नौ नवंबर, 2009 का दिन. भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह दिन काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा. इस दिन राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के तथाकथित सदस्यों ने न केवल समाजवादी पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक अबू आज़मी को हिंदी में शपथ ग्रहण करने से रोका, बल्कि उनके साथ धक्कामुक्की की और उन्हें थप्पड़ भी मारे. पूरा राष्ट्र सदन के बीचोबीच इस मंजर को देखकर हैरान रह गया. महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के विधायकों की हरक़तों को देखकर वे स्वयं को असहाय महसूस कर रहे थे. मैं तो इसे मुंबई पर हुए 26/11 के आतंकी हमले से भी ज़्यादा बदतर कहूंगा. देश के लोगों ने 26/11 की घटना, जो कि देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा ख़तरा थी, को अपनी आंखों से देखा था. लेकिन तब लोगों को राहत इस बात की थी कि उस हमले और उसे अंजाम देने की साज़िश विदेश में रची गई, लेकिन भारतीय लोकतंत्र पर 9/11 के हमलावर दुर्भाग्य से हमारी ही व्यवस्था के हिस्से हैं. इसे विडंबना ही कहिए कि हम भारत के लोगों, जो ऐसे कट्टरपंथियों से प्रभावित हुए और जिन्होंने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना, के अलावा किसी ने भी उन्हें कठघरे में नहीं रखा. संकीर्ण सोच द्वारा निर्देशित होने के कारण हम ऐसे विघटनकारी तत्वों को परास्त करने और संदर्भों को राष्ट्रहित के वृहद फलक पर रखने में नाकाम रहे. हाल के कुछ दिन प्रदेश की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय राजनीतिक क्षत्रपों के भड़काऊ भाषणों के गवाह रहे हैं. इस पूरे फसाद की जड़ राजनीति में बाल ठाकरे के उदय में निहित है. एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उनका उत्थान विशुद्ध रूप से क्षेत्रीय भावनाओं के दोहन से हुआ है.
बाल ठाकरे ने ऩफरत की जो आग सुलगाई थी, उनके भतीजे राज ठाकरे उस आग को हवा देकर और भी भड़का रहे हैं. क्षेत्रवादी संकीर्ण मानसिकता को उभार कर राज ठाकरे दिन- प्रतिदिन पहले से ज़्यादा आक्रामक होते जा रहे हैं. महाराष्ट्र विधानसभा में 9/11 को जो कुछ हुआ, वह बस इसकी ही परिणति है.
चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि भड़काऊ बयानबाजी कैंसर का रूप लेती जा रही है और मुख्यमंत्री भी भेदभाव पूर्ण बयान देकर संवैधानिक प्रावधानों के प्रति असम्मान प्रकट कर रहे हैं. कथित तौर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि बिहारी मज़दूरों को उनके राज्य में रोज़गार नहीं मिलना चाहिए. पूरे राष्ट्र ने उन्हें टीवी पर यह कहते हुए देखा था, लेकिन अगले ही दिन वह अपने बयान से मुकर गए. उन्होंने अपने ही कहे शब्दों को हजम कर डाला, लेकिन इसका नुक़सान तो हो ही चुका था. यहां तक कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, जो अपेक्षाकृत ज़्यादा परिपक्व और संतुलित नेता मानी जाती हैं, ने भी बिहार और उत्तर प्रदेश से आजीविका की तलाश में दिल्ली आने वाले लोगों के विरुद्ध बयानबाज़ी की.
ये तो बस कुछेक दृष्टांत हैं, लेकिन यह चलन बेहद चिंताजनक है. ऐसा इसलिए, क्योंकि ये राजनेता संवैधानिक भावना के अनुरूप व्यवहार की शपथ लेते हैं और व्यवहार इसके सर्वथा विपरीत करते हैं. नेताओं के इस तरह से बोलने और व्यवहार करने के पीछे वजह बस एक है, वोट की राजनीति. कई मामलों में संभव है कि नेता ऐसा कुछ भी करना न चाहते हों, जो संवैधानिक भावना के विरुद्ध हो, लेकिन वे तो बस स्थानीय जनभावना का दोहन कर वोट को अपने पक्ष में करना चाहते हैं. जबकि दूसरे मौक़ों पर इनका व्यवहार बिल्कुल अलग होता है. मैं तो इन्हें मनोविदालिता (स्कीजोफ्रेनिया) से ग्रस्त राजनेता कहूंगा. ऐसे राजनेता, जिनका व्यक्तित्व ही खंडित है. चुनाव आने पर ऐसे नेताओं को जब वोट की ज़रूरत होती है, तब ये ज़मीन पर साष्टांग बिछ जाते हैं और लोगों से समर्थन की अपेक्षा रखते हैं. हां, ठाकरे बंधुओं को आप अपवाद मान सकते हैं.
