बाल मजदूरी देश के लिए अभिशाप


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यह माना जाता है कि भारत में 14 साल के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. भारत में कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. हमारे देश में हर दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं. स़िर्फ 0.8 फीसदी कारखानों में काम करते हैं.

आमतौर पर बाल मज़दूरी अविकसित देशों में व्याप्त विविध समस्याओं का नतीजा है. भारत सरकार दूसरे राज्यों के सहयोग से बाल मज़दूरी ख़त्म करने की दिशा में तेज़ी से प्रयासरत है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) जैसे महत्वपूर्ण क़दम उठाए हैं. आज यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस परियोजना ने इस मामले में का़फी अहम कार्य किए हैं. इस परियोजना के तहत हज़ारों बच्चों को सुरक्षित बचाया गया है. साथ ही इस परियोजना के तहत चलाए जा रहे विशेष स्कूलों में उनका पुनर्वास भी किया गया है. इन स्कूलों के पाठ्यक्रम भी विशिष्ट होते हैं, ताकि आगे चलकर इन बच्चों को मुख्यधारा के विद्यालयों में प्रवेश लेने में किसी तरह की परेशानी न हो. ये बच्चे इन विशेष विद्यालयों में न स़िर्फ बुनियादी शिक्षा हासिल करते हैं, बल्कि उनकी रुचि के मुताबिक़ व्यवसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है. राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत इन बच्चों के लिए नियमित रूप से खानपान और चिकित्सकीय सहायता की व्यवस्था है. साथ ही इन्हें एक सौ रुपये मासिक वजी़फा दिया जाता है.

ग़ैर सरकारी संगठनों या स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे स्कूल इस परियोजना के अंतर्गत अपना काम भलीभांति कर रहे हैं. हज़ारों बच्चे मुख्य धारा में शामिल हो चुके हैं, लेकिन अभी भी कई बच्चे बाल मज़दूर की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. समाज की बेहतरी के लिए इस बीमारी को जड़ से उखाड़ना बहुत ज़रूरी है. एनसीएलपी जैसी परियोजनाओं के सामने कई तरह की समस्याएं हैं. यदि हम सभी इन समस्यायों का मूल समाधान चाहते हैं तो हमें इन पर गहनता से विचार करने की ज़रूरत है. इस संदर्भ में सबसे पहली ज़रूरत है 14 साल से कम उम्र के बाल मज़दूरों की पहचान करना. आख़िर वे कौन से मापदंड हैं, जिनसे हम 14 साल तक के बाल मज़दूरों की पहचान करते हैं और जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्य हों? क्या हमारा तात्पर्य यह होता है कि जब बच्चा 14 साल का हो जाए तो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी राज्य की हो जाती है? हम जानते हैं कि ग़रीबी में अपना गुज़र-बसर कर रहे बच्चों कोपरवरिश की ज़रूरत है.  कोई बच्चा जब 14 साल का हो जाता है और ऐसे में सरकार अपना सहयोग बंद कर दे तो मुमकिन है कि वह एक बार फिर बाल मज़दूरी के दलदल में फंस जाए. यदि सरकार ऐसा करती है तो यह समस्या बनी रह सकती है और बच्चे इस दलदल भरी ज़िंदगी से कभी बाहर ही नहीं निकल पाएंगे. कुछ लोगों का मानना है और उन्होंने यह प्रस्ताव भी रखा है कि बाल मज़दूरों की पहचान की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 18 साल कर देनी चाहिए. साथ ही सभी सरकारी सहायताओं मसलन मासिक वजी़फा, चिकित्सा सुविधा और खानपान का सहयोग तब तक जारी रखना चाहिए, जब तक कि बच्चा 18 साल का न हो जाए.

कई सरकारें बाल मज़दूरों की सही संख्या बताने से बचती हैं. ऐसे में वे जब विशेष स्कूल खोलने की स़िफारिश करती हैं तो उनकी संख्या कम होती है, ताकि उनके द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों और कार्यकलापों की पोल न खुल जाए. यह एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है और आज ज़रूरत है कि इन सभी मसलों पर गहनता से विचार किया जाए.

मौजूदा नियमों के मुताबिक़, जब बच्चा मुख्य धारा के स्कूलों में दाख़िला ले लेता है तो ऐसा माना जाता है कि मासिक सहायता बंद कर देनी चाहिए. जबकि बच्चे या उसके माता-पिता नहीं चाहते हैं कि वित्तीय सहायता बंद हो. ऐसे में उनका अकादमिक प्रदर्शन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. यही वजह है कि हर कोई सोचता है कि जब बच्चा मुख्य धारा के स्कूल में प्रवेश कर जाए तो उसके बाद भी उसे सहायता मिलती रहनी चाहिए.

