पत्थर भी ब्रह्म स्वरूप

हर शिक्षित व्यक्ति अक्सर यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आख़िर हम पत्थर को भगवान समझकर क्यों पूजा करते हैं? हम वटवृक्ष, पीपल, तुलसी आदि पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना क्यों करते हैं? हम गाय, बैल आदि पशुओं को क्यों पूजते हैं? इन प्रश्नों को अगर पूजनेवालों से पूछा जाए तो वे अपनी अनभिज्ञता छुपाने का यत्न करते हैं. अक्सर वे अपनी क्रोधाग्नि को प्रत्यक्ष रूप में प्रकट कर अथवा यह दोषारोपण कर, कि प्रश्नकर्ता किसी धर्मविरोधी संस्था का सदस्य है, इसलिए आस्थाहीन होकर धर्म की क्रिया-प्रक्रिया पर प्रश्नों की बौछार कर रहा है, भूल सवाल को टालने की कोशिश करते हैं. किंतु आज के सुशिक्षित और सजग समाज को जब तक तर्कसंगत उत्तर न दिया जाए, तब तक इन परंपराओं के प्रति उससे सम्मान के भाव की उम्मीद करना व्यर्थ होगा.

इस तरह के प्रयास की आवश्यकता इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि धर्म के अंतर्गत इन परंपराओं का पालन समाज में अति व्यापक रूप से करते हुए देखा जा रहा है. अत: हमें उत्तर पाने के प्रयास में इन परंपराओं में सन्निहित तथ्यों तक पहुंचना होगा, जिनसे इनकी सार्थकता सिद्ध होती रही है. इस सद्‌प्रयास में हमें सृष्टि के कुछ नियमों पर दृष्टिपात करना पड़ेगा और नियमों के सूत्र में बंधी इस निराली सृष्टि की सुंदरता एवं विविधता में छिपे सृजनहार के पुनीत भाव को ध्यान में रखना होगा.

सृजनकर्ता ने सृष्टि की रचना में तीन चीज़ों को मिलाया- अविनाशी आत्मा (या आत्म तत्व), नश्वर माया और जुड़ने या बिछुड़ने वाली कला. सृष्टि के हर अंग-प्रत्यंग में ये तीनों अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते हैं. यानी आत्मा, सृष्टि के समस्त पदार्थों में विराजमान है.

अत: कोई सजीव और कोई निर्जीव हो, ऐसा होना संभव है. सृष्टि की हर इकाई सजीव ही है, क्योंकि उसमें आत्मतत्व है. और जो अविनाशी है, वह निर्जीव नहीं हो सकता. विज्ञान ने भी तत्व की परिभाषा में अविनाशिता एवं न रचे जा सकने वाले गुण को तत्व का आधार माना है. ब्रह्म में भी इन दो गुणों को माना गया है, अत: परमात्मा तत्व है और परमात्मा का अंश होने के कारण आत्मा भी तत्व है. चूंकि तत्व के बिना कोई यौगिक नहीं बन सकता, अत: आत्मा के बिना कोई इकाई नहीं हो सकती.  सृष्टि की प्रक्रिया में प्रयुक्त दूसरी चीज़ है माया, जिसके फलस्वरूप सृष्टि की इकाई को आकार, प्रकार और विकार प्राप्त होते हैं, जिसके कारण हमें आकर्षण, विकर्षण अथवा राग-द्वेष होता है. माया से उत्पन्न गुण समयावधि से बंधे होते हैं.

