कुंभ मेला शुरू होने में अब देर नहीं

हरिद्वार में उत्तराखंड के पहले महाकुंभ का शासकीय मेलाकाल शुरू होने में अब चंद दिन शेष हैं. सरकारी भाषा में कहें तो सदी का दूसरा महाकुंभ बस शुरू ही होने वाला है. सदी का पहला महाकुंभ 2001 में प्रयाग में हुआ था.

हरिद्वार महाकुंभ 2010 का सरकारी मेलाकाल एक जनवरी से 30 अप्रैल 2010 के बीच चार महीनों के लिए है, लेकिन सच्चाई यह है कि इन 120 दिनों में केवल तीन दिन ही कुंभ स्नान होना है. सरकारी मेला कैलेंडर में यूं तो इस बीच कुल मिलाकर 11 स्नानों की सूची जारी की गई है, पर कुंभ के मुख्य स्नान तो तीन ही होते हैं, जब संन्यासियों की शाही सवारियां निकलती हैं. उनमें भी एक स्नान ही सर्वप्रमुख माना जाता है.

परंपरा है कि अलग-अलग कुंभनगरों में ग्रह-नक्षत्रों की भिन्न स्थिति के चलते कुंभ के प्रमुख स्नान की तिथियां भी अलग होती हैं. हरिद्वार में महाकुंभ का सबसे बड़ा और प्रमुख स्नान मेष संक्रांति को होता है. गुरु के कुंभ राशि में प्रवेश के चलते यह दिन सूर्य के मेष राशि में संक्रमण का यानी मेष संक्रांति का दिन होता है. इसी समय हरिद्वार में फ़सल कटने के उल्लासपर्व बैसाखी का परंपरागत स्नान भी संपन्न होता है. इस प्रमुख स्नान के अलावा संन्यासियों के तेरह अखाड़े हरिद्वार में महाशिवरात्रि और चैत्र अमावस्या का स्नान भी करते हैं. लेकिन इन तीन स्नानों के अलावा शासन अपने द्वारा घोषित मेलाकाल के चार महीनों में पड़ने वाले विभिन्न सामान्य पर्व-स्नानों को भी कुंभ स्नान कहकर प्रचारित करता है. ऐसे प्रचार सरकारी स्तर पर कुंभ स्नानार्थियों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर बताने में भी सहायक होते हैं.

सरकारी मेला अवधि के चार महीनों के लिए हरिद्वार एक नए, पर अस्थायी कुंभ ज़िले में परिवर्तित हो जाएगा. जिन दिनों हरिद्वार उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले का हिस्सा था, तब हरिद्वार के अलावा बिजनौर, टिहरी, पौड़ी और देहरादून ज़िलों से थोड़ा-थोड़ा भाग काटकर अस्थायी कुंभ ज़िला बनाया जाता था. बाद में 1988 में हरिद्वार जब ज़िला बन गया तो बिजनौर का वह हिस्सा, जो कुंभ के निमित्त हरिद्वार में मिलाया जाता था, स्थायी रूप से हरिद्वार का हिस्सा बन गया. वस्तुत: कुंभ क्षेत्र हरिद्वार से ऋषिकेश और उसके भी आगे लक्ष्मण झूला तक फैला हुआ है, इसलिए इस पूरे क्षेत्र की सीमाएं उत्तराखंड बनने के बाद हरिद्वार के अलावा अब अन्य तीन ज़िलों देहरादून, टिहरी और पौड़ी से मिलती हैं. अस्थायी कुंभ ज़िले में पूरा हरिद्वार और उसके सीमावर्ती इन्हीं तीन ज़िलों के कुछ हिस्से मिला दिए जाएंगे. इनकी प्रशासनिक व्यवस्था का जिम्मा कुंभ मेलाधिकारी और सुरक्षा एवं क़ानून व्यवस्था का जिम्मा पुलिस उपमहानिरीक्षक-कुंभ के पास रहेगा. उत्तराखंड शासन ने मेलाधिकारी के रूप में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आनंदवर्द्धन और कुंभ पुलिस प्रमुख के रूप में डीआईजी आलोक शर्मा की नियुक्ति महीनों पहले करके उन्हें हरिद्वार में तैनात कर दिया है.

प्रशासनिक दृष्टि से मेला अवधि के चार महीनों के लिए संपूर्ण कुंभ ज़िले को बत्तीस सेक्टरों में विभाजित किया जाएगा. हर सेक्टर को एक सेक्टर मजिस्ट्रेट और एक पुलिस उपाधीक्षक के सुपुर्द कर दिया जाएगा. हर सेक्टर में प्रशासन एक थाना, एक अस्पताल और राशन की एक दुकान खोलेगा. सभी सेक्टरों में बिजली और पानी का समुचित प्रबंध किया जाएगा. बड़ी संख्या में अस्थायी शौचालयों और मूत्रालयों की व्यवस्था सारे कुंभ क्षेत्र में की जाएगी. सामान्य बीमारियों और महामारियों से बचाव के लिए सा़फ-सफाई के पुख्ता इंतज़ाम किए जाएंगे. देश भर से कुंभ स्नान के लिए हरिद्वार आने वाले साधु-संतों, उनके अखाड़ों और महामंडलेश्वरों के लिए सुविधायुक्त अस्थायी टेंट कॉलोनियां विकसित की जाएंगी.

