अहमदाबाद का उनका अनुभव सबसे अलग-थलग था. वहां की यादों से आनंद भारती अब भी सिहर उठते हैं. गोधरा कांड उनकी आंखों से गुज़रा था. उनकी कलम ने उस सच्चाई को बे़खौ़फ अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाया था. अ़खबार की लोकप्रियता भी बढ़ी थी पर स्वयं आनंद भारती के लिए उन दिनों की यादें मीठी कम और तीखी ज़्यादा रही हैं. वह कभी उन्हें याद नहीं करना चाहते, पर वे यादें ऐसी हैं जो कि रील की तरह उनके साथ चलती रहती हैं. बात उस साल की है जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में बलवाइयों द्वारा आग लगाने के बाद गुजरात सुलग रहा था. साबरमती एक्सप्रेस में हिंदू कारसेवक थे. ये कारसेवक अयोध्या में कारसेवा कर अयोध्या लौट रहे थे. गोधरा रेलवे स्टेशन पर कारसेवकों की लड़ाई हुई. इसके बाद गाड़ी आगे बढ़ी ही थी कि सिंगल फालिया पर गाड़ी रोक ली गई. बलवाइयों ने एस-6 कोच में आग लगा दी. आग लगने के और भी कारण बताए जा रहे हैं. जस्टिस बनर्जी से लेकर जस्टिस नानावटी तक कारणों की तह में गए और बिना गए अपने-अपने फैसले दे चुके हैं. सेक्यूलरिस्ट कहते हैं कि कारसेवकों ने खुद आग लगा ली. हिंदू ब्रिगेड कहती है कि मुसलमानों ने आग लगाई.
सिंगल फालिया मुस्लिम बहुल इलाक़ा है. इस आग के बाद गोधरा स्टेशन देश के ऩक्शे में प्रमुख तौर पर उभर आया. इस अग्निकांड से पहले गोधरा में ऐसा कुछ नहीं था कि उसे देश के लोग जानें. इसी गोधरा ने देश की राजनीति में तीव्र ध्रुवीकरण किया.
वैसे धु्रवीकरण की नींव तो छह दिसंबर, 1992 को ही पड़ गई थी. उस दिन बाबरी मस्जिद को भगवा ब्रिगेड ने ध्वस्त कर दिया था. हिंदू राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी के मुखिया लालकृष्ण आडवाणी से लेकर भगवा सेना की तेज़ तर्रार साध्वी उमा भारती, सभी इस कथित राष्ट्रीय कलंक को ध्वस्त करने में शामिल थे.
अयोध्या में स़िर्फ एक ही नारा था- बाबरी मस्जिद को एक धक्का और दो. हिंदू बवालियों का मानना था कि बाबरी मस्जिद जिस प्लॉट में थी उसी में उनके भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था. हिंदू इस ज़मीन पर रामलला का भव्य मंदिर बनवाना चाहते हैं. उनकी आस्था का सवाल था. ऐसी आस्था जो तर्कों से परे थी. उसके लिए ज़रूरी था कि बाबरी का ध्वंस किया जाए. पुलिस की सुरक्षा और संरक्षण में बाबरी का ध्वंस हुआ.
बाबरी ध्वंस की भूमिका तो पहले ही बन चुकी थी. लालकृष्ण आडवाणी दो साल पहले सोमनाथ से अयोध्या तक रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए संकल्प रथ यात्रा निकाल चुके थे. फिजा में राम जन्म भूमि का मुद्दा तैरने लगा था. मंदिर निर्माण के पक्ष में चारों तऱफ नारे गूंज रहे थे- बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का, सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे, एक धक्का और दो, बाबरी को तोड़ दो, बांध लंगोटा, थाम के सोटा, चलो अयोध्या.
सोमनाथ से रथयात्रा जैसे-जैसे आगे ब़ढ रही थी, हाशिए पर पड़ी भारतीय जनता पार्टी के प्रति हिंदुओं का समर्थन ब़ढता जा रहा था. कहने वालों ने इस यात्रा को आडवाणी की दंगा-यात्रा तक कह डाला. रथ यात्रा के रथी आडवाणी का करिश्मा चल निकला था. बाद में रथयात्रा की परिणति बाबरी ध्वंस के साथ हुई. बाबरी तो ध्वंस हो चुकी थी. अब हिंदू बिग्रेड के आगे सवाल था कि वहां रामलला का मंदिर कैसे बनाया जाए. केंद्र सरकार ने विवादित ढांचे पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए आदेश दे दिए थे. असल में बाबरी तो एक बहाना था, भारतीय जनता पार्टी राम के कंधों पर च़ढकर देश की सत्ता पर क़ाबिज़ होना चाहती थी. इसीलिए वह और उसके सहयोगी संगठन मंदिर निर्माण के लिए तरह तरह के आंदोलनों में जुट गए. कभी शिला पूजन, तो कभी मंदिर का शिलान्यास, तो कभी साधू संतों के सम्मेलन आदि आदि.
चार साल से अधिक समय तक भारतीय जनता पार्टी के इंजीनियर राम नाम की माला जपते रहे. पार्टी का पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पार्टी के हर क़दम पर नज़र रखे हुए था. आज़ादी के बाद देश में इमरजेंसी को जन्म देने वाले जेपी आंदोलन से भी बड़ा रामजन्म भूमि का आंदोलन बन गया था. लाखों लोगों नेभगवान राम के नाम पर आंदोलन में भागीदारी की. बाबरी ध्वंस के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके लगुवा-भगुवा संगठन राम के नाम पर आज़ादी के बाद देश को पहली बार सांप्रदायिक धरातल पर बांटने में कामयाब हो गए. 1996 में भारतीय जनता पार्टी केंद्र में तेरह दिन की सरकार बनाने में कामयाब हुई. बहुमत न होने के चलते पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपने नाम के आगे भूतपूर्व लगाना पड़ा. इसके बाद आई देवगौड़ा की सरकार भी कुछ ही महीने चल सकी.
(अगले अंक में जारी)
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