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दाल के कटोरे की चमक फीकी पड़ी

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कृषि आधारित राज्य बिहार के किसान बड़े ही अजीबोगरीब दौर से गुज़र रहे हैं. सूबे की भौगोलिक बनावट और आपदाओं की मार ने किसानों की कमर तोड़ दी है. उनके जख्मों पर मरहम लगाने का दावा करने वाली सरकारी एवं गैर सरकारी एजेंसियों के कारनामे किसानों के नाम पर हो रही हीलाहवाली साफ बयां करते हैं. पूर्वोत्तर ज़िले का अधिकांश भू-भाग हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है. गंगा, गंडक, कोसी और कमला बलान किसानों को खून के आंसू रूलाती हैं. वहीं दक्षिण बिहार का अधिकांश भू-भाग पठारी है या फिर नक्सल प्रभावित. इस वजह से इलाक़े के किसानों के लिए खेती अब निर्भरता का जरिया नहीं रह गई है. कुल मिलाकर मध्य बिहार के मैदानी इलाक़े ही राज्य की अर्थ व्यवस्था यानी कृषि का मूल आधार रह गए हैं. इनमें बाढ़, बड़हिया और टाल क्षेत्र राज्य के सबसे बड़े कृषि फार्म हैं. लगभग 1064 वर्ग मील में फैले टाल क्षेत्र की सीमा पटना, नालंदा, शेखपुरा और लखीसराय ज़िलों तक फैली है. दलहन फसल के उत्पादन में टाल क्षेत्र देश में पहला और एशिया में दूसरा स्थान रखता है. इस कारण इसे दाल का कटोरा भी कहा जाता है. इस विस्तृत भू-भाग में मसूर, चना, मटर और अरहर जैसी फसलें बड़े पैमाने पर होती हैं. टाल क्षेत्र में बसने वाली क़रीब दस लाख से अधिक आबादी पूरी तरह दलहन की फसल पर ही निर्भर करती है. यह अत्यंत छिछला इलाक़ा है. काली मिट्टी पाए जाने के कारण टाल की भूमि अत्यंत उर्वर मानी जाती है. इस इलाक़े के किसान खेतिहर ज़मीन की जुताई के बाद केवल बीज का छिड़काव करते हैं और तय अवधि के बाद वे अपनी फसलों को काटने के लिए ही खेत पर जाते हैं. इस दौरान न तो सिंचाई करने की ज़रूरत होती है और न उर्वरक डालने की. इस वजह से टाल को सोना उगाने वाली धरती भी कहा जाता है. मगर, हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं के कारण देश के सबसे बड़े दलहन उत्पादक क्षेत्र के किसानों की कमर कमज़ोर हो चली है. दीगर बात यह है कि प्रदेश सरकार ने कृषि का विकास करने के लिए क़रीब साढ़े छह हज़ार करोड़ रुपये का नया कृषि रोड मैप तैयार किया है, लेकिन टाल क्षेत्र में सरकार की इस योजना की परछाई अब तक नहीं पड़ी है. टाल के किसान अब भी परंपरागत और दशकों पुराने ढर्रे पर खेती करने को विवश हैं. देश भर में कृषि तकनीक को बढ़ावा देने के लिए गठित कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण यानी आत्मा का कारनामा भी कम रोचक नहीं रहा. देश भर में जो इलाक़ा दाल की खेती के लिए मशहूर रहा और जहां की जलवायु, मिट्टी एवं आबोहवा दलहन की खेती को बढ़ावा देती है, वहां की स्थिति चिंताजनक है. आत्मा इस क्षेत्र में सब्ज़ी उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना चला रही है. आत्मा द्वारा अनुसंशित अधिकांश योजनाएं सब्ज़ी उत्पादन से जुड़ी हैं. इनमें रेड कैवेज, चुकंदर, टमाटर एवं प्याज की उन्नत किस्मों की फसल शामिल है. इसके तहत किसानों को एक से लेकर पांच दिनों तक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. जबकि असलियत यह है कि धान की खेती के मौसम में टाल का पूरा इलाक़ा बाढ़ के पानी से जलमग्न रहता है. किसानों की बदहाली दूर करने के नाम पर ऐसे प्रशिक्षणों के माध्यम से हर माह करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए जा रहे हैं. ऐसे में इन किसानों के हिस्से कितना पैसा आता होगा, यह कहने की ज़रूरत नहीं है.

वैसे टाल के किसानों की बदक़िस्मती यहीं खत्म नहीं होती. बारिश के दिनों में चार माह तक यह इलाक़ा पूरी तरह जलमग्न हो जाता है, जो यहां के किसानों के लिए अभिशाप है. नतीजतन, साल भर में वे महज़ एक ही फसल उगा पाते हैं. टाल के किसान दशकों से इस समस्या को झेलते आ रहे हैं, लेकिन आज़ादी के छह दशक ग़ुजरने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकार टाल के किसानों को दोहरी फसल का लाभ दिलाने में नाकाम रही हैं.

वैसे टाल के किसानों की बदकिस्मती यहीं खत्म नहीं होती. बारिश के दिनों में चार माