पचौरी पर भारी पडेंगी तेंदूखेडा की हार

राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी के लाख सिर पटकने पर भी मध्य प्रदेश कांग्रेस गुटबाज़ी से बाहर निकलकर पार्टी हित के लिए संघर्ष करने को तैयार नहीं है. अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए विधानसभा चुनाव हार जाने वाले दिग्गजों ने एक बार फिर उपचुनाव में कांग्रेस को नीचा दिखा दिया. सूबे में दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव में एक सीट भाजपा के पक्ष में गई है.

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को दोबारा जीवित किए जाने की कोशिशों को मध्य प्रदेश में एक बार फिर धक्का लगा है. इस बार हुए उपचुनाव में कोई भी सीट कांग्रेस की प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ी गई. तेंदूखेड़ा की सीट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी की प्रतिष्ठा से जुड़ी सीट थी, तो गोहद में ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर थी. दोनों ही सीटों पर कांग्रेस को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा. तेंदूखेड़ा की सीट सुरेश पचौरी के व्यक्तिगत कोटे में थी, जहां उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार की जीत को अपनी जीत मान लिया था. यह सीट कांग्रेस हार गई. कांग्रेसी नेता दबी ज़ुबान में इसे हाईकमान की निगाह में पचौरी को नीचा दिखाने का षड्‌यंत्र मानते हैं.

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों चर्चा थी कि पचौरी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में महामंत्री बनाया जा रहा है. ख़बर यह भी थी कि कांग्रेस का एक खेमा पचौरी को दिग्विजय सिंह पर नियंत्रण के लिए दिल्ली ले जाने पर आमादा है. संभवत: तेंदूखेड़ा की पराजय इसी ख़बर की परिणति थी. पचौरी आज भी अपने पांच समर्थकों की सीमा से निकलकर प्रदेश स्तरीय नेता के रूप में अपनी छवि नहीं बना पाए हैं.

यही कारण है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस को नए अध्यक्ष की तलाश करनी पड़ रही है. कांग्रेस इस पद के लिए सर्वाधिक उपयुक्त उम्मीदवार दिग्विजय सिंह की पसंद और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के विधायक पुत्र अजय राहुल सिंह को मानती है. उपरोक्त चयन से एक बार फिर स्पष्ट होने जा रहा है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस बड़े नेताओं की छत्रछाया से मुक्त होकर अभी राहुल गांधी की कांग्रेस बनने के लिए तैयार नहीं है.

दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे जिन्ना संकट से गुज़रती हुई भाजपा के लिए तेंदूखेड़ा सीट की जीत महत्वपूर्ण है. इस सीट पर भाजपा को सहानुभूति के वोटों का अधिक लाभ मिला है. भाजपा स्वयं इस राष्ट्रीय आपदा के समय स्वयं को संगठित रखने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि कैलाश विजयवर्गीय को छोड़कर राज्य के किसी भी बड़े या छोटे नेता ने जिन्ना विवाद पर भाजपा हाईकमान के पक्ष में भी खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखाई. भाजपा का प्रदेश नेतृत्व पानी में डोलते हुए पत्ते की चाल का परीक्षण करना चाहता है, जिससे दीर्घकाल तक प्रदेश के नेता अपने राजनीतिक हितों का राष्ट्रीय राजनीति में संरक्षण कर सकें.

इन परिस्थितियों में भाजपा को यह उम्मीद कतई नहीं थी कि उसे उपचुनाव के दौरान कोई सफलता मिलने वाली है. गोहद सीट पर मिली पराजय को भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया के आभामंडल की जीत के रूप में स्वीकार कर रही है, वहीं तेंदूखेड़ा में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को एक बार फिर पटखनी देकर भाजपा ने नेतृत्वविहीन कांग्रेस के असली चेहरे को उजागर कर दिया है.

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