अटल बिहारी वाजपेयी असभ्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सभ्य मुखौटा हैं. हमेशा से उनका अपना एक अलग अंदाज़ रहा है. वह यह कि शिकारी के साथ शिकार करना और शिकार के साथ रहना भी. यानी एक विवादित मसले पर दोनों प्रतिस्पर्धियों को समर्थन करने की नीति. स्वर्गीय कमलापति त्रिपाठी के शब्दों में, वह तीखी ज़ुबान से बोलने की कला में माहिर हैं. ऩफरत और हिंसा की राजनीति में लगातार लिप्त रहने के बावजूद संघ लगातार उन्हें उदार चेहरे के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. यही वजह है कि शब्दों से खेलने में माहिर संघ के पूर्व नेता गोविंदाचार्य ने उन्हें संघ का मुखौटा कहा था. लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट ने उस मक्खी के घोसले को परेशानी में डाल दिया है, जिसे हम संघ कहते हैं.
बाबरी मस्जिद का ध्वंस कराकर पूरे देश में मुसलमानों के विरुद्ध दंगा भड़काने जैसी राष्ट्र विरोधी साज़िश रचने के बाद अब संघ ने आक्रामक रुख़ अख्तियार करने की घोषणा की है. इसे ही हम चोरी और सीना जोरी का नाम देते हैं.
हर संघी मासूमियत से यही पूछ रहा है कि वाजपेयी जैसे सज्जन पुरुष को बाबरी मस्जिद विध्वंस प्रकरण में कैसे घसीट लिया गया? यहां तक कि उस विध्वंस के नायक लालकृष्ण आडवाणी ने भी लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में दोषियों की सूची में अटल जी का नाम शामिल किए जाने पर हैरानी व्यक्त की है. 6 दिसंबर, 1992 को विध्वंस की उक्त घटना हुई. संघ कह रहा है कि उस महत्वपूर्ण तारीख़ को अटल जी अयोध्या में मौजूद ही नहीं थे. संघ की दूसरी घोषणाओं की तरह यह भी अधूरा सच ही है. हक़ीक़त यह है कि वह पांच दिसंबर, 1992 की शाम अयोध्या से चंद दूरी पर लखनऊ में मौजूद थे. वहां उन्होंने यह बात कही भी थी कि वह अगले दिन अयोध्या में होने वाली कारसेवा में भाग लेने आए हैं.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शीर्ष नेताओं का यह फैसला था कि यह मुखौटा बाबरी मस्जिद को धराशायी करने वाले हुड़दंगियों की जमात में नज़र नहीं आना चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा भी कि जब वह अयोध्या के लिए रवाना होने वाले थे तो उन्हें वापस जाने को कहा गया. ख़ुद उनके ही शब्दों में, मुझे कहा गया कि तुम दिल्ली वापस जाओ. अपने चिर परिचित नरमी और गर्मी वाले अंदाज़ में वाजपेयी जी ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने और मस्जिद ध्वस्त करने के लायक़ उन्माद पैदा करने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि अगले दिन अयोध्या में क्या होने वाला है? उसके बाद अटल जी ने कहा, मैं नहीं जानता कि कल वहां क्या होगा? वाजपेयी जी को सारी बातों की जानकारी थी, लेकिन वह कुछ नहीं जानते? वह भलीभांति जानते थे कि कारसेवक और उनके नेता वहां क्या करने जा रहे हैं.
अप्रत्यक्ष तौर पर जब वह यह कह रहे थे कि मैं नहीं जानता कल वहां क्या होगा, तो संकेतात्मक रूप से वह यही बता रहे थे कि मुझे मालूम है कि कल हमारे परिवार के लोग वहां शर्मनाक काम को अंजाम देने जा रहे हैं. किसी बात को कहने का यह उनका अपना तरीक़ा है. संघ के निंदित और बुरे इरादे की झलक उनकी इस टिप्पणी में ज़ाहिर होती है कि अयोध्या में ज़मीन को समतल करना पड़ेगा. स्वाभाविक है, उनका कहने का इरादा स्पष्ट था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराना है और राम मंदिर के निर्माण के लिए ज़मीन समतल करना है. लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस अपराध में उनकी भूमिका का ज़िक्र किया है. बल्कि दोषियों की सूची में उनका नाम आडवाणी से भी पहले है.
पांच दिसंबर, 1992 को अयोध्या में उन्होंने क्या कहा, इस पर कई समाचारपत्रों में पूरी ख़बर है. संघ ने उन्हें बिना भरोसा में लिए साज़िश नहीं रची थी. अयोध्या की आपराधिक घटना के बाद जल्द ही दिल्ली में उन्होंने एक और नाटक का मंचन किया. उन्होंने घोषणा की कि वह राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. अगर कोई बहुत मूर्ख होता (वहां पर्याप्त पत्रकार थे) तो उसे विश्वास होता कि वह राजनीति छोड़ रहे हैं. वाजपेयी जी अपनी ज़ुबान के कितने पक्के थे, यह इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि उन्होंने दो मर्तबा प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली. पहली बार अपमानजनक तरीक़े से वह अल्पकाल के लिए ही प्रधानमंत्री रहे. अब जबकि ख़राब सेहत और बुढ़ापे की वजह से वह राजनीति से बाहर रहने को मजबूर हैं तो ऐसे में वह दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने स्वेच्छा से संन्यास ले लिया है.
वाजपेयी जी की कथनी और करनी ने अतीत में गंभीर क्षति पहुंचाई है. संघ के दूसरे लोगों की तरह ही उनके माथे पर भी सैकड़ों निर्दोष मुसलमानों के ख़ून के छींटे हैं. जब वह पहली बार प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार गिर गई तो उस दिन स्वर्गीय कॉमरेड सी बी गुप्ता ने लोकसभा को बताया था कि अस्सी के दशक में नेल्ली नरसंहार के नौ सौ मासूमों के ख़ून के कलंक का टीका भी वाजपेयी जी के माथे पर लगा है. नेल्ली नरसंहार की घटना के ठीक पहले घृणा भरे उनके भाषण ने आग में घी का काम किया था. फिर भी हां, वाजपेयी जी सम्मानीय हैं, तमाम संदेहों और आरोपों के बाद भी.
|
|
|










लेखक जी,
मुझे काफी हद तक यह विश्वास है की आप एक मुस्लिम व्यक्ति हैं! लेकिन कोई बात नहीं, यदि नहीं भी हैं, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ की इस्लाम के भारत में आने से लेकर अब तक इस्लाम ८ करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का (या कहूं की मनुष्यों का) खून कर चुका है, केवल खून ही नहीं, माओं बहनों के बलात्कार की भी कोई गिनती नहीं है!!
ऐसे कातिल बलात्कारी मुस्लिम शासकों जैसे अकबर, टीपू, औरंगजेब, शाहजहाँ, आदि के बारे में कभी सुना नहीं की आप जैसे लोगों ने कुछ लिखा हो!!
अरे कम से कम ये स्वीकार तो कीजिये की ये एक हत्यारे, बलात्कारी, और लुटेरे थे जिन्होंने भारत की आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर लूट की!
लेकिन नहीं, आप लोग तो इन्हें भारत के नायक कहने से भी नहीं चूकते! सचमुच धन्य हैं आप जैसे लोग!
Aap v muslim Tustikaaran ke samarthak hai
islia atal ki alochana parhkar aschrya nhi hua
aap midia ke fild me sangh ki alochana karne hi utre
hai.
kuchh nya likhe