यस सर नहीं, यस मैडम बोलिए

हम हर साल महिलाओं की सुरक्षा और उनके कई सामाजिक हितों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं. इस ध्येय के लिए हमारा प्रयास कई मायनों में अच्छी तरह सफल भी रहा. लेडी गोडिवा से लेकर सत्तर के दशक में अमेरिका में प्रतीकात्मक तौर पर अंतःवस्त्र का परित्याग कर अपनी आज़ादी का इज़हार करने वाली आंदोलनरत महिलाएं तक वास्तव में अब अपने आप में परिपूर्ण हैं. आप भले यक़ीन करें या न करें, आज महिलाएं पहले की अपेक्षा ज़यादा आत्मविश्वास से भरी हुई हैं. महारानी विक्टोरिया ने सिसिल रोड्‌स से एक सवाल पूछा, क्या आप महिलाओं को पसंद नहीं करते? इस पर सिसिल रोड्‌स का जवाब था, महिलाओं में जो सेक्स है उसे नापसंद करना कैसे मुमकिन है ?

और वाकई, महिलाओं के बग़ैर पुरुष हैं ही क्या? और जैसा कि ऑस्कर वाइल्ड ने कहा है, दुर्लभ व सबसे दुर्लभ. आख़िर, इन सबके बावजूद महिलाओं में मां की ममता, क्लोनिंग और जन्म देने का विशेषाधिकार जो है. दरअसल, हम महिलाओं की सहृदयता के बग़ैर इस दुनिया में क़दम रख ही नहीं सकते. ज़रा ध्यान से सोचिए, यदि ईव ने सेब खाने की ज़िद नहीं की होती, तो हम अभी भी गार्डेन ऑफ इडेन के चारों ओर तरबूज खाते हुए चक्कर लगा रहे होते.

मैं एक नारीवादी (फेमनिस्ट) हूं, इस बात को लेकर एक दिन मेरी पत्नी से मेरी बहस हो गई. जब तक मैंने उन्हें यह साबित नहीं कर दिया, वह इसे मानने को तैयार ही नहीं थीं. मैंने उन्हें बताया, आज जेंडर और सेक्स के मायने बदल रहे हैं और इसी तरह वैवाहिक संबंध भी. आजकल समलैंगिक विवाह भी ख़ूब प्रचलन में हैं और ऐसे में यदि मैं एक महिला से शादी करता हूं तो यह मेरे नारीवादी होने का सबसे बड़ा प्रमाण नहीं है?  इसके बाद वह कुछ भी नहीं बोलीं. दरअसल, हर किसी की तरह मैंने भी अपनी स्नातक की डिग्री गंवाकर और पत्नी को मास्टर डिग्री हासिल करने में मदद कर वैवाहिक जीवन में क़दम रखा. आप यक़ीन करें या न करें, शादी के व़क्त मेरी पत्नी इतनी ख़ूबसूरत दिखती थीं कि मैं अक्सर यही महसूस करता था कि उन्हें प्यार करता रहूं और अब जबकि शादी के कई साल हो गए हैं, सोचता हूं कि मुझे अपनी पसंद पर अमल करना चाहिए था. किसी ने सही ही कहा है, मुझे लगता है कि आख़िरकार मैं कुंवारा हूं?

यह मान्यता है कि ईव की जीन ग़रीब एडम की अतिरिक्त पसलियों से बनी थी और तभी से वह उन पसलियों के पिंजरे में क़ैद है. महिलाएं पुरुषों के बाद आईं. महिलाओं ने ही यह फैसला किया कि हमें कौन-सी चीज़ खानी है, क्या पहनना है. मेरे कई अच्छे दोस्त बड़े ही दंभी अंदाज़ में कहते हैं कि वह अपने घर के मालिक हैं. बड़ी सावधानी के साथ वे यह भी बताते हैं कि भारत को परमाणु बम बनाना चाहिए या नहीं या फिर सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट टीम में होना चाहिए या नहीं. ऐसे सभी अति महत्वपूर्ण राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फैसले वह स्वयं लेते हैं, जबकि घर में खाना क्या बनेगा, वह आज क्या पहनेंगे और किस समय क्या बोलना है, यह तय करने की ज़िम्मेदारी उन्होंने पत्नी पर छोड़ दी है.

