धर्म, राजनीति और हमारा संविधान

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भारतीय संविधान में यह स्पष्ट तौर पर भावना व्यक्त की गई है कि राज्य और राजनीति को सभी प्रकार के धार्मिक विश्वासों से दूर रहना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और रोज़मर्रा की राजनीति में खुलेआम या छिपे तौर पर धर्म को वोट बैंक की राजनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. कांग्रेस पर हमेशा से अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है और ख़ुद को वह अल्पसंख्यकों के मसीहा के रूप में पेश करती रही है. लेकिन, ऐसी राजनीति के पीछे छिपा तथ्य अल्पसंख्यकों, ख़ासकर धर्म विशेष के मानने वालों के वोट पर क़ब्ज़ा जमाना है और शायद इसीलिए अल्पसंख्यकों की दशा आज भी कमोबेश वैसी की वैसी है, जैसी आज़ादी के व़क्त थी. पिछली सदी के अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध और नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध तक राजनीतिक दलों द्वारा धर्म के अप्रत्यक्ष इस्तेमाल की वजह से भारतीय राजनीति में धर्म अहम हो गया. इससे देश में समाज के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच की खाई चौड़ी हो गई.

राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक भावना के आधार पर भारतीय समाज का ध्रुवीकरण कर दिया और इसकी परिणति हमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के रूप में देखने को मिली. इसने न केवल समाज को बांट दिया, बल्कि दो बड़े धार्मिक समुदाय के लोगों के बीच संदेह के बीज बो दिए.

हालांकि धार्मिक भेदभाव ने दोनों समुदायों के एक छोटे से हिस्से को ही प्रभावित किया, लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता गया और ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसमें सहभागी होते चले गए. यही ख़तरनाक साबित हुआ. सभी मुद्दों पर धार्मिक मुलम्मा च़ढाकर देखा जाने लगा और पंथ निरपेक्ष लोगों की आवाज़ दबाई जाने लगी. भाजपा के शानदार उत्थान और नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में सत्ता हासिल करने के पीछे मुख्य कारण राम जन्मभूमि आंदोलन (अगर इसे आंदोलन कहा जा सकता है तो) और इस वजह से हिंदू मतदाताओं के वोटों का ध्रुवीकरण रहा. बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को मुसलमानों ने सहज नहीं लिया और वे विकल्प तलाशने लगे. उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी को इसका सबसे बड़ा फायदा हुआ.

लेकिन, पिछले आम चुनाव में यह रुझान बिल्कुल उल्टा देखने को मिला. राजनीतिक दलों का ट्रैक रिकॉर्ड और विकास चुनाव में मुद्दा बनकर उभरा और मतदाताओं ने धार्मिक मुद्दों के आधार पर चुनाव ल़डने उतरे क्षेत्रीय या राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को तगड़ा झटका दिया. बिहार की नीतीश कुमार की पार्टी जदयू इसका उदाहरण है, जिसने भाजपा गठबंधन का घटक होने के बावजूद पिछले संसदीय चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया. ऐसा स़िर्फ इसलिए, क्योंकि नीतीश कुमार अपने गठबंधन साथी को धार्मिक मुद्दों को हवा देने से रोकने में सक्षम हैं और राज्य के विकास को उन्होंने प्राथमिकता की सूची में तथा धार्मिक मामलों को निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा. साथ ही उन्होंने मुसलमानों सहित समाज के सभी वंचित समुदायों के उत्थान के लिए कार्यक्रम चलाए.

उनकी इन कोशिशों की इसलिए प्रशंसा की जानी चाहिए, क्योंकि राज्य कानून एवं व्यवस्था, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के मामले में पटरी पर आता दिखा. दु:ख की बात यह है कि लोग धार्मिक भावनाओं का दोहन और निजी फायदे के लिए समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा स़िर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह बात सभी धार्मिक समूहों पर लागू होती है. जो लोग राष्ट्रहित के बारे में सोचते हैं, उन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए. मुद्दा चाहे जो भी हो, देशहित की अनदेखी कर कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए. अगर किसी मैच में पाकिस्तान के हाथों भारत की हार हो जाती है तो इसका जश्न नहीं मनाया जाना चाहिए.

