दोराहे पर पाकिस्तान का लोकतंत्र

अब ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश (एनआरओ) से जुड़े विवादों को सुलझा लिया गया है और लोग ख़ुशी से झूम रहे हैं. कुछ राजनीतिक समीक्षक यह मान रहे हैं कि इससे पाकिस्तान की व्यवस्था और लोकतंत्र को मज़बूती मिलेगी, क्योंकि उच्चतम न्यायालय का यह फैसला अभिमानी, अति महत्वाकांक्षी और भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेताओं के लिए एक चेतावनी है.

निश्चित तौर पर यह एक उल्लेखनीय फैसला है, लेकिन राष्ट्रहित चाहने वाले राजनीतिज्ञों के लिए इससे सीख लेने वाली क्या बात है? और, क्या इससे पाकिस्तान की राजनीति के भविष्य पर कोई असर पड़ेगा? इस पर विचार करने के लिए दो मूल बातें हैं. हालांकि एनआरओ हमेशा से विवादित रहा है और इस मुद्दे पर बहस हो सकती है. इसके अलावा लोग इस अध्यादेश के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद ही इसे सुलझा लेने के लिए बेचैन थे. राजनीतिक तर्कों के कारण इस मुद्दे के दरकिनार होने की आशंका हमेशा से थी. इसे कतई नकारा नहीं जा सकता कि यदि आस़िफ अली ज़रदारी और पीएमएल-एन (ख़ासकर, शरी़फ बंधुओं) के बीच संबंध बेहतर होते तो संभवत: यह समझौता सफल हो सकता था. इसके अलावा यदि राष्ट्रपति सिविल-मिलिट्री संबंधों में बदलाव की कोशिश की घातक ग़लती नहीं करते और अधिनियम के तहत दोषी नहीं होते तो उनके कई विरोधी उनके ख़िला़फ एकजुट नहीं होते.

ऐसा नहीं है कि इस फैसले का स्वागत नहीं किया गया. फिर भी, यह एक तथ्य है कि कुछ गुप्त ताक़तें राष्ट्रपति के संदिग्ध व्यवहार, फैसले और दूसरी कई गुप्त बातों को लेकर उन्हें उजागर करने के लिए अपना पक्ष तैयार कर रहे थे. इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि आस़िफ अली ज़रदारी ने एनआरओ मामले में सहयोग किया और कोई भी जानकारी छुपाने की कोशिश नहीं की. हालांकि एनआरओ से संबंधित मामलों में वित्तीय भ्रष्टाचार का भी मसला शामिल था और आपराधिक मामलों में सैनिक तानाशाह परवेज़ मुशर्ऱफ भी शामिल थे, पर तकनीकी तौर पर इसका ज़िक्र नहीं किया गया.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उच्चतम न्यायालय वास्तव में इस मुद्दे पर अपनी पूछताछ के ज़रिए किस निष्कर्ष पर पहुंचता है. ज़ाहिर तौर पर, यह मुशर्ऱफ और उनके क़रीबियों, जिन्होंने उनके संदिग्ध कामों में साथ दिया, को अपनी जद में लेगा. अब शीर्ष न्यायालय ने राज्य की संस्थाओं को सहयोग देना शुरू किया है. पहले यह बिखरी हुई थीं, यदि ये सही होतीं तो यह समझौता बहुत पहले ही पूरा हो चुका होता. आम लोगों की धारणाओं को कोई दरकिनार नहीं कर सकता है. न्याय में लोगों की आस्था बरकरार रहने के लिए भी यह का़फी अहम है. साथ ही इसलिए भी कि लोग किसी न्याय को राजनीतिक या दूसरे पूर्वाग्रह से ग्रसित न समझें. न्यायिक व्यवस्था में विश्वास की बहाली बहुत ही अहम है. इसके अलावा राज्य की दूसरी सभी संस्थाओं के प्रति ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी है, ताकि  इन संस्थाओं को मज़बूत किया जा सके. एनआरओ का फैसला विश्वास और क़ानून को मज़बूत करने वाला था.

लेकिन यदि एक सवाल पूछा जा रहा है, चाहे वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सिविल संस्थाओं को मज़बूत करने के फैसले से जुड़ा हो, तो जवाब नकारात्मक ही होना चाहिए. आम धारणाओं के प्रति हमारा यह नज़रिया है कि नकारात्मक जवाब सैन्य शक्तियों और उनकी क्षमता को मज़बूत करता है, ताकि राजनीतिक हितों के साथ छेड़छाड़ की जा सके. यह फैसला सिविलियन सरकार के ख़िला़फ सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बढ़ रहे गुस्से से मेल नहीं खाता है. यह अपेक्षा से कहीं अधिक है. कैरी-लुगर क़ानून और दूसरे मसलों पर इस्लामाबाद और जीएचक्यू (सैन्य मुख्यालय) के बीच टकराव बढ़ा है. यदि कुछ नहीं भी होता है तो संयोग से सेना ही उच्चतम न्यायालय के फैसले की लाभार्थी होगी. एक अपमानित राष्ट्रपति के पास बेहद ही कम संभावनाएं हैं कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी संस्था से निपट सके.

