड़ी जानकारी मोसाद के पास होती है. यहां तक कि पाकिस्तानी खु़फिया एजेंसी आईएसआई ने ख़ुद लीबिया, सीरिया, जॉर्डन और सउदी अरब की कई ख़ु़फिया जानकारियां हासिल करने में मोसाद की मदद की. इसके अलावा मोसाद का जाल अफ्रीकी देशों से लेकर न्यूज़ीलैंड तक भी फैला हुआ है. यदि मोसाद के बारे में कहा जाए कि वह दुनिया के चप्पे-चप्पे में मौजूद है और कोई भी ख़ु़फिया जानकारी उसकी पहुंच से दूर नहीं तो कतई ग़लत नहीं होगा.

इज़रायल की यह ख़तरनाक ख़ु़फिया एजेंसी मोसाद, अपने सभी मिशन को अंजाम तेल अवीव स्थित मुख्यालय से देता है, जिसके लगभग 1500 एजेंट दुनिया के हर देश में मौजूद हैं.

मोसाद का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने किया था. शुरुआत में इसके निदेशकों की जानकारी गुप्त रखी जाती थी, लेकिन 1996 में फिलीस्तीनी संगठन हमास के एक बड़े नेता की हत्या में मोसाद के असफल होने की वजह ने इज़रायल में इस पर कई सवाल उठने लगे. तभी से निदेशकों की जानकारी भी आम होने लगी. ग़ौरतलब है कि मोसाद में कुल आठ विभाग हैं, जिनके ज़रिए वह अपने कारनामों को अंजाम देता है. इनमें पहला है कलेक्शन डिपार्टमेंट, जो दूसरे देशों से राजनयिक और ग़ैर-राजनयिक सूचनाओं को इकट्ठा करता है.

दूसरा है पॉलिटकल और लायज़न विभाग का, जो दूसरे देशों की ख़ु़फिया एजेंसियों से सूचनाओं की लेनदेन करता है. जबकि तीसरा स्पेशल ऑपरेशन डिविज़न, जिसे मेत्स्दा भी कहा जाता है यह राजनीतिक हत्याओं, मनोवैज्ञानिक युद्ध जैसे सनसनीख़ेज वारदातों को अंजाम देता है. रिसर्च डिपार्टमेंट सभी तरह की सूचनाओं को हासिल करता है, जिससे मोसाद को अपने मिशन को अंजाम देने में सहूलियत होती है. इसके अलावा बाक़ी विभाग सहयोगी के तौर पर काम करते हैं. इस तरह मोसाद ने अपने मिशन का आग़ाज़ किया. सबसे पहले इसने अपनी ताक़त को बढ़ाया. फिर पूरी दुनिया में अपना जाल बिछाया. और, अब अपने कारनामों की बदौलत सबसे क़ाबिल, शातिर और ख़तरनाक ख़ु़फिया एजेंसियों में शुमार होता है. जिसकी निगाह से किसी भी ख़ु़फिया सूचना का बचना मुश्किल ही नहीं, लगभग नामुमकिन है.

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