मुंबई पर जब आतंकी हमला हुआ था तो राज ठाकरे और उनके मराठी मानुष कहां थे? इस महानगर और राष्ट्र की प्रतिष्ठा को उन बहादुर कमांडो ने बचाया, जिनकी प्रादेशिक पहचान के बारे में किसी को अब भी कुछ पता नहीं है. मनसे और उनके तथाकथित मराठी मानुष अपनी मुंबई को बचाने सामने क्यों नहीं आए? हिंदी में बात करने वाले कमांडो को उन्होंने वापस जाने को क्यों नहीं कहा? आ़खीर क्यों दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बिहार एवं उत्तर प्रदेश के लोगों से समर्थन और वोट पाने की अपेक्षा रखती हैं तथा बिहार के लोगों को चुनाव में पार्टी का टिकट भी देती हैं? हमें उनसे इसका जवाब चाहिए.
अब इसे क्या कहेंगे कि हिंदी में शपथ ग्रहण के मुद्दे पर जो विधायक महाराष्ट्र विधानसभा में समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आज़मी से धक्कामुक्की कर रहे थे, विभिन्न चैनलों पर अपनी शर्मनाक हरक़त को सही ठहराने के लिए हिंदी में ही दलील देते देखे गए. वे इस बात का संकल्प क्यों नहीं लेते कि उन्हें जो कुछ भी कहना है, उसे मराठी में ही कहेंगे?
आइए, इस संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान का मूल्यांकन करें. भारतीय संविधान में इस मुद्दे पर ज़रा भी संशय नहीं है, सब कुछ स्पष्ट है. भारतीय संविधान की शुरुआत प्रस्तावना से होती है और प्रस्तावना में ही नागरिकों को अवसर व प्रस्थिति की समानता और विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख है. संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार स्वयं में पवित्र भावना को समेटे हैं और संविधान का मूल आधार हैं. मौलिक अधिकार स्पष्ट रूप से रोज़गार के अवसर और समानता की गारंटी देते हैं. संविधान के अनुच्छेद 16 में रोज़गार के समान अवसर उपलब्ध कराने और समानता की गारंटी की बात कही गई है. संविधान धर्म, नस्ल, जाति और जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों से कोई भेदभाव नहीं करेगा. संविधान के अनुच्छेद 15 में यह बात कही गई है. ठीक इसी तरह संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है.
संविधान के खंड चार-ए में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लेख है. भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता अक्षुण्ण रखने, धार्मिक-भाषायी और क्षेत्रीय विविधता वाले देश में आपसी भाईचारे को ब़ढावा देने के लिए नागरिकों से मूल कर्तव्यों के पालन की अपेक्षा की गई है. उनसे यह भी अपेक्षा की गई है कि वे महिलाओं के सम्मान की रक्षा करेंगे. जहां तक आधिकारिक भाषा का सवाल है तो भारतीय संविधान के खंड 17 का अनुच्छेद 343 बताता है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और लिपि देवनागरी. राजकाज में भारतीय अंकों के अंतराराष्ट्रीय रूप के इस्तेमाल का उल्लेख है. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 351 में लिखा गया है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार संघ की ज़िम्मेदारी होगी, ताकि भारत की बहुरंगी संस्कृति में यह अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके. संविधान के अनुच्छेद 120 में ज़िक्र है कि संसदीय कार्यवाही की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी. अनुच्छेद 210 में राज्य विधानसभा की कार्यवाही की भाषा क्या होगी, इस बारे में उल्लेख है. इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि राज्य विधानसभा की कार्यवाही हिंदी, अंग्रेजी या उस राज्य की आधिकारिक भाषा में होगी. उपरोक्त संवैधानिक प्रावधानों से यह बात पूरी तरह सा़फ है कि किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह किसी को हिंदी में शपथ ग्रहण से रोके और किसी को भी देश के किसी भी हिस्से में रोज़गार या आजीविका से मना करे. विशेष प्रावधान वाले राज्य जैसे जम्मू और कश्मीर इसके अपवाद हैं.
अगर कोई भी संवैधानिक भावना का उल्लंघन करता है तो स्पष्ट रूप से उसकी निंदा की जानी चाहिए, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध क्यों न हो. लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं रहा है. यहां तक कि प्रमुख राजनीतिक दल भी वोट बैंक की राजनीति को ही ध्यान में रखकर व्यवहार करते हैं. राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ इसके समर्थन में वैधानिक प्रावधानों की भी ज़रूरत है, ताकि क़ानून तोडने वालों को फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर दंडित किया जा सके. बल्कि होना तो यह चाहिए कि चुनाव आयोग को ऐसे दलों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. अगर कड़े क़दम नहीं उठाए गए तो यह भारतीय सामाजिक ढांचे व राजनीति और अंततः लोकतंत्र की बुनियाद को तहस-नहस कर देगा.
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