इन सारे कार्यों के साथ-साथ पूरे मेला क्षेत्र की अनेक सड़कों की मरम्मत और कुछ के नवनिर्माण, अनेक स्थायी व अस्थायी पुलों के निर्माण, नए विद्युत उपकेंद्रों और जलापूर्ति के लिए पानी की टंकियों के निर्माण आदि कार्य हुए हैं और हो रहे हैं. लेकिन यह सारा काम अख़बारी चर्चाओं और सुर्ख़ियों का विषय बनता रहा है, बन रहा है और कुंभ मेले के दौरान भी बनता रहेगा. मज़े की बात यह है कि पिछले कई महीनों से कुंभ, उससे जुड़ी विभिन्न विभागीय योजनाओं की चर्चा, संबंधित निर्माण और विकास कार्य, उन कार्यों की गुणवत्ता, उनमें प्रयुक्त होने वाली निर्माण सामग्रियों का स्तर, उनका विस्तार से वर्णन, उन कार्यों के पूरा होने की अवधि, इसके बहाने किए गए तथाकथित लेनदेन की मसालेदार गपशप आदि कुंभ की अख़बारी चर्चाओं के प्रिय विषय रहे हैं. फिर धीरे-धीरे ये सब राजनीतिक दलों एवं राजनेताओं के बीच विवाद और परस्पर विरोधी बयानबाज़ियों का रूप भी ले चुके हैं.

इन दिनों केंद्र और उत्तराखंड राज्य के रिश्तों में भी बड़ी नज़ाकत है. आज़ादी के बाद पहला मौक़ा है कि हरिद्वार के जनप्रतिनिधि केंद्र और राज्य में मंत्रिपदों पर सुशोभित हैं. हरिद्वार के सांसद हरीश रावत केंद्र सरकार में मंत्री हैं तो हरिद्वार के विधायक प्रदेश काबीना के वरिष्ठ सदस्य हैं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी हैं तो दूसरे वरिष्ठ भाजपाई. प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो दिल्ली में कांग्रेस का बोलबाला है. दोनों दल, दोनों सरकारें और दोनों ओर के राजनेता कुंभ कार्यों का श्रेय लेने के चक्कर में एक दूसरे की थुक्का-फजीहत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते.

राज्य सरकार के पास पिछले कई दिनों से लगातार एक ही मुद्दा बना हुआ था कि केंद्र सरकार कुंभ के नाम पर कोई सहायता नहीं दे रही है और 400 करोड़ रुपये देने का वादा करके भी मुकर रही है. छोटा सा राज्य उत्तराखंड अकेले अपने सिर महाकुंभ का इतना भारी बोझ ले तो कैसे ले. राज्य का आरोप था कि केंद्र जो 300 करोड़ रुपये की सहायता राशि वार्षिक अनुदान के रूप में देता है, उसी में से कुंभ सहायता निकालने की चालबाजी कर रहा है. लेकिन केंद्र से हरिद्वार आई योजना आयोग की टीम ने 14 दिसंबर को ही स्पष्ट कर दिया था कि पिछले वर्ष जो 300 करोड़ रुपये राज्य की सहायता के लिए दिए गए थे, वह राशि इस वर्ष दस प्रतिशत बढ़ाकर यानी 330 करोड़ रुपये करके दी जा रही है.

इसके अलावा 400 करोड़ रुपये की कुंभ सहायता भी केंद्र राज्य को अलग से दे रहा है.

इस घोषणा से गेंद दोबारा राज्य के पाले में आ गिरी है. बहरहाल स्वयं को देवता और दूसरे को दानव साबित करने में जुटे दोनों राजनीतिक दल कुंभ के अमृत कलश से निजी और पार्टी के कलश को भर लेना चाहते हैं. पुराकथा यह है कि सागर मंथन में पहले लक्ष्मी आईं और बाद में अमृतकुंभ. सो, आज के देवता और दैत्य दोनों ही पहले लक्ष्मी पूजन कर लेना चाहते हैं. इसलिए कुंभ कार्यों में भी इन दिनों पहले लक्ष्मी पूजन को ही तरजीह दी जा रही है. अंदरूनी जानकारों का यहां तक कहना है कि अमृत छकने के मामले में दिल्ली और देहरादून दोनों के मंत्रिगण मित्र हैं! कुंभ कार्यों के बहाने हर बार हटाए जाने वाले शहरी अतिक्रमण में भी राजनीति हावी है. अपने वोट बैंक को प्रभावित होता देखकर मंत्रिगण नहीं चाहते कि अतिक्रमण हटाया जाए. यह बात व्यवस्था में अवरोध बन रही है.

उधर मीडिया में कुंभ कार्यों की छीछालेदर होते देखकर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. निशंक चिंतित हैं और अपनी हर हरिद्वार यात्रा में मीडिया को उपदेश दे जाते हैं कि विश्व के इस महानतम मेले के आयोजन को प्रेस वाले आलोचना का नहीं, गौरव का विषय बनाएं. व्यवस्थापकों को खलनायक नहीं, बल्कि नायक बनाएं. आरोप-प्रत्यारोप के बीच जो कुछ चल रहा है, उससे अंतत: आम जनता और कुंभ मेले को ही प्रभावित होना है. इसलिए जनता के मुंह पर एक ही बात है, प्रभु करें, मेला ठीकठाक निबट जाए.

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