एक ग़रीब आदमी यह कभी नहीं सोचता कि उसके फैसले से किसी को कुछ  फर्क़ भी पड़ता है, लेकिन पत्नी के फैसले उसकी या किसी और की ज़िंदगी के लिए काफी अहम होते हैं. अहंकार उसे भ्रम में डाल देता है. आज भी मेरे मित्र और उनकी पत्नी दोनों अच्छी तरह साथ-साथ रहते हैं, लेकिन दोनों के अपने-अपने तरीक़े हैं. आप मानें या न मानें, आज महिलाओं का ज़माना है. पुराणों में उल्लेखित पितृसत्तात्मक या पुरुष प्रधान समाज (शायद ही हमने महिलाओं पर कभी हु़क्म चलाया) धीरे-धीरे मातृसत्तात्मक या महिला प्रधान समाज में बदलता जा रहा है. ऐसे समाज में महिलाएं ही वास्तव में शासक हैं. आज कई जगहों और क्षेत्रों में महिलाओं को आरक्षण की सुविधा मिली हुई है. यहां तक कि उनके कतार में लगने की भी ख़ास व्यवस्था होती है. महिलाओं की ख़ास उपलब्धि के लिए महिला अंतरराष्ट्रीय दिवस भी मनाया जाता है. क्या नहीं है उनके लिए हर जगह, हर मामले में सबसे आगे महिला. और, मेरा यक़ीन मानिए दूसरे पायदान पर तो वह हरगिज़ नहीं हैं. ऐसा कहा गया कि जब टाइटेनिक जहाज डूब रहा था तो जहाज के कप्तान ने भी सबसे पहले महिलाओं और बच्चों को ही बचाने का काम किया. यही वजह है कि रोज़ बच गई और बेचारा जैक मारा गया. यही वजह है कि अमेरिकी हास्य कलाकार गिल्डा रैडनर जैसे लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि वह पुरुष की अपेक्षा महिला ही बनना चाहेंगे. महिलाएं रो सकती हैं, ख़ूबसूरत कपड़े पहन सकती हैं और किसी डूबते जहाज से सबसे पहले बचकर निकल भी सकती हैं.

ऐसा मानना है कि हर सफल आदमी के पीछे कोई न कोई महिला अवश्य ही होती है. लेकिन, ऐसा हमेशा लगता है किहर सफल इंसान के पीछे एक महिला का हाथ होता है. यह आश्चर्य की बात है कि उच्छृंखलऔर ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के बावजूद वह उसे सफल देखकर भी काफी ख़ुश होती है. यह अच्छी तरह जानते हुए कि महिलाएं ग़लत दिशा में जा रही हैं, हम ठीक इसके उलट चलते हैं. आख़िरकार, दो अलग-अलग हिस्से महिला और पुरुष दो सेक्स में, वे हमारा बेहतर अधूरा हिस्सा हैं. हम पुरुष, महिलाओं के मोहपाश में बंधे हुए हैं. हम हमेशा महिलाओं के पीछे भागते रहते हैं और उसकी साज़िश के जाल में बर्बाद होने की हद तक फंसते चले जाते हैं. हम पूरे महीने पागलों की तरह काम करते हैं और महीने के अंत में उसके प्रेम और करुणा में बहकर सारी कमाई उसे सौंप देते हैं. उसके बाद पूरे महीने अपने गुज़ारे के लिए उसकी ओर टकटकी लगाकर कातर निगाहों से देखते रहते हैं.

