अपहरणकर्ताओं ने अपनी मांग मनवाने के लिए इज़रायल के अनुरोध और युगांडाई राष्ट्रपति के निर्देश पर डेडलाइन एक जुलाई से बढ़ाकर चार जुलाई कर दी थी. यह बढ़ाई गई समय सीमा उन पर का़फी भारी पड़ी. इस दौरान इज़रायली ख़ु़फिया एजेंसी मोसाद ने दुश्मनों से मुक़ाबला करने के लिए कमर कस ली. तीन जुलाई को इज़रायली कैबिनेट ने बचाव मिशन को मंजूरी दी. उसके बाद इज़रायली एयरफोर्स के सी-310 हरक्यूलस ने गुप्त रूप से रात के अंधेरे में इंटेब्बे हवाई अड्डे के लिए उड़ान भरी, यह जानते हुए भी कि वहां पहुंचना ख़तरे से ख़ाली नहीं है.
इज़रायल का यह एयरफोर्स विमान शर्म-अल-शेख और लाल सागर के महज़ 30 मीटर के ऊपर से जा रहा था, ताकि मिस्र, सूडान और सउदी अरब के रडारों की पकड़ में न आ सके, नहीं तो इज़रायल और मोसाद के मिशन की भनक उसी व़क्त लग जाती. इस विमान के पीछे-पीछे बोइंग 707 के दो और विमान थे.
इस मिशन में लगभग एक सौ इज़रायली अधिकारियों को लगाया गया और मिशन का नाम दिया गया ऑपरेशन इंटेब्बे. इसे ऑपरेशन योनातन भी कहा जाता है. ऑपरेशन योनातन इसलिए, क्योंकि योनातन नेतान्याहू की अगुवाई में ही इस मिशन को अंजाम दिया जा रहा था. योनातन नेतान्याहू मौजूदा इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू के बड़े भाई थे. ख़ैर, इज़रायली सेना रात के 11 बजे हवाई अड्डे पर कार्गो बे के साथ उतरी. इस बे का दरवाज़ा पहले से ही ख़ुला था. एक काले रंग की मर्सडीज़ और लैंड रोवर्स में इज़रायली सैनिक थे. मर्सडीज़ और लैंड रोवर्स को इज़रायली कमांडोज़ एयरपोर्ट टर्मिनल पर तेज़ी से दौड़ाने लगे. उस समय टर्मिनल के पास दो युगांडाई कमांडो तैनात थे और वे इस बात से वाक़ि़फ थे कि राष्ट्रपति ने एक स़फेद मर्सडीज़ ख़रीदी है. यहीं वे धोख़ा खा गए. उन दोनों ने गाड़ी को नियमित जांच के लिए रोका, लेकिन मर्सडीज़ में मौजूद इज़रायली कमांडो ने उन पर साइलेंसर युक्त पिस्तौल से वार कर दिया, पर उनका निशाना बुरी तरह चूक गया. यह देखकर लैंड रोवर्स में मौजूद इज़रायली कमांडो ने अपनी रशियन कलाश्निकोव यानी ए के-47 से उन्हें मार गिराया. ए के-47 की आवाज़ सुनकर अपहरणकर्ता चौकन्ने हो गए.
इधर इज़रायली कमांडो भी अपनी चूक और ग़लती से सबक लेकर सतर्क हो चुके थे. इसके बाद दोनों तऱफ से अंधाधुंध फायरिंग होने लगी. इस फायरिंग में इज़रायली कमांडर योनातन नेतान्याहू बुरी तरह ज़ख्मी हो गए और बाद में उनकी मौत भी हो गई, यानी अब इज़रायली मिशन बग़ैर मिशन प्रमुख के संचालित हो रहा था. फिर भी सब कुछ मिशन के मुताबिक़ चल रहा था और यह सारा माजरा एयरपोर्ट टर्मिनल के पास हो रहा था, जबकि सारे बंधक एयरपोर्ट इमारत के मुख्य हॉल में थे. वहां तक पहुंचने के बाद इज़रायली सैनिकों ने सबसे पहले सभी यात्रियों को बाहर निकाला और उनसे बाक़ी बचे तीन अपहरणकर्ताओं के बारे में पूछा. यात्रियों ने हॉल से लगे एक दरवाज़े की ओर इशारा किया. उसके बाद इज़रायली कमांडो ने उधर हैंड ग्रेनेड फेंकने शुरू कर दिए और उन्होंने कुछ इस तरह बाक़ी बचे तीनों अपहरणकर्ताओं को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया. इसके बाद जब इज़रायली विमान सभी यात्रियों को वापस ले जाने लगे तो युगांडाई सैनिक उन पर गोलियां बरसाने लगे. जवाब में इज़रायली सैनिकों ने भी हमला बोल दिया. नतीजतन, कई युगांडाई सैनिक काल के गाल में समा गए. इज़रायल का यह पूरा मिशन लगभग 53 मिनट तक चला, जिसमें सभी सात अपहरणकर्ता मार गिराए गए. इज़रायल की तऱफ से मरने वालों में कमांडर नेतान्याहू थे, जबकि पांच अन्य कमांडर घायल हो गए थे. इस मिशन के दौरान क्रॉस फायर में तीन बंधकों की भी मौत हो गई. लगभग 45 युगांडाई सैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. जाते-जाते इज़रायलियों ने युगांडा के 11 मिग-77 फाइटर प्लेन को भी नेस्तनाबूद कर दिया.
