रूपकुंड से आगे की यात्रा

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पिछले दिनों कई मित्रों से इस बारे में बातें हुईं कि नया क्या पढ़ा है. मित्रों ने कई ऐसी किताबों के नाम बताए जिसे या तो प़ढ चुका था या फिर पत्रों में उसकी चर्चा पढ़कर इतना जान चुका था कि उसमें नया कुछ लग नहीं रहा था. इस बीच एक वरिष्ठ आलोचक से बात हो रही थी. नई किताबों पर उनसे चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की एक किताब-हिमालय का महाकुंभ नंदा राजजात आई है, और वह किताब उल्लेखनीय है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मुझे वह किताब पढ़नी ही चाहिए. बातचीत खत्म हो गई, लेकिन उस किताब को लेकर मेरे मन में कोई उत्साह नहीं बना. मेरे अवचेतन में रमेश पोखरियाल निशंक पर अशोक वाजपेयी की जनसत्ता में प्रकाशित टिप्पणी भी थी. बात आई गई, हो गई. अचानक एक दिन दफ्तर से जब देर रात घर लौटा तो एक भारी-किताब मिली, खोला तो उसके अंदर हिमालय का महाकुंभ नंदा राजजात की एक प्रति थी. काग़ज और छपाई बेहतरीन थी. लेकिन निशंक का नाम देखकर उस किताब को अन्य किताबों के  साथ रख दिया.

यह सबकुछ तब हो रहा था, जब मैं विलियम डेलरिंपल की किताब नाइन लाइव्स-इन सर्च ऑफ द सैक्रेड मॉडर्न इंडिया पढ़ रहा था. डेलरिंपल की किताब पढ़कर अच्छा लगा. उसमें उन्होंने भारत के अलग-प्रदेशों की यात्रा कर नौ कहानियां लिखी हैं, जिसमें जैन साध्वी, देवदासी आदि पर नौ अलग अध्याय हैं. डेलरिंपल की किताब खत्म कर जब मैं उस पर लिखने बैठा तो कुछ किताबें मेरे जेहन में आईं. एक तो हाल में आई मधु कांकड़िया की किताब सेज पर संस्कृत, जिसमें जैन धर्म और साध्वियों के बारे में विस्तार से लिखा है और दूसरे लगभग पांच छह वर्ष पूर्व प्रकाशित शरद पगारे की किताब उजाले की तलाश-जिसमें देवदासी प्रथा पर विस्तार से लिखा गया है. अचानक मेरे दिमाग़ में ये बात कौंधी कि क्यों न हिमालय का महाकुंभ नंदा राजजात पर भी एक नज़र मार ली जाए, क्योंकि उसे उलटते पुलटते यह लगा था कि उस किताब में भी भारतीय धर्म और उससे जुड़ी लोकथाओं के  बारे में लिखा गया है. और फिर मैंने इसे पढ़ना शुरू किया.

जब रमेश पोखरियाल निशंक की इस किताब को पढ़ना शुरू किया तो उत्सुकता लगातार बढ़ती चली गई और जिसे मैंने अगंभीर किताब मानकर किनारे कर दिया था, वो एक अहम किताब निकली. लिखने का अंदाज़ रोचक और जानकारियों से परिपूर्ण यह किताब बेहद अहम है. राजजात का अर्थ होता है, राजा की जात. इसका संबंध हिंदू धर्म से जुड़ा है. उत्तराखंड में एक धार्मिक यात्रा से बढ़कर इसका महत्व है.

माना जाता है कि दो सौ अस्सी किलोमीटर की यह यात्रा हिमालय की बेटी नंदा की मायके  से ससुराल की विदाई की यात्रा है. इस यात्रा की खास बात यह है कि यह त्रिशूली नंदाघुंघटी की तलहटी से चौसिंग्या खाडू (चार सींगो वाला भेड़) की पीठ पर लदे गठरियों में मायके की सौगात लेकर नंदा ससुराल यानि कैलाशधाम जाती है. सदियों से चली आ रही यह यात्रा प्रत्यक्ष रूप में तो एक धार्मिक आस्था यात्रा लगती है, लेकिन लेकिन हाड़ कंपा देने वाली ठंड और मौत से ल़डाई लड़ते हुए की जाने वाली इस यात्रा में हिमालयी लोककला, संस्कृति, सरोकारों और परंपराओं की एक पूरी श्रृंखला दिखाई देती है.

