प्रभाष जी की सोच की बुनियाद ही गांधी दर्शन और मूल्यों पर टिकी है. विनोबा जी के आंदोलन से भी वह सक्रिय तौर पर जुड़े रहे. वह सर्वोदय के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे. लोगों को जागरूक और संगठित करने का काम तो वह निरंतर करते रहे. उन्हें क़रीब से जानने वाले लोगों को पता होगा कि उनकी जीवन यात्रा की शुरुआत ही सर्वोदय से हुई थी. आचार्य विनोबा भावे इंदौर आए हुए थे और वहां एक माह से अधिक समय तक वह रुके थे. वहां उन्होंने अशोभनीय पोस्टर के खिला़फ एक अभियान चलाया था. विनोबा जी मानते थे कि अश्लीलता लोगों के मन पर हमला है. युवा प्रभाष जी इसमें काफी सक्रिय रहे. इस तरह से वह युवावस्था से ही गांधीवादी और सर्वोदयी विचारधारा से जुड़े रहे.
पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाष जी ने गांधीवादी विचारधारा के प्रवाह को आगे बढ़ाने का काम किया. प्रभाष जी की सोच की बुनियाद ही गांधीवादी दर्शन और मूल्यों पर टिकी है. विनोबा जी के आंदोलन में तो वह सक्रिय थे ही, हम सब उस आंदोलन में साथ थे. लेकिन, पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने विशेष योगदान दिया. वह गांधीवादी विचारधारा से जुड़े विभिन्न संगठनों और आयोजनों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे. पूरे देश के गांधीवादी विचारकों का सर्वोदय समाज सम्मेलन होता है. जेपी की जन्म शताब्दी पर पटना में जो सम्मेलन हुआ था, उसकी अध्यक्षता उन्होंने की थी, मेरे निवेदन पर. गांधी स्मारक निधि के वह ट्रस्टी भी थे. गांधी शांति प्रतिष्ठान की गतिविधियों से तो वह शुरू से जुड़े रहे. प्रतिष्ठान के विभिन्न कामों में वह सक्रिय रहे. सर्व सेवा संघ सर्वोदय आंदोलन का एक शीर्ष संगठन है. इस संगठन के मुखपत्र सर्वोदय जगत के वह संपादक रहे. भवानी बाबू थे, मैं भी संपादक रह चुका हूं इसके कई वर्षों तक हम लोग एक तरह से परस्पर सहकर्मी भी थे. गांधीवादी विचारों से जुड़ा होने के कारण परस्पर एक भावनात्मक लगाव भी होता है, इसलिए हम सभी पारिवारिक भी रहे. उम्र में वह मुझसे दो साल बड़े थे. उनके जाने से मुझे तो यही लग रहा है कि मैं अपने बड़े भाई से बिछुड़ गया. जिस दिन उनका निधन हुआ, उस दिन बारह घंटे पहले क़रीब ग्यारह बजे मेरी उनसे फोन पर का़फी देर तक बातचीत हुई थी. 17 नवंबर को सर्व सेवा संघ की ओर से हिंद स्वराज पर एक गोष्ठी आयोजित होनी है. इस गोष्ठी में उन्होंने शामिल होने का आश्वासन दिया था. इसमें एक पुस्तक का विमोचन भी किया जाना है. उन्होंने इसके लिए अपनी सहमति जताई थी. पीस फाउंडेशन के साथ मिलकर हम सभी एक पुस्तक उनके संपादन में निकालना चाहते थे, उनसे इस बारे में भी चर्चा हुई थी. पत्रकारिता के क्षेत्र में जो भूमिका निभानी थी, उसे तो वह निभा ही रहे थे, लेकिन गांधीवादी विचारधारा से जुड़ा होने के कारण जितना कुछ किया जा सकता था, इसमें भी वह रचनात्मक योगदान दे रहे थे.
प्रभाष जी संपूर्ण क्रांति आंदोलन की गतिविधियों में भी सक्रिय रहे. गोयनका जी के सहयोग से संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समर्थन में दिल्ली से दो पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही थीं, अंग्रेजी में एवरी मेंस और हिंदी में प्रजा नीति. वह इससे भी जुड़े रहे. प्रभाष जी का जाना गांधीवादी विचारधारा की व्यक्तिगत क्षति भी है. वह व्यक्ति इतना निष्ठावान था कि उसने कभी भी धन, धर्म या सत्ता की राजनीति को स्वयं पर हावी नहीं होने दिया.