यहां यह ध्यान देना अहम है कि इज़रायल का मिशन यदि पूरा हो सका तो इसकी भी एक ख़ास वजह थी. दरअसल, इज़रायली कंपनियां ही 1960 और 70 के दशक में अफ्रीका के देशों में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करती थीं और जिस बिल्डिंग में बंधकों को रखा गया था, वह भी एक इज़रायली कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा बनाई गई थी. उसी ने इज़रायली सरकार को उस इमारत की पूरी जानकारी दी, ताकि बंधकोंको बचाया और मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सके. इस पूरे मिशन को अंजाम देने में मोसाद ने का़फी अहम भूमिका निभाई. मोसाद ने ही अपहरणकर्ताओं की सही तादाद और उनकी गतिविधियों की जानकारी दी, जिससे मिशन को उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सके. सबसे पहले मोसाद ने साज़िशकर्ताओं की सही तादाद की जानकारी जुटाई, उसके बाद वे किन-किन जगहों पर छिपे हैं इस बारे में पता किया और सबसे अहम यह कि इस पूरे घटनाक्रम में युगांडाई सेना की भूमिका क्या थी.
दरअसल, मोसाद को युगांडा पर शक़ उसी व़क्त हो गया था, जब यहूदियों को छोड़कर बाक़ी सभी यात्रियों को जबरन अपहृत विमान से उतार दिया गया था. पांच जुलाई 2006 के एसोसिएट प्रेस के मुताबिक़, मोसाद ने उन सभी यात्रियों से पूछताछ की, जिन्हें पहले आज़ाद कर दिया गया था. मोसाद के लिए अहम सूचना का प्रमुख ज़रिया साबित हुआ एक फ्रेंच-यहूदी यात्री, जिसे ग़लती से अपहरणकर्ताओं ने छोड़ दिया. इसी यात्री ने मोसाद को अपहरणकर्ताओं की सही संख्या के बारे में जानकारी दी थी. इसके बाद की कहानी तो और भी दिलचस्प है. अपहरणकर्ताओं का साथ देने वाले युगांडा ने संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के इस मिशन को का़फी ज़ोर शोर से उठाया.
यह कहानी एक तरह से उल्टा चोर कोतवाल को डांटने जैसी थी. फिर भी युगांडा के विदेश मंत्री ने इस मसले को सुरक्षा परिषद में उठाया और यह मांग की कि इज़रायल की कार्रवाई को युगांडा की संप्रभुता पर हमला माना जाए तथा उसके ख़िला़फ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए. हालांकि सुरक्षा परिषद ने इस मसले पर किसी तरह की कार्रवाई करने से मना कर दिया. उसने न तो इज़रायल और न ही युगांडा के ख़िला़फ कोई प्रस्ताव पास किया. इस तरह एयर फ्रांस के अपहरण का यह असली ड्रामा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया, लेकिन इज़रायल के इस मिशन में मोसाद ने अपना किरदार इस तरह निभाया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी इज़रायल को घेर नहीं सकी. जबकि इज़रायल ने युगांडा की धरती पर ही इस पूरे मिशन को अंजाम दिया था. यदि ऐसा मुमकिन था तो स़िर्फ मोसाद की मदद से ही, जो इज़रायल को हर मुसीबत से निकालने में अपनी भूमिका बख़ूबी और बड़े ही शातिराना ढंग से निभाती है.
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