हाल में उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दलवीर भंडारी और ए के पटनायक की खंडपीठ ने सरकार से इस बात पर विचार करने को कहा कि यदि वह वेश्यावृत्ति को रोक नहीं सकती तो इसे क़ानूनी वैधता दे देनी चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने अपनी एक टिप्पणी में कहा कि महिलाओं की तस्करी रोकने की दिशा में सेक्स व्यापार को क़ानूनी मान्यता देना एक बेहतर विकल्प हो सकता है. इससे यौनकर्मियों के पुनर्वास में भी मदद मिलेगी. एक ग़ैर सरकारी संगठन बचपन बचाओ आंदोलन की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि जब आप यह कहते हैं कि वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे पुराना पेशा है और आप इस पर लगाम लगाने में असक्षम हैं तो आप इसे क़ानूनी मान्यता क्यों नहीं दे देते हैं? इससे आप इस व्यवसाय पर निगरानी भी रख सकते हैं. उच्चतम न्यायालय ने वेश्यावृत्ति को वैध करने की सलाह देकर दुनिया के सबसे पुराने पेशे के मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या इसे भारत में वैध कर देना चाहिए. इस विवाद के पक्ष और विपक्ष में लोग अपना तर्क मज़बूती से रख रहे हैं. इसकी मुख़ाल़फत करने वाले पुरज़ोर तरीक़े से अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि इससे मानव तस्करी में और अधिक इज़ा़फा ही होगा. जबकि इस मसले पर सकारात्मक रुख़ रखने वाले कहते हैं कि सेक्स व्यापार को वैध बनाने से भेदभाव तो दूर होगा ही, इसके अलावा जो यौनकर्मी आज ख़ुद को पूरी तरह असुरक्षित महसूस करते हैं, उन्हें भी क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी. साथ ही क़ानून को लागू करने वालों मसलन पुलिस के ज़रिए इनका होने वाला शोषण भी रुकेगा.
इसे क़ानूनी मान्यता देने से एचआईवी/एड्स से लड़ने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि इससे सेक्स वर्कर्स को एहतियाती तौर पर मेडिकल सुविधा भी मुहैया होगी.
यौनकर्मियों के अधिकारों के मसले पर पूरी दुनिया में हमेशा से विवाद रहा है. वेश्यावृत्ति को नियंत्रित करने अथवा इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई विशिष्ट क़ानून नहीं है. भारत में वेश्यावृत्ति से संबंधित क़ानून हैं भी, तो वे ख़ासकर महिलाओं के अनैतिक व्यापार और गर्ल एक्ट-1956, अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम-1956, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम-1956 और आईटीपीए अधिनियम-1956 से संबंधित हैं. अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम में संशोधन के लिए वर्ष 2006 में महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने संसद में एक विधेयक पेश किया था. अब भारत सरकार ने एक नया क़ानून प्रस्तावित किया है, जिसके तहत यह अपराध नहीं रह जाएगा. यौनकर्मियों को कोई मकान से बाहर नहीं निकाल पाएगा. यौनकर्मियों के ग्राहकों को जेल और 50,000 रुपये तक का दंड भुगतना पड़ सकता है. उनकी आय को बंद करना ग़ैर क़ानूनी होगा. जो भी यौनकर्मियों के मकान को किराए पर उठाएगा, उसे जेल या 10,000 रुपये जुर्माने की सज़ा होगी. प्रस्तावित विधेयक संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा. जबकि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने इस संशोधन के फैसले की आलोचना की है. उसके मुताबिक़, यौनकर्मियों के ग्राहकों को दंडित करने का केंद्र का फैसला किसी भी मायने में सकारात्मक क़दम नहीं है. मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ यौनकर्मियों को ही दंडित किया जाता है, जो ख़ुद भुक्तभोगी हैं. लगभग अस्सी फीसदी यौनकर्मी ग़रीबी, क़रीबियों के झांसे में आने और मानव तस्करी आदि की वजह से इस पेशे में हैं.
वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता दी जाए या नहीं, इसका जवाब देना का़फी कठिन है. ख़ासकर तब, जबकि आप भारत जैसे देश में रहते हों. भारत में यदि किसी चीज़ का संबंध सेक्स, ख़ासकर वेश्यावृत्ति से जुड़ा हो तो इसे अनैतिक माना जाता है. और, कोई भी इस पेशे में शामिल होता है तो उसे अपराधी करार दिया जाता है. आज वेश्यावृत्ति ग़ैर क़ानूनी स़िर्फ इसलिए है, क्योंकि यह एक राष्ट्र के सख्त नैतिक मूल्यों के ख़िला़फ है. वेश्यावृत्ति के ख़िला़फ क़ानून बनाने का प्राथमिक उद्देश्य महिलाओं को वेश्या बनने से रोकना है. लेकिन वेश्यावृत्ति अधिनियम को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, जिसका मतलब है वेश्याओ को दंडित करना. इस अधिनियम में इसका भी ज़िक्र है कि आ़खिर क्यों एक महिला इस तरह की ज़ोखिम भरी जीवनशैली अपनाती हैं. जो महिलाएं वेश्यावृत्ति में हैं, वे आमतौर पर हताशा में ही इस पेशे में शामिल होती हैं. इसलिए सरकार उनके लिए कम से कम सुरक्षा का बंदोबस्त तो कर ही सकती है. वेश्याएं सामाजिक और क़ानूनी तौर पर अपनी गतिविधियों को छिपाती हैं, इसलिए भारतीय महिलाएं जो इस पेशे में शामिल हैं, उनकी सही तादाद का पता लगाना आसान नहीं है.
हालांकि वेश्यावृत्ति अवैध है, फिर भी भारतीय शहरों और उनके बाहर भी यह व्यवसाय फलफूल रहा है. एक अनुमानित आंकड़े के मुताबिक़, पूरे देश में दो मिलियन से भी अधिक संख्या महिला यौनकर्मियों की है. इनमें अधिकतम की उम्र का़फी छोटी है. कुछ की उम्र तो 12 साल से भी कम है. अनुमान है कि देश की 25 फीसदी से अधिक वेश्याएं स़िर्फ आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में है. भारत में वेश्यावृत्ति को वैध करने की सलाह देकर महिलाओं और लड़कियों के सेक्स व्यापार में चिंताजनक वृद्धि से निपटने का सुझाव दिया गया है.
जिस समाज में वेश्यावृत्ति वैध है, उससे नतीजा निकला है कि इस पर निगरानी रखने में आसानी हुई है. भारत को भी इनसे सीख लेनी चाहिए, न कि वकालत करनी चाहिए कि भारत में वेश्यावृत्ति नाम की चीज़ ही नहीं है. पूरी दुनिया के अनुभव से यह ज़ाहिर है कि वेश्यावृत्ति को वैध बनाकर एचआईवी/एड्स पर काफी हद तक लगाम लगाई और जागरूकता लाई जा सकती है. दुनिया के कुछ देश जैसे ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, नीदरलैंड और अमेरिका में यौन व्यापार को वैध बनाया जा चुका है. इससे संबंधित क़ानून में ऐसी गतिविधियों में शामिल लोगों को नियमित चिकित्सकीय जांच कराना अनिवार्य किया गया है. आज यही क़दम भारत में भी उठाए जाने की ज़रूरत है. ऐसा इसलिए, क्योंकि यहां क़ानून बनाने वालों, उसे लागू करने वालों और इस व्यापार को चलाने वालों के बीच एक
ख़तरनाक गठजोड़ है.