पत्रकारिता के क्षेत्र में मूल्यों की लड़ाई में वह अकेले योद्धा थे. वह सैनिक थे और सेनानायक भी. उन्होंने जो कुछ शुरू किया, उसका प्रवाह रुकने न पाए, यह आगे आने वाली पीढ़ी को देखना है. कई बार हमारे बीच चर्चा हुई. जीवन के आख़िरी दिनों में वह का़फी व्यथित रहे. पिछले चुनावों के दौरान जिस तरह से अख़बारों ने पैसे लेकर विज्ञापन को समाचार के रूप में परोसने का काम किया, इससे वह का़फी बेचैन थे. उन्होंने यात्राएं कीं, भाषण दिए और घूम-घूम कर अख़बारों के इस रवैये के ख़िला़फ लोगों को एकजुट करने की कोशिश की. इसके खिलाफ उन्होंने एक तरह से मुहिम ही छेड़ दी थी. वह चाहते थे कि कहीं तो लोगों की चेतना में यह बात आए कि हम जो करते हैं उसके कुछ उसूल होते हैं, कुछ धर्म होता है और हर चीज बाज़ार में बेच देने के लिए ही नहीं होती है.
जहां तक उनके व्यक्तित्व की बात है, तो वह बहुत ही आत्मीय व्यक्ति थे. किसी के भी साथ उनका रिश्ता प्रेम का ही होता था. विचारों में अंतर हो सकता है. ऐसे लोगों को मैं जानता हूं जिनके साथ उनके विचार कतई नहीं मिलते, लेकिन उनसे भी प्रभाष जी का प्रेम का रिश्ता ही था, मानवीय रिश्ता था. प्रभाष जी रिश्ते को क़ायम रखना जानते थे. निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर गांधी शांति प्रतिष्ठान में दर्शनार्थ रखा हुआ था. वहां लालकृष्ण आडवाणी भी आए थे, उनके पार्थिव शरीर पर श्रद्धासुमन अर्पित करने. मुझे अचानक ध्यान आया कि प्रभाष जी ने कितना कुछ लिखा था उनके ख़िला़फ. लेकिन अहिंसक वृत्ति का जो व्यक्ति होता है, उसके वैचारिक विश्लेषण में तीक्ष्णता और तीव्रता चाहे जितनी हो, पर उसमें क्षुद्र प्रतिहिंसा नहीं होती है. प्रतिहिंसा, पुनर्प्रतिहिंसा को जन्म देती है, लेकिन एक बेबाक टिप्पणी, विश्लेषण या विचारों को दृढ़तापूर्वक रखने में दुश्मनी का भाव नहीं रहता. आडवाणी जी आए, वहां रुके कुछ देर तक और उन्होंने श्रद्धासुमन अर्पित किया. अहिंसक वृत्ति का यह एक अच्छा उदाहरण है कि जिसका विरोध उन्होंने ख़ूब किया, वह भी सोचता है कि एक निष्ठावान और ईमानदार व्यक्ति अब उनके बीच नहीं है.
पत्रकार के तौर पर प्रभाष जी ने पूरे विश्लेषण में व्यक्तियों के कृतित्व, उनकी सोच और उनके नेतृत्व में चल रहे कार्यक्रमों का विश्लेषण किया, जैसे कोई शव परीक्षण. लेकिन, उस व्यक्ति विशेष के प्रति कभी भी उन्होंने घृणा का भाव नहीं रखा. चंद्रशेखर एवं विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके जैसे ही भारतीय राजनीति में नई धारा पैदा करने वाले जो भी व्यक्ति रहे, के प्रति सहमति और असहमति के सभी बिंदु उन्होंने रखे. उनके साथ मैत्री का भाव रखते हुए भी उन्होंने आलोचक की भूमिका निभाई. ऐसा इसलिए, क्योंकि किसी के प्रति उनके मन में घृणा का भाव नहीं था. हृदय में अगर हिंसा का उदय होता है तो वह घृणा, ऩफरत या बदले के भाव से होता है. लेकिन वैचारिक बुनियाद पर, मूल्यों के आधार पर जब कोई विश्लेषण करता है तो उसमें एक प्रकार की तटस्थता रहती है. प्रभाष जी में तटस्थता का यह भाव मृत्युपर्यंत नज़र आया.
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