क्रिकेट के मैच में पाकिस्तान के हाथों मात खाने के बाद मैंने लोगों को रोशनी जलाकर और पटाखे फोड़कर ख़ुशियों का इज़हार करते देखा है. मैं ख़ुद बहुत हद तक पंथनिरपेक्षता को मानता हूं, ऐसे दृश्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाता और बिना सोए पूरी रात गुज़र जाती है. कोई भी भारतीय इस बात को बर्दाश्त नहीं करेगा. लेकिन ये बकवास मिसालें हैं, इसलिए इन्हें ख़ास तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए. प्रमुख धार्मिक समूहों को इस मामले में संयम और सहनशीलता का परिचय देना होगा. विघटनकारी ताक़तें ऐसी बातों को ब़ढावा देती हैं. उनका मक़सद ही भारत को कमज़ोर करना है. ऐसे लोग किसी धर्म के नहीं होते, बल्कि ख़ास वर्ग के होते हैं और पूरी दुनिया में देखे जा सकते हैं. उनका मुख्य मक़सद समाज को बांटना होता है. मैं तो यही कहूंगा कि वैश्विक आतंकवादी सही अर्थों में पंथनिरपेक्ष चरित्र के कहे जा सकते हैं, क्योंकि उनकी हरकतें किसी ख़ास धर्म को लक्षित नहीं होती हैं. हालांकि इस विषय पर बात करते हुए वंदे मातरम्‌ गाने के मसले पर देवबंद द्वारा दिखाई गई परिपक्वता, राष्ट्र गौरव के भाव और भावना की मैं सराहना करता हूं. जिस तरह से इस्लामी विद्वानों ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, वह प्रशंसनीय है और ज़रूरी है कि सभी इसका अनुकरण करें.

आरंभ में वंदे मातरम्‌ गायन को इस्लामी सिद्धांतों के ख़िला़फ बताया गया था, लेकिन बाद में देवबंद के उलेमाओं द्वारा यह गीत गाने के ख़िला़फ फतवा के बारे में कहा गया कि वे राष्ट्रगीत गाने से मुसलमानों को नहीं रोकेंगे. दृष्टिकोण में यह परिवर्तन आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के देवबंद जाकर बातचीत करने और कुछ मुस्लिम नेताओं से मुलाक़ात के बाद आया था. श्री श्री रविशंकर द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया था कि उलेमाओं ने वंदे मातरम्‌ के प्रति अपने निर्णय में बदलाव हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एक साथ लाने के उद्देश्य से किया है. सभी पार्टियों को इसे सही दिशा में सकारात्मक क़दम मानना चाहिए और इससे प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए. जहां तक भारतीय संविधान में वर्णित धर्म और धर्म निरपेक्षता से संबंधित उपबंधों की बात है तो धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल है.

यह भारतीय नागरिकों को इच्छानुसार धर्म विशेष को मानने की आज़ादी देता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार दिए गए हैं. संविधान के अनुच्छेद 25 में अंतःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का इस प्रकार उल्लेख किया गया है,  लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा.

हालांकि संविधान की प्रस्तावना में पंथ निरपेक्ष शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के ज़रिए शामिल किया गया, लेकिन संविधान के दर्शन में पंथ निरपेक्षता की भावना आरंभ से ही शामिल है. भारत बहु धार्मिक, बहु जातीय और बहु सांस्कृतिक बहुलता वाला देश है. विविधता में एकता भारतीय लोकाचार का सौंदर्य और विशिष्टता है. बहुलवाद भारतीय संस्कृति की कुंजी है. संविधान की प्रस्तावना में मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के आधार पर भारत को पंथ निरपेक्ष राज्य कहा जाता है. समानता की भावना इसका मूलाधार है. नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं बरता जाता. नागरिकों के अधिकार और राज्य के दायित्व एवं कर्तव्य के बीच संतुलन समान सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करता है. जहां तक भारतीय पंथ निरपेक्षता की अवधारणा की बात है तो यह पंथ निरपेक्षता के अमेरिकन और यूरोपीय मॉडल के सर्वथा विपरीत है.

भारतीय संविधान अमेरिकी और यूरोपीय मॉडल से अलग अवधारणा है. यह चर्च को राज्य से अलग करता है और सेपरेशन ऑ़फ वॉल मॉडल के रूप में जाना जाता है. संविधान सभा की बहसों में पंथ निरपेक्षता की अवधारणा पर विस्तार से विचार किया गया था. हमारे संविधान निर्माता भारतीय धर्म निरपेक्ष राज्य के बारे में क्या सोचते थे, इसे जानने का यह अच्छा स्रोत है. संविधान सभा की बहसों का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि धर्म निरपेक्षता की अवधारणा और मुद्दे को किस दिशा में ले जाया जाना चाहिए, इस बारे में वास्तव में आम सहमति थी. आख़िरकार यह सबको समान आदर के सिद्धांत पर आधारित है. इसे सर्वधर्म समभाव भी कहते हैं. इसे व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई और यह संविधान का हिस्सा भी बना. समस्त भारतवासियों को संविधान द्वारा अंगीकृत पंथ निरपेक्षता की भावना, जो कि सर्वधर्म समभाव की भावना पर आधारित है, का आदर करना चाहिए. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी हमेशा इस भावना को प्रचारित किया, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान.

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