आख़िरकार अतिरिक्त पैसे के लिए ही तो माता-पिता अपने बच्चों से मज़दूरी करवाते हैं. इसीलिए किसी भी तरह आर्थिक सहायता जारी रहनी चाहिए. यह तब तक मिलनी चाहिए, जब तक कि वह बच्चा पूर्ण रूप से मुख्य धारा में शामिल होने के क़ाबिल न हो जाए. हालांकि पुनर्वास पैकेज की पूरी व्यवस्था की गई है, फिर भी बच्चे के माता-पिता सरकारी सुविधाओं के हक़दार नहीं माने गए हैं. ऐसे में हर किसी को यह लगता है कि इस संदर्भ में एक सामान्य नियम होना चाहिए, ताकि ऐसे लोगों के  लिए एक विशेष वर्ग निर्धारित हो सके. जैसे एससी, एसटी, ओबीसी, सैनिकों की विधवाओं, पूर्व सैनिक और अपाहिज लोगों के लिए एक अलग वर्ग निर्धारित किया जा चुका है.

बाल श्रमिकों की पहचान के संबंध में एक दूसरी समस्या सामने आई है, वह है उम्र का निर्धारण. इस परियोजना ने चाहे जो कुछ भी किया है, लेकिन कम से कम यह बाल मज़दूरी के संदर्भ में पर्याप्त जागरूकता लाई है. अब यह हर कोई जानने लगा है कि 14 साल के बच्चे से काम कराना एक अपराध है. इसीलिए आज जब कोई बाल मज़दूरी की रोकथाम को लागू करना चाहता है तो एक बच्चा ख़ुद अपनी समस्याओं को हमें बताता है. उसके मुताबिक़, काम करने की न्यूनतम आयु 14 साल से कम नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसकी जांच-पड़ताल का कोई उपाय नहीं है.  ऐसे में हर कोई ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए ख़ुद को असहाय महसूस करता है. ये बच्चे न तो स्कूल जाते हैं और न ही इनके जन्म का कोई प्रमाणिक रिकॉर्ड होता है. इसीलिए ये कहीं से भी अपने जन्म प्रमाणपत्र का इंतज़ाम कर लेते हैं और लोगों को उसे मानने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं होता. लोगों को यह भी लगता है कि  माता-पिता द्वारा बच्चों को काम करने की छूट देने या उनके कारखानों में काम करने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि माता-पिता द्वारा काम पर लगाए जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद भी का़फी अधिक है. इन बच्चों को छोटी उम्र में ही काम पर लगा दिया जाता है और ऐसे लोगों की वजह से ही इन बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है.

एक बार फिर कहना होगा कि इन विशिष्ट स्कूलों में दिए जाने वाले व्यवसायिक प्रशिक्षणों में भी कुछ ख़ामियां हैं. हालांकि मौजूदा नियमों के मुताबिक़ व्यवसायिक प्रशिक्षण का प्रावधान तो है, लेकिन इसके लिए धन का अलग से आवंटन नहीं होता है, जिससे इस तरह के कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चलाने में कई मुश्किलें आती हैं. बाल मज़दूरी ख़त्म करने और व्यवसायिक प्रशिक्षण का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे पहले हमें उपर्युक्त पहलुओं को समझना बेहद ज़रूरी है. व्यवसायिक प्रशिक्षण के दौरान जिन उत्पादों का निर्माण होता है, उनका विपणन यदि ठीक ढंग से हो तो उसकी लागत पर आने वाले ख़र्च को हासिल किया जा सकता है. लेकिन यह सब परियोजना विशेष, उसके विस्तार और उत्पाद की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. साथ ही यह परियोजना का कार्यान्वयन करने वाले व्यक्तिपर भी निर्भर करता है कि वह इन सबका प्रचार-प्रसार ठीक ढंग से कर पा रहा है या नहीं.

यह देखने में आया है कि बाल मज़दूरी रोकने संबंधी नियम बन चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं किया गया है. बाल मज़दूरी को बढ़ावा देने वाले ख़ुद समाज के ग़रीब तबके से आते हैं, इसलिए ऐसे लोगों को हिरासत में लेने या दंडित करने के प्रति भी हमारी कोई रुचि नहीं दिखती. जहां लोग बाल मज़दूरी से परिचित होते हैं, वे इस अपराध से बच निकलने में सफल हो जाते हैं. अत: हमें यहां सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि बाल श्रम अधिनियम (निषेध एवं विनियमन) को सही मायनों में लागू किया जा रहा है या नहीं.

यह भी देखा जा रहा है कि जिन बाल मज़दूरों को मुक्त कराया जाता है, उनका पुनर्वास जल्द नहीं हो पाता, नतीजतन वे फिर  इस दलदल में फंस जाते हैं. ऐसे में हमें इसके ख़िला़फ कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता है. साथ ही 20 हजार रुपये की राशि एक बाल मज़दूर के पुनर्वास के लिए बेहद ही मामूली राशि है, जिसे बढ़ाए जाने की भी ज़रूरत है. ज़मीनी स्तर पर पुनर्वास को सही ढंग से लागू करने के लिए वित्तीय सहायता के साथ-साथ एक बेहतर पुनर्वास ख़ाका भी बनाया जाना चाहिए.

कई सरकारें बाल मज़दूरों की सही संख्या बताने से बचती हैं. ऐसे में वे जब विशेष स्कूल खोलने की स़िफारिश करती हैं तो उनकी संख्या कम होती है, ताकि उनके द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों और कार्यकलापों की पोल न खुल जाए. यह एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है और आज ज़रूरत है कि इन सभी मसलों पर गहनता से विचार किया जाए. यदि सरकार सही तस्वीर छुपाने के लिए कम संख्या में ऐसे स्कूलों की स़िफारिश करती है तो यह नियमों को लागू करने एवं बाल श्रमिकों को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने की दिशा में एक गंभीर समस्या और बाधा है. जब तक पर्याप्त संख्या में संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, ऐसी समस्याओं से निपटना मुश्किल ही होगा.

यहां बाल श्रम से निपटने की दिशा में न स़िर्फ नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है, बल्कि इसके लिए कार्यरत विभिन्न परियोजनाओं को वित्तीय सहायता आवंटित करने की भी ज़रूरत है. कुछ मामलों में बाल श्रमिकों की पहचान की ज़रूरत तो नहीं है, लेकिन इन परियोजनाओं में कुछ बुनियादी संशोधन की आवश्यकता ज़रूर है. इस देश से बाल मज़दूरी मिटाने के लिए अधिक समन्वित और सहयोगात्मक रवैया अपनाने की सख्त आवश्यकता है.


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24 Responses to “बाल मजदूरी देश के लिए अभिशाप”

  • aditi says:

    यार बहुत बुरा लगता है ये बाल अपराध कितना बुरा है हमे कुछ करना चाहिए इनको रोकने के लिए .

  • Radhe siam says:

    आप हमें बताये कि हम इस समस्या से कैसे निपटे हम इस समस्या क
    खिलाफ आवाज़ उठना
    चाहते है
    हम किस से मिले और कैसे काम करे

  • laik sayyed says:

    बालमज़ूरी एक बहोत बड़ा अपराध है ! हमारे देश में आज नजाने कितने बच्चे आज मज़दूरी करते है उन बच्चो को क्या हमारी तरहा जीने का हक़ नहीं !अगर इन बच्चो को जीने का हक़ है तो हमारी सरकार को बालमज़ूरी पैर सख्त से सख्त कारवाई करनी चाइये और मुफ्त पढाई की योजना शुरू करनी चाहिए
    जयहिंद !

  • amar says:

    #chauthiduniya

  • अब देश में मोदी सरकार आगई है . हर बेरोजगार के हाथ में रोजगार होगा . यह सरकार से मरी निवेदन होगा की जो लोग भी कई निजी दुकान या कीसी संस्था में काम कर राय हो उन सारे लोगो की न्यूनतम मजदूरी दर ३०० रु हर दिन हो मतलप की १०००० हजार की महीना हो ताकि भारत में कोई आदमी गरीब नारहे तभी समृद्ध भारत बनपाएगा . जय हिन्द जय भारत .

  • मै आनंद नगर हरमू रोड रांची में रहता हु और मेरे आस-पास कई बाल मजदुर बचे मिक्चर कारखाने कई बच्चे कपड़े दुकान में काम कर रहे है मैंने इसकी जानकारी डीसी ऑफिस में की पर इस सम्बन्ध में कोई करबई नहीं हुई सरकार दवारा योजना बहुत आई है पर यह कागजो तक सिमट कर रह गई है .

  • manglesh says:

    Kuch yesa kro ki samaj me apni chaap chod jawo . …… utho , jago , tainat ho jawo es danger problem ko dur karne k liye …… ek modi es desh ko thik nahi kar sakta . Sabhi ko apne andar modi ko jagana hoga ……….. jai hind …..

  • Santosh Bhagat says:

    समस्या बाल मजदूरी नही बल्कि इस समस्या को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों स्व है।
    एक संपन्न घर का बालक बाल मजदूरी नही करता परिस्थितियाँ मजबूर करती है।
    पिताजी बीमार है माँ खेतों में काम करती है। बच्चे पढना चाहते है क्या करे सरकारी स्कूल की हालत के बारे में बताने ळी आवासयकता नही है।
    वो क्या करे ? यदि कोई बालक अपनी माँ बाप की जीवन के लिए या
    परिवर के भरण पोषण के लिए मजदूरी करता है तो बालक के माँ बाप नही सरकार जिम्मेदार है। मै ये नही कहता बाल मजदूरी ख़त्म नही होनी चाहिये होनी चाहिए लेकिन उससे पहले उन परिस्थितियों को जिसमे कोई बाल मजदूरी के लिए प्रेरित होता है।

  • anil kumar pathak says:

    मै दैfनक जागरण में सन २००२ से बेरमो में कार्यरत हूँ.बल मजदूरी पर लेख पढ़ा. बहुत ही पसंद आया. हमारे क्षेत्र में भी ऐसी ढेर सारी समस्याए है. इसे दूर करने में आपकी सहायता मिलती है.

  • neeraj yadav says:

    आप हमें बताये कि हम इस समस्या से कैसे निपटे हम इस समस्या क
    खिलाफ आवाज़ उठना
    चाहते है
    हम किस से मिले और कैसे काम करे

  • उत्तर प्रदेश के देवबंद में। समझोता एक्सप्रेस ब्लास्ट कि साज़िश रचने में आरएसएस प्रमुख का नाम उजागर होने पर दारूल उलूम के उलेमाओ ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए आरएसएस जैसे सम्पर्दायिक संघठन पर पाबन्दी लगेए जेन कि मांग की ।
    दारूलूम के जनसम्पर्क अधिकरी अशरफ उस्मानी ने समझोता एक्सप्रेस ब्लास्ट के प्रमुख आरोपी स्वामी असीमानंद के इस खुलासे पर की समझोता एक्सप्रेस में हुए ब्लास्ट की जानकारी आरएसएस को ही नहीं थी बल्कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दुवारा धमकोकि योजना बनाये जेन पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा कि हम पहेले से ही कहते आ रहे है कि इन सम्प्रदायिक घटनाओ में आरएसएस का हाथ है इसलिए इस सम्प्रदायिक संघठन पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के साथ ही इस को दहशतगर्दि कि सूचि में शामिल किया जाए।
    अरबी के विद्वान मोलाना नदीमुल वाजदी ने कहा कि आरएसएस हिँदुतु कि एक विचार धारा का हिस्सा है जिसको हम पहले से कहते आ रहे है । उन्होने कहा कि समझोता एक्सप्रेस मक्का मस्जिद मलिगाओ बम ब्लास्ट घटनाए भगवा आतंकवाद कि साज़िश थी लेकिन इन घटनाओ में निर्दोष मुस्लिम युवाको को फसाया गया है।

  • Ashish raj says:

    kya kare bal majduri ka

  • ghanshayam dan says:

    यह बहुत ही अच्छा लिखा है आपने एक आईएस अधिकारी होने के नाते हैम आपसे येही आशा करते है कि आप बाल मजदूरी को कम करोगे |

  • a s tripathi says:

    सबी सरकारों को अपने राज्यों में ध्यान देना होगा ढाबा में बचों से कम लिया जाता है: ink ई तादाद बहुत hai

  • dsafsfsd says:

    अभिमन्यु कुमार यादव ने रपे किया था पैर कोई बोल नहीं ये तो भगवन ही जानते हैं हम और आप क्या कर सकते हैं

  • sanjay says:

    बाल मजदूरी भारत के लिये अभिशाप है ये तो सब जानते हैं परन्तु मैंने देखा है लोग उनसे कम लेने में नहीं हिचकते और तो और वयवहार भी ठीक नहीं करते हैं. बड़े से बड़े अफसर को समय पर सब कुछ रेड्डी चाहिए उसे कितना छोटा बच्चा कर रहा है ये मतलब नहीं है और वो ही अफसर ऑफिस में जा कर अपने डिपार्टमेंट की रिपोर्ट भेजता है की उसके डिपार्टमेंट में कोई बाल मजदूरी नहीं होती है. ये हर डिपार्टमेंट में हो रह है डिफेन्स में तो बाल मजदूर के बिना काम हो ही नहीं सकता असम और बंगाल में तो ये बहुत होता है . पर ये बताइए अगर वो बच्चे काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? क्या सरकार कुछ कर सकती है स्कूल min मिड डे मील तो स्टाफ के लिए और उनके परिवार के लिए है .अन्गंबदी का अनाज तो मुर्गियां खा रही हैं . मुर्गियों का भी कुछ नहीं कर सकते और मुर्गी वाले का भी कुछ नहीं हुआ. बताओ क्या किया जाये ?

  • harman says:

    very complicated essay
    please read it carefully
    if you read it then you will know that what is a situation of india
    baal majdori hamari city ke he nahi balki poore smaj ki situation hai.
    aam tor par amir log is par koi dhayan nahi dete par un chote chote bacho ke bare me bhe to koi chocho na yaar. . . . .. . . . . . . . . .. . . . .. . . . .. .. . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . .. . . .. . .. . . . . .. .. .. . . . .. . .. . . . . . . . .. … . . . .. . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . .. . . . . . . . . .. . . . . . .. … . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . .. . . . . . . .. . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . .. .. .. .. . . . . .. . . . . . .

  • बाल मजदूरी देश के लिए अभिशाप.बाल यह भी देखा जा रहा है कि जिन बाल मज़दूरों को मुक्त कराया जाता है मज़दूरी देश के माथे पर सबसे बड़ा कलंक का टीका है. इस दुनिया पर सभी बच्चों का समान हक़ होना चाहिए. सरकार की नैतिक जवाबदेही बनती है कि वह बाल मज़दूरी को अविलंब दूर करे है |बाल श्रमिकों की पहचान के संबंध में एक दूसरी समस्या सामने आई है, वह है उम्र का निर्धारण. इस परियोजना ने चाहे जो कुछ भी किया है, लेकिन कम से कम यह बाल मज़दूरी के संदर्भ में पर्याप्त जागरूकता लाई है. अब यह हर कोई जानने लगा है कि 14 साल के बच्चे से काम कराना एक अपराध है. इसीलिए आज जब कोई बाल मज़दूरी की रोकथाम को लागू करना चाहता है तो एक बच्चा ख़ुद अपनी समस्याओं को हमें बताता है. उसके मुताबिक़, काम करने की न्यूनतम आयु 14 साल से कम नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसकी जांच-पड़ताल का कोई उपाय नहीं है. ऐसे में हर कोई ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए ख़ुद को असहाय महसूस करता है. ये बच्चे न तो स्कूल जाते हैं और न ही इनके जन्म का कोई प्रमाणिक रिकॉर्ड होता है. इसीलिए ये कहीं से भी अपने जन्म प्रमाणपत्र का इंतज़ाम कर लेते हैं और लोगों को उसे मानने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं होता. लोगों को यह भी लगता है कि माता-पिता द्वारा बच्चों को काम करने की छूट देने या उनके कारखानों में काम करने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि माता-पिता द्वारा काम पर लगाए जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद भी का़फी अधिक है. इन बच्चों को छोटी उम्र में ही काम पर लगा दिया जाता है और ऐसे लोगों की वजह से ही इन बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है.

  • अमल कुमार विश्वास,पूर्णिया says:

    बाल मज़दूरी देश के माथे पर सबसे बड़ा कलंक का टीका है. इस दुनिया पर सभी बच्चों का समान हक़ होना चाहिए. सरकार की नैतिक जवाबदेही बनती है कि वह बाल मज़दूरी को अविलंब दूर करे.

  • santosh Verma says:

    dehradun में एक बड़े अधिकारी के घर से बल mazdoor पकड़ा गया, उस अधिकारी पर २० हज़ार रुपये जुर्माना भी हुआ. baal अधिकार सरंक्षण आयोग ने कार्रवाई की.

  • बाल मजदूरी अभिशाप है यह सही है पर कोई भी सरकार बच्चो के लिए कुछ करना नहीं चाहती केवल ढोंग करती है काफी बच्चे तो सरकारी अधिकारी और राज नेताओ के घर मैं काम करते
    संजीव कुमार दुबे संपादक हिंदी मासिक पत्रिका (थिंक pride )

  • Harsh says:

    बाल मजदूरी देश के लिए अभिशाप.

  • Someone says:

    I दोन’t know हाउ to रीड हिंदी. मैं अंग्रजी समझता हूँ. I become an एन्ग्लिश्मान….. Ye………. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान….. I become an एन्ग्लिश्मान…..

  • hemant says:

    हिंदी भाषा

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