अत: अवधि पूर्ण होते ही नष्ट हो जाते हैं. इसलिए माया का अस्तित्व और प्रभाव दोनों नश्वर होते हैं. सृष्टि में जो तीसरी चीज़ प्रयुक्त होती है, वह है कला. कला का अर्थ है निर्धारित और वांछित कर्म संपादित करने की सम्यक क्षमता. जैसा कि वैज्ञानिक अनुभव भी मानता है कि कार्य क्षमता के क्षेत्र और परिमाण दोनों विकसित किए जा सकते हैं. उसी तरह सृष्टि में उपस्थित विभिन्न इकाई अपनी कला बढ़ा सकते हैं और इसे घटाया भी जा सकता है. अब इन तीन चीज़ों के सम्यक मेल से जब सृष्टि की रचना हुई तो सर्वप्रथम सबसे कम कलाधारी जीव यानी एक कलाधारी जीव की रचना की गई. एक कला की परिभाषा के अंतर्गत एक कलाधारी जीव को स्वरूप और स्थान पर बने रहने की क्षमता प्रदान की गई. इस एक कलाधारी जीव की श्रेणी में पत्थर, पहाड़, मिट्टी, सोना व चांदी आदि को उदाहरण स्वरूप लिया जा सकता है. एक कलाधारी जीव की रचना के पश्चात दो कलाधारी जीव की रचना की गई. इनमें आकार-प्रकार के साथ- साथ अपने स्थान पर संवर्धित-विकसित होने की क्षमता दी गई. दो कलाधारी जीव के उदाहरण हैं, पेड़-पौधों की दुनिया. तदुपरांत तीन कलाधारी जीव की रचना हुई. इनमें चलने-फिरने, हंसने-बोलने, सोचने-समझने आदि गुणों का भी समावेश किया गया. तीन कलाधारी जीव के उदाहरण हैं, पशु-पक्षियों की दुनिया. इसके पश्चात चार कलाधारी जीव की रचना की गई और इसे विवेक अतिरिक्त गुण के रूप में दिया गया.

मानव योनि है चार कलाधारी जीव का उदाहरण. विवेक समस्त गुणों का शिरोमणि है, क्योंकि इसी के कारण हम अच्छाई और बुराई में ़फर्क़ समझ पाते हैं. इसी विवेकरूपी विलक्षण गुण से विभूषित होने के कारण मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति कहलाता है.

मनुष्य चार कलाधारी जीव होते हुए भी अपने सम्यक प्रयास से और कलाएं जोड़ सकता है. मनुष्य का शरीर सात कलाएं तक धारण कर सकता है. आठ अथवा आठ से अधिक कलाएं धारण करने वाले महाभूति अवतार होते हैं जिनका विशिष्ट संरचनायुक्त शरीर होता है, जो आठ एवं आठ से अधिक कलाओं के तेज़ और आभाओं को अंतर्निहित करने में समर्थ होते हैं तथा इन कलाओं के क्रिया जगत को व्यवहारिक रूप प्रदान करने में ये अवतार सक्षम होते हैं. इन अवतारों का प्रादुर्भाव धरा पर प्रयोजनवश होता है तथा ये माया के अधीन कार्य करते हुए दिखते रहने पर भी सदैव मुक्त अवस्था में होते हैं, क्योंकि ये स्वकर्म वश नहीं, बल्कि ब्रह्मप्रयोजन वश शरीर धारण करते हैं. इसके विपरीत समस्त जीवों का मृत्युलोक में आना उनके

पूर्वजन्मों में किए गए कर्मों के फलस्वरूप होता है. अत: कर्मफल पाने के लिए वे सदा माया के अधीन होते हैं. पर, जब यही जीव अपने ब्रह्मप्रयास से चार की जगह सात कलाओं के स्वामी बन जाते हैं तो मुक्तावस्था को प्राप्त कर लेते हैं. इस अवस्था को मोक्ष, परमावस्था, निर्वाण आदि नाम दिए गए हैं. इस अवस्था को प्राप्त करना ही मानव जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य माना गया है. उपयुक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हो गया है कि पत्थर एक कलाधारी जीव है. पेड़-पौधे दो कलाधारी जीव हैं. ये भी इसलिए जीव हैं, क्योंकि इनमें भी परमात्मा का वही अंश आत्मा है जो हम चार कलाधारी जीवों अर्थात मनुष्यों में है. इस ईश्वर तत्व का आदर बना रहे और हमें अपनी अधिक कलाओं का अहंकार न हो जाए, इसलिए महापुरुषों ने सबसे पहले उनका आदर किया, जो एक कलाधारी जीव हैं. अर्थात पत्थर और पृथ्वी. इन्हें ईश्वर का प्रतीक मानकर पूजा जाने लगा. भगवान अर्थात ब्रह्म तत्व को पत्थर में भी देखा जा सके, इसलिए पत्थर को ब्रह्मरूप मानकर पूजा जाने लगा. इसी परंपरा के अंतर्गत पहाड़ विशेष की भी पूजा होने लगी और पृथ्वी को माता स्वरूप मानकर इसकी पूजा होने लगी.

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