चाहे वह कोई भी सरकार रही हो और उसने कितनी भी कोशिश की हो, वेश्यावृत्ति को पूरी तरह ख़त्म करने में उसे कभी सफलता नहीं मिली. वेश्यावृत्ति को वैध बनाकर यौन संचरित रोग और एड्स की महामारी के ख़िला़फ हम वैध तरीक़े से लड़ सकेंगे. ठीक उसी तरह, जैसे हमने अस्पृश्यता के ख़िला़फ जंग लड़ी है. वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता मिलने से यौनकर्मी न स़िर्फ स्वाभिमान की ज़िंदगी जी पाएंगी, बल्कि अब तक उनके साथ दोयम दर्ज़े के नागरिक की तरह हो रहे व्यवहार में भी सुधार होगा. यौन व्यापार को वैधता देकर इस व्यवसाय को एक मानवीय चेहरे की शक्ल दी जा सकती है. जबकि अभी उनके साथ इस तरह व्यवहार किया जाता है मानों वे इंसान नहीं, दूसरे ग्रह के प्राणी हैं. यौनकर्मियों के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए. साथ ही जब कोई इस पेशे में आए तो उसके पास स्वास्थ्य प्रमाणपत्र होना अनिवार्य हो. किसी दूसरी फर्म की तरह वेश्यालयों पर भी टैक्स लगना चाहिए और यौनकर्मियों की चिकित्सा व्यवस्था के लिए सरकार द्वारा एक निश्चित राशि भी तय होनी चाहिए. यौनकर्मियों के परिवार, ख़ासकर उनके बच्चों की देखभाल ज़रूर होनी चाहिए. यौनकर्मियों को क्षेत्र विशेष में ही काम करने की इजाज़त दी जानी चाहिए, यानी वेश्यालय रिहायशी और शैक्षणिक इलाक़ों से दूर होने चाहिए.
वहीं दूसरी ओर वेश्यावृत्ति को वैध बनाने का विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे फायदा वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने वाले को होगा, न कि यौनकर्मियों को. भारत में महिलाओं को जबरन और मजबूरन इस व्यापार में धकेल दिया जाता है तथा उनसे बंधुआ मजदूरों की तरह काम लिया जाता है. ऐसे में इन क़दमों से उन्हें फायदा बहुत ही कम होगा. व्यवसायिक यौन शोषण एक तरह की ग़ुलामी है और ग़ुलामी को कभी भी वैध करार नहीं दिया जा सकता है. यह निहायत ज़रूरी है कि सेक्स उद्योग को भी दूसरे उद्योग की तरह माना जाए और इसे क़ानूनी सुरक्षा कवचों के ज़रिए मज़बूत किया जाए, जिससे यौनकर्मियों को कार्यस्थल पर शोषक और अस्वास्थ्यकर तरीक़ों से निजात मिल सके. भारत में एड्स रोगियों की बढ़ती संख्या और मासूमों को इस व्यवसाय में धकेलना एक चिंता की बात है. क़ानून निर्माताओं के लिए अब व़क्त आ गया है कि वे इस मसले पर गंभीरता से सोचें. उनके सामने जो समस्या है, उसका जवाब है वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता देना. इसलिए भारत को या तो वेश्यावृत्ति को वैध करना होगा जो कि सबसे उपयुक्त है, या फिर कुछ ऐसे फैसले लेने पड़ेंगे, जिससे वेश्यावृत्ति की समस्या पर रोक लगाई जा सके. क़ानून ऐसे न हों कि वह वेश्यावृत्ति की जगह वेश्याओं को ही मिटा दें, बल्कि उन्हें ऐसा होना चाहिए कि लोगों की मानसिकता बदले, जिससे कोई भी इसमें शामिल होने की सोचे ही नहीं. कुछ लोग सेक्स व्यापार को वैध बनाने की वकालत कर सकते हैं, लेकिन मैं नहीं समझता कि हमारा भारतीय समाज इतना परिपक्व हो चुका है कि वह ऐसी वकालत करे. क़ानूनी ढांचे में कुछ इस तरह संशोधन होना चाहिए कि इससे महिलाओं का शोषण बंद हो और उन्हें इस काम के लिए मजबूर न किया जा सके. इससे भी अधिक यह कि भारत की सामाजिक संरचना को नुक़सान न पहुंचे. सख्त नियंत्रण की दरकार इसलिए भी है, ताकि अवयस्क लड़कियों को इस काम के लिए मजबूर न किया जा सके.
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