प्रेसिडेंसी और सेना मुख्यालय के बीच तनाव यह ज़ाहिर करता है कि यह तीसरी बार है, जबकि राजनीतिक वर्ग ने सेना की शक्तियों में कटौती की कोशिश की है. पहला प्रयास ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने किया था, जिनके अधिकार क्षेत्र में अपेक्षाकृत कमज़ोर सेना थी और उन्होंने इसकी शक्तियों में कटौती की पर्याप्त कोशिश की थी. उन्होंने यह कोशिश आंशिक तौर पर संस्थागत तंत्र मसलन ज्वाइंट ची़फ ऑ़फ स्टाफ कमिटी और रक्षा मंत्रालय के ज़रिए की. उन्होंने यह भी कोशिश की कि सभी सेवा प्रमुखों को प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र के अंदर रखा जाए. हालांकि उन्होंने दिल से इन सुधारों की कोशिश नहीं की और सेना के सशक्तिकरण के साथ ही उनका अंत हो गया.

नवाज़ शरी़फ ऐसे दूसरे नेता थे, जिनके पास इस तरह का समान अवसर था. यह माना गया कि इस संबंध में वह कुछ कड़े फैसले लेंगे, क्योंकि वह सबसे शक्तिशाली जाति समूह से ताल्लुक़ रखते थे और सेना के शीर्ष रैंक के अधिकारियों में अपनी पैठ जमाने में भी सफल हो गए थे. संभवत: सेना ने उनकी योग्यता पर इसलिए शक़ किया, क्योंकि उन्होंने आंशिक और अस्थायी तौर पर अधिकारियों में विभाजन कर दिया. जनरल मुशर्ऱफ की जगह सेनाध्यक्ष पद पर जनरल ज़ियाउद्दीन की नियुक्ति से लगा कि इस फैसले में सेना के कई शीर्ष अधिकारियों की सहमति है. फिर भी, शरी़फ ने यह मौक़ा इसलिए गंवा दिया, क्योंकि उनके आख़िरी फैसले की धज्जियां उ़ड़ा दी गईं.

हाल में आस़िफ अली ज़रदारी ने सेना की असाधारण शक्तियों में कटौती की बात सोची. इसके लिए उन्होंने अमेरिका को मनाया कि वह सेना की अपेक्षा सिविलियन सरकार की मदद करे. ज़रदारी ने यह सहज आकलन किया कि उनकी ओर से फैसला लेने का यह सही समय है. एक दशक तक मुशर्ऱफ के शासन की वजह से सेना अंधेरे में छुपी हुई थी और लोग राजनीतिक संस्थाओं को मज़बूत करने तथा सैन्य बलों की शक्तियों में कटौती की बात कर रहे थे. ज़रदारी की तरकीब थी कि इस काम के लिए इस्लामाबाद और वाशिंगटन की साझेदारी ज़रूरी है.

लेकिन ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ज़रदारी सेना को न समझ पाने की कमज़ोरी का शिकार हो गए. साथ ही इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए संस्थागत गतिशीलता, आंतरिक भागीदारी और संस्थागत सुरक्षा अवरोधों को न समझ पाना भी उनके लिए समस्या बनी. उदाहरण के लिए उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि वह सभ्य समाज, जिसने सेना की मुख़ाल़फत की थी, वही आईएसआई और सेना को कमज़ोर करने वाले अधिनियम कैरी-लुगर के प्रावधानों का भी विरोध करने लगेगा. दरअसल, बहुत से राजनीतिज्ञ यह समझने में असफल रहे कि रक्षा मंत्रालय की क्षमताओं को बढ़ाने, इसकी शक्तियों को सभ्य समाज के अनुरूप बनाने और फैसला लेने वाला तंत्र बनाने के लिए इसमें नई जान फूंकने की ज़रूरत है. रक्षा मंत्रालय राजनीतिक सरकार और सेना के बीच महज़ संस्थागत कड़ी भर है. इसकी क्षमता दयनीय है. पाकिस्तानी राजनेता समय और मुद्दे के अभाव में ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं.

अब राष्ट्रपति 17वें संशोधन को निरस्त करने की समय सीमा बढ़ा सकते हैं, ताकि वह सेना प्रमुख के कार्यकाल को बढ़ाने या फिर उसकी नियुक्ति में अपना अहम किरदार निभा सकें. यह उनका आख़िरी, लेकिन अस्थायी जीवनदान है. वह अमेरिका के ख़िला़फ तीखे तेवर अपना कर भी अपने लिए कुछ व़क्त ख़रीद सकते हैं, लेकिन ये सभी अस्थायी रणनीतियां हैं. वह वक्त अभी दूर है, जब एक बार फिर से जम्हूरियत को नेतृत्व का अगला मौका मिले.