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अनुभव की ज़मीन और आज़ाद भारत का सच

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पिछले कुछ वर्षों में युवा भारतीय अंग्रेज़ी लेखकों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने लेखन का न केवल लोहा मनवाया, बल्कि जमकर वाहवाही भी बटोरी. खास बात यह रही कि अंग्रेज़ी लेखकों की एक पूरी की पूरी नई पीढ़ी सामने आई और उसने रचनात्मक लेखन की दुनिया में अपनी धमक का अहसास कराया. किरण देसाई को उनके उपन्यास इनहेरिटेंस ऑफ लॉस के  लिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बुकर पुरस्कार मिला तो उधर अरविंद अडिगा ने भी अपने उपन्यास व्हाइट टाइगर के  लिए दुनिया भर के लेखकों को पछाड़ कर बुकर की रेस जीती और अपने लेखन का डंका बजाया. इसके अलावा विक्रम चंद्रा के सेक्रेड गेम्स की भी धूम मची रही. वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष की किताब द ब्लाइंड फेथ को पाठकों के  साथ-साथ आलोचकों ने भी खूब सराहा. कुंभ मेले को केंद्र में रखकर लिखी गई इस किताब ने सागरिका घोष के अनुभव को विस्तार से पाठकों का परिचय कराया. इनके अलावा युवा लेखक सिद्धार्थ धनवंत सांघवी ने द लॉस्ट फ्लेमिंगोज़ ऑफ बांबे  लिखी, जिसमें लेखक ने जेसिका लाल मर्डर केस को केंद्र में रखकर ग्लैमर की दुनिया के  स्याह पक्ष को उद्‌घाटित किया. लेखिका एवं फिल्म निर्देशक राजश्री ने भी ट्रस्ट मी में फिल्मी दुनिया के  काले पक्ष को सामने रखने की कोशिश की.

