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आदिवासियों के सघंर्ष ने इतिहास रचा

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बीस दिसंबर की सुबह. उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र का पुलिस लाइन परिसर. विंध्य की पहाड़ियों में आबाद नगर पंचायत चुर्क (गुर्मा) स्थित इस परिसर में सूर्य निकलने के साथ ही शुरू होती है आदिवासियों एवं नौकरशाहों की चहलक़दमी. यह सब कुछ समझने में आसपास के लोगों को ज़्यादा सिर खपाना नहीं पड़ता. उन्हें मालूम है कि आज का दिन देश के आदिवासी संघर्ष के इतिहास में अपनी जगह सुनिश्चित करेगा. आदिवासियों की भीड़ में कोई अपने ठिठुरते बदन को मटमैली धोती और स्वेटर में छुपाए हुए है तो कोई फटी चादर में. कोई आदिवासी महिला ठंड हवाओं से बचने के लिए मटमैली चादर अथवा शाल को सुरक्षा कवच बनाए हुए है तो कोई खुद को सूती साड़ी में छुपाती नज़र आ रही है. किसी के पैर में प्लास्टिक की टूटी चप्पलें हैं तो कोई सड़क पर स्वागत कर रहे कंकड़ों को नंगे पांव रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा है. दूसरी ओर सूट-बूट में लग्ज़री गाड़ियों से निकलने वाले नौकरशाहों की जमात है, जो अपने हुक्मरानों की आवभगत में जुटे हुए हैं.  कुर्सियों पर विराजमान होकर प्रायः गप्प मारने वाले लिपिकों की फौज फाइलों के अंदर रखे काग़ज़ों को दुरुस्त करने में जुटी हुई.

आज़ादी के 62 वर्षों बाद भी अपने पुश्तैनी अधिकार (जंगल की ज़मीन का हक़) के लिए लड़ रहे आदिवासियों और नौकरशाहों की उक्त तस्वीर बता रही है कि देश के दो अंकों वाली विकास दर में हम कहां हैं? ख़ैर, आदिवासी संघर्ष के ऐतिहासिक पल की घड़ी जैसे-जैसे नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे परिसर में लाखों रुपये ख़र्च करके बने पंडाल में बिछी कुर्सियां भरती जा रही हैं. साथ ही पास में बिछी दरी का रकबा भी कम होता जा रहा है. सुबह के साढ़े दस बज चुके हैं. अचानक गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनाई देती है. पंडाल में बैठे लोगों की निगाहें आवाज़ की ओर जाती हैं. पता चलता है कि यह आवाज़ लखनऊ से आए सरकारी नुमाइंदों के हेलीकॉप्टर की है. हेलीकॉप्टर पंडाल के पास ज़मीन पर उतरता है. पंडाल में बैठे लोग इधर-उधर भागने लगते हैं. चंद मिनटों बाद लोग पुनः अपने स्थान को ग्रहण कर लेते हैं. उनकी बेसब्री बढ़ जाती है. दोपहर 12 बजे समाज कल्याण विभाग उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव प्रेम नारायण, प्रमुख सचिव (वन) चंचल कुमार तिवारी, प्रमुख सचिव (राजस्व) आर पी सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव अनिल संत एवं समाज कल्याण निदेशक रामबहादुर आदि आला अधिकारी मंचासीन होते हैं. मौक़ा है भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारी की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत आदिवासियों को जंगल की ज़मीन पर अधिकार के प्रमाणपत्र वितरित करने के लिए आयोजित हुए कार्यक्रम का. दीप प्रज्जवलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ होता है. लाउडस्पीकर से अपने-अपने नामों की घोषणा सुनने के लिए आदिवासियों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. अचानक दुद्धी तहसील के कुलडोमरी गांव निवासी 60 वर्षीय आदिवासी राम जी का नाम हवा में गूंजता है. तालियों की गड़गड़ाहट से लोग राम जी का स्वागत करते हैं. लंबे संघर्ष के बाद मिले अधिकार की ख़ुशी के आंसुओं को अपनी आंखों में छुपाए राम जी मंच पर पहुंचते हैं. समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव प्रेम नारायण राम जी को प्रमाणपत्र प्रदान करते हैं और पूरा पंडाल एक बार फिर तालियों से गूंज उठता है. राम जी प्रमाणपत्र पाकर धन्य हो जाते हैं, क्योंकि यह उनके संघर्ष की जीत का परिणाम है.एक-एक करके 3100 आदिवासियों को जंगल की ज़मीन पर जोत-कोड़ करने और फसल उगाने का अधिकार प्रमाणपत्र दिया गया.

सोनभद्र की तीन तहसीलों घोरावल, राबटर्‌‌सगंज और दुद्धी के जंगलों की कुल 3258.50 एकड़ भूमि पर 3100 आदिवासियों को वनाधिकार क़ानून 2006 के तहत अधिकार दिया गया.

सोनभद्र में 275 ग्राम वनग्राम हैं. इन गांवों में वनाधिकार क़ानून के तहत ग्राम समितियों का गठन किया गया है. सोनभद्र में तीन लाख 78 हज़ार 442 आदिवासी हैं. वनाधिकार क़ानून के तहत कुल 51862 लोगों ने दावे ग्राम समितियों के पास प्रस्तुत किए थे. इनमें 32,371 दुद्धी तहसील, 15,912 राबटर्‌‌सगंज तहसील और 3,579 घोरावल तहसील से प्राप्त हुए थे. क़रीब 27,000 दावों का स्थलीय सत्यापन ज़िला स्तर पर किया गया, जिनमें 3100 आदिवासियों को वनाधिकार क़ानून के तहत अधिकार योग्य पाया गया. शेष दावों का सत्यापन हो रहा है. अधिकार प्रमाणपत्र पाने वाले सभी अनुसूचित जनजाति के हैं.

राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच की रोमा का कहना है कि यह जनवादी प्रक्रिया की जीत है. वनाधिकार क़ानून के तहत जल्द से जल्द आदिवासियों समेत अन्य परंपरागत वन निवासियों को भूमि अधिकार प्रमाणपत्र दिया जाए, अन्यथा स्थिति और भयावह होगी. रोमा उत्तर प्रदेश में वनाधिकार क़ानून की समन्वयक भी हैं. जन संघर्ष मोर्चा के संयोजक अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस क़दम को ऊंट के मुंह में जीरा करार दिया. उन्होंने जंगल की ज़मीन पर क़ाबिज़ सभी आदिवासियों समेत अन्य परंपरागत वन निवासियों को यथाशीघ्र भूमि अधिकार प्रमाणपत्र देने की मांग की. आदिवासी गिरिवासी समिति के अध्यक्ष एवं 27 वर्षों तक दुद्धी विधानसभा से विधायक रह चुके विजय सिंह गौड़ ने उत्तर प्रदेश सरकार की इस कार्रवाई को खानापूर्ति मात्र बताया. उन्होंने कहा कि आदिवासियों को उनकी पूरी ज़मीन मिलनी चाहिए, जिस पर वे क़ाबिज़ हैं. ज़िला प्रशासन ने बिना स्थलीय सत्यापन के ही लोगों को पांच बीघा की जगह पांच बिस्वा ज़मीन पर अधिकार का काग़ज़ पकड़ा दिया गया है. इससे आदिवासियों में संघर्ष बढ़ेगा.

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