वास्तव में हमेशा पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अनावश्यक लाभ मिलता है. स्मार्ट होने के बावजूद अगर वह अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकतीं, तो बेवकू़फ होने पर भी उन्हें यह सब नहीं मिल सकता. महिलाओं के सबसे बड़े प्रशंसक पुरुष ही हैं, कोई और नहीं, यह उनके ख़र्च के बिल से भी साबित होता है. वास्तव में यदि महिलाएं नहीं होती तो दुनिया में पैसे का कोई मतलब ही नहीं होता. और आप किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध नहीं रह सकते. वह कभी आपसे सलाह-मशविरा भी नहीं करेंगी और वह ऐसा करे भी क्यों? आख़िरकार सलाह कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं, जिसे वह शाम को पहन कर घूम सके. पुरुषों को बर्बाद करने की महिलाओं की अदा से जेफरी बर्नार्ड काफी आतंकित थे. उन्होंने यह मांग की कि महिलाओं को अपने माथे पर एक लेबल लगाना चाहिए, जिस पर सरकारी स्वास्थ्य चेतावनी के रूप में यह लिखा हो कि महिलाएं आपके दिमाग़, गुप्तांग, बैंक बैलेंस, विश्वास और दोस्ती को बुरी तरह नुक़सान पहुंचा सकती हैं.

ऐसी महिलाएं बहुत मुश्किल से ही मिलती हैं, जो अपनी सही  उम्र बताती हों. यदि बताती भी हैं तो स़िर्फ दो हालात में. या तो  कुछ गंवाने के लिहाज से वह काफी छोटी हैं, या फिर इतनी उम्रदराज कि वह कुछ भी हासिल नहीं कर सकतीं. दरअसल, कोई महिला अपनी सही उम्र बताती है तो उस पर यक़ीन नहीं करना चाहिए. इसकी वजह यह है कि वह बेपरवाही से सब कुछ छुपाते हुए भी, कुछ भी और सब कुछ बता सकती है. महिलाओं की उम्र छिपाने की यही कला उन्हें संख्या और गणित के लिहाज़ से दिलचस्प बनाती है. वे अपनी उम्र वास्तविक उम्र से हमेशा आधी, अपनी पोशाक की क़ीमत दोगुनी और सबसे अच्छी दोस्त की उम्र उसकी वास्तविक उम्र से पांच साल ज़्यादा बताती हैं.

एक बच्चे के रूप में, मैं हमेशा यह सोचकर हैरान होता था कि सारे त्योहार पुरुषों के हिसाब से क्यों नहीं बनाए गए हैं?  महिलाओं की तरह हम भी पैसा कमाते. राखी और भैयादूज के अवसर पर एक दिन पहले ही पूरे भारत में सभी बहनें पैसा लेने और अपनी पूरी ज़िंदगी की रक्षा के वादे के लिए जमा हो जाती हैं. इस तरह महिलाओं की रक्षा के लिए उनके शौहर, भाई, समाज और अब तो सरकार भी उनके साथ है. जबकि मानवता पूरी तरह असुरक्षित है. वे आज सही में विलुप्तप्रायः प्रजाति है. आज इस अधूरे और बेहतर हिस्से की रक्षा के लिए कई क़ायदे क़ानून हैं, लेकिन सबसे बुरे अधूरे हिस्से यानी पुरुषों के लिए ज़मीनी तौर पर कुछ भी नहीं है.

पुरुष हमेशा से महिलाओं के आकर्षण में बंधे रहे हैं. आख़िर, आकर्षित होकर उसे हासिल करना ही तो उससे मोहमुक्त होने का सबसे बेहतर ज़रिया है. पुरुषों की दृढ़ इच्छाशक्ति के बावजूद महिलाएं अपना रास्ता निकाल लेती हैं. हम उन्हें चाहे जितना भी बेवकू़फ समझते हों, यदि ऐसी न हों तो वह हमसे कभी शादी नहीं करेंगी और आप मुझे एक बात बताइए, हम कई स्मार्ट लड़कों को बेवकू़फ महिलाओं के साथ देखते हैं, लेकिन कितनी बार एक स्मार्ट लड़की को बेवकू़फ लड़कों के साथ देखते हैं? आप मानें या न मानें, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की सोच स्पष्ट है. इसीलिए वह इसे अक्सर बदलती रहती हैं. एक सर्वे के मुताबिक़, 85 फीसदी महिलाएं सोचती हैं कि उनके पति ज़्यादा दिखावटी हैं. दस फीसदी के मुताबिक़, उनके  पति उसके क़ाबिल नहीं हैं. जबकि बाक़ी 5 फीसदी सोचती हैं कि वे अपने पति से प्यार नहीं करतीं, बस शादी कर ली है.

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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