280 किलोमीटर इस यात्रा में यात्रियों को रहस्य और रोमांच का अनुभव तो होता ही है, इसमें हिमालय की गोद में बसे इस राज्य की नैसर्गिक छटा और अद्भुत दृश्यों से भी मन खिल उठता है. उत्तराखंड के लोग इस यात्रा को मां नंदा की भक्ति से भी जोड़कर देखते हैं. नंदा रजजात में बेटी की विदाई से जुड़ी यह यात्रा स्त्रियों को मिलने वाले मान और पुत्री प्रेम का अद्भुत नमूना है. उन्नीस पड़ावों से गुज़रनेवाली इस दुर्गम यात्रा को रास्तेभर गांव वालों का पूरा प्यार और सम्मान मिलता है. हज़ारों लोग इस यात्रा में शामिल होते हैं और प्रतिदिन लगभग पांच से पच्चीस किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं. यात्रा के दौरान यात्रियों का जत्था जिस भी गांव से गुज़रता है वहां उनका ज़ोरदार स्वागत किया जाता है. यात्रियों की हर ज़रूरत को गांववाले श्रद्धा भाव से पूरा करते हैं. दरअसल इस यात्रा के पीछे विद्वानों और इतिहासकारों में ज़बरदस्त मतांतर है. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि पौराणिक मान्यताओं के  मुताबिक़, नंदा राजजात का संबंध पिता का पुत्री को ससुराल के लिए विदा किए जाने की मान्यता से जुड़ा है.

कई इतिहासकारों के लेखों और स्थानीय जागरों (लोकगीतों) में इस बात का उल्लेख है कि भगवान शिव की प्रथम पत्नी सती ने कनखल में अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किए जाने के विरोध में अपने शरीर को भस्म कर दिया और इसके बाद हिमालय नरेश और मैनावती के घर में नंदा के रूप में जन्म लिया. जागरों में इस बात का वर्णन है कि नंदा ने कठोर तपस्या कर शिव को फिर से पति के रूप में प्राप्त किया. जागरों के  मुताबिक़, नंदा के माता-पिता इस बेमेल विवाह के लिए राजी नहीं थे, क्योंकि सती की विरह में शिव ने अवधूत का रूप धारण कर लिया था और अघोरियों से घिरे रहने लगे थे. लेकिन नारद की मध्यस्थता के बाद यह विवाह संपन्न हो सका. उस इला़के की लोकगीतों में इस बेमेल विवाह के कई प्रमाण मिलते हैं. जब नंदा कैलाश के दुर्गम और विकट पर्वत शिखरों पर पहुंचती है तो उसे मायके की बेहद याद आती है. इस यात्रा के दौरान ही रूपकुंड मिलता है. कहा जाता है कि शिव जब विवाह के  बाद नंदा के साथ लौट रहे थे तो उसे प्यास लगी और शिव ने अपने त्रिशूल के वार से एक कुंड बना दिया, जिसमें नंदा के  रूप को निहार कर शिव ने उसका नाम रूपकुंड रख दिया. अभी कुछ दिनों पहले मेरे एक सहयोगी ने रूपकुंड की दुर्गम यात्रा की थी और वहां मौजूद बड़े-नरकंकालों से हमारा परिचय करवाया था. उस व़क्त तक मुझे इस यात्रा के पौराणिक महत्व का पता नहीं था.

इतिहास में इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि जब देश पर अंग्रेजों का राज था तो अठारह सौ बयासी में नंदा की चोटी पर चढ़ने के प्रयास शुरू हो गए थे. उन्नीस सौ चौंतीस में ब्रिटिश नागरिक एरिक सिप्टन और टिलमैन ने ऋषिगंगा और द्रोणगिरि से होकर नंदादेवी तक पहुंचने के रास्ते का पता लगाया था. उन्नीस सौ छत्तीस में टिलमैन ने एक बार फिर से नंदा देवी की यात्रा की और पूरे विश्व के  समक्ष अपना वर्णन प्रस्तुत किया.

हिंदी साहित्य में यात्रा वृतांत की एक लंबी परंपरा रही है. राहुल सांकृत्यायन से लेकर कृष्णनाथ तक. हिमालय की तराई बार-लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करता है. इसमें काका कालेलकर की हिमालय की यात्रा और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की बद्रीनाथ की ओर उल्लेखनीय है. इन पुस्तकों में यात्रा की आंखों देखी है. मुंशी जी ने अपना यह यात्रा वृतांत तब लिखा था जब वह उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे. प्राकृतिक स्वरूप का वर्णन हिंदी के यात्रावृत्त की एक प्रमुख प्रवृत्ति है और अमूनन इस तरह के हर लेखन में पहाड़ों की अद्भुत छटा, कलकल करती नदियां या झरने या ब़र्फ से ढके  पर्वत शिखरों का वर्णन मिलता है.  निशंक की इस किताब में प्राकृतिक छटा का उल्लेख तो है ही, लेकिन यह स़िर्फ वर्णन भर नहीं है. वह किसी स्थान विशेष या स्थिति विशेष से भौंचक्का नहीं रह जाता, बल्कि उसके  हर पहलू को परखने की कोशिश करता चलता है और उस खास घटना या पहलू की तह तक जाता है. लोकगीतों के  माध्यम से लेखक मान्यताओं की पुष्टि करने का प्रयास भी करता है. दरअसल निशंक ने यात्रा को एक सर्जनात्मक उपलब्धि के तौर पर पेश किया है और उसमें सफलता भी प्राप्त की है. मेरा विश्वास है कि निशंक की यह कृति हिंदी में उपलब्ध किसी भी यात्रा-से कमज़ोर नहीं है और इसे स़िर्फ इस आधार पर खारिज़ नहीं कर दिया जाना चाहिए कि इसे भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध किसी राजनेता ने लिखा है.

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