इसके अलावा कॉरपोरेट और शिक्षा जगत के  लोगों ने भी रचनात्मक लेखन में हाथ आज़माए. तनुश्री पोद्दार की बूट बेल्ट्स और ब्रेट्स, जाह्नवी आचरेकर की विंडो सीट, पलाश कृष्ण मेहरोत्रा की युनिख़ पार्क और कोंकणा सेन की कैपिचिनो डस्क भी आईं, जिनमें रचनात्मक लेखन का एक स्पार्क रेखांकित किया जा सकता है. इसी कड़ी में अब डेढ़ दशक से पत्रकारिता की दुनिया में संवेदनशील रिपोर्टिंग से अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली पत्रकार कोटा नीलिमा की दूसरी किताब डेथ ऑफ अ मनीलेंडर आई है. कोटा की पहली किताब रिवर स्टोंस किसानों की खुदकुशी की वज़हों और इस समाज के  हालात पर केंद्रित थी. कोटा की दूसरी किताब के  केंद्र में भी किसान और उनका समाज ही है. द डेथ ऑफ ए मनीलेंडर में दक्षिण भारत के  किसान हैं, उनका समाज है, उनकी ज़िंदगी के  बेहद नुकीले और ख़ुरदरे यथार्थ हैं. यह एक ऐसा समाज है, जहां हर व़क्तकिसानों का सामना ज़िंदगी और मौत के  ऐसे भयावह यथार्थ से होता है, जिसका न तो सामना किया जा सकता है और न ही उससे मुंह मोड़ा जा सकता है.  यह एक पत्रकार की नज़र से देखा गया आज़ाद भारत का ऐसा यथार्थ है, जिससे न केवल राज्य सरकारें, बल्कि केंद्र सरकार भी नज़र चुराकर निकल लेने में ही अपनी भलाई समझती है. कोटा ने इस उपन्यास में अपने अनुभवों के  आधार पर सिक्के के  दूसरे पहलू को भी उद्‌घाटित करने की कोशिश की है. यह उपन्यास एक पत्रकार फलक के  इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे सुदूर दक्षिण भारत के  एक गांव बापट में वहां के  हालात का जायज़ा लेने के  लिए भेजा जाता है. उस गांव में किसानों को ब्याज पर क़र्ज़ देने वाले एक महाजन की लाश उसके  घर के  सामने एक लैंप पोस्ट से लटकी पाई जाती है. फलक को प्रथमदृष्टया यह लगता है कि क़र्ज़ लेने वाले किसानों ने उसके अत्याचार से तंग आकर उसकी हत्या कर दी और उसकी लाश को लैंप पोस्ट से टांगकर दूसरे महाजनों को संदेश दिया है. सूद़खोरों की पारंपरिक छवि भी यही होती है कि वे किसानों को तंग करते हैं, उन पर अत्याचार करते हैं और क़र्ज़ दी गई राशि का कई गुना ब्याज वसूलने के  बावजूद मूल राशि जस की तस बची रहती है. फलक शुरुआत में यही रिपोर्ट भी करता है. लेकिन, जब उसने महाजन देशराज के क़त्ल की तफ़्तीश शुरू की तो उसका सामना एक अलग ही सच से होता है. उसे पता चलता है कि देशराज एक अलग क़िस्म का मनीलेंडर था. वह किसानों को सस्ते ब्याज पर न केवल क़र्ज़ मुहैया कराता था, बल्कि उन्हें कृषि करने के वैज्ञानिक तरीक़ों से अवगत भी करवाता था. देशराज का क़त्ल किसानों ने नहीं, बल्कि खौ़फ फैलाने के  लिए उसकी ही बिरादरी के  लोगों ने किया. इस सच को जानने के  बाद उसे ग्लानि भी होती है कि उसने अपनी रिपोर्ट में इस हक़ीक़त का ज़िक्र नहीं किया और आगे चलकर उसके  मन में घमासान द्वंद्व चलता है. फलक का जो यह द्वंद्व है, वह द्वंद्व लेखिका का अपना है. किताब के  विमोचन के  बाद सवाल जवाब के  सत्र में कोटा नीलिमा ने यह स्वीकार किया था कि जब भी वह रिपोर्टिंग के  किसी असाइनमेंट से वापस लौटती थीं तो हमेशा ़खबर और अवधारणा के  द्वंद्व के बोझ तले न्य़ूजरूम में घुसती थीं. लेखिका का यह द्वंद्व उनके  उपन्यास के  नायक पर भी सा़फ-सा़फ दिखता है. फलक की इस द्वंद्व कथा के  साथ-साथ उसकी महिला मित्र वाणी और ऋृ ग्वेद के  उपदेशों की भी एक सामांतर कथा चलती है. इस उपन्यास में कई और पात्र हैं.  एक पुलिस अ़फसर है, एक फोटोग्राफर है, कई अन्य सूद़खोर महाजन हैं और खेतिहर मज़दूरों का एक हुजूम है. लेकिन आज़ाद भारत की इस हक़ीक़त को जब कोटा अपने लेखन का विषय बनाती हैं और एक उपन्यास का वितान खड़ा करती हैं तो देशराज के  क़त्ल और उसकी साज़िश का वर्णन कहीं पाठकों को एक मर्डर मिस्ट्री का आनंद भी देता है. कोटा की दोनों किताबों के  कई चरित्रों में समानता देखी जा सकती है. पहली किताब का एक चरित्र अरि मोहन भी किसानों का हित चाहता है और यहां देशराज एक सूद़खोर महाजन होने के  बावजूद किसानों की भलाई में यक़ीन रखता है. कोटा नीलिमा के  इस उपन्यास पर कुछ समीक्षकों ने आपत्ति जताई कि यह एक रिपोर्ताज है, इसमें फिक्शन के  तत्व नहीं हैं. हो सकता है कि उनकी आपत्ति में दम हो, लेकिन इस आधार पर इसे खारिज़ नहीं किया जा सकता है कि इसमें कथा तत्व नहीं हैं. जैसा कि ऊपर भी कहा जा चुका है कि देशराज के  मर्डर की साज़िश और उसका क़त्ल एक थ्रिलर की तरह है और इसमें कथा के  सारे तत्व भी मौजूद हैं. कुल मिलाकर अगर हम समग्रता में विचार करें तो कोटा नीलिमा का यह उपन्यास इसलिए उल्लेखनीय है कि भारत के  उस यथार्थ का चित्रण इसमें है, जो न केवल ज़मीनी है, बल्कि अनुभव की ठोस भूमि पर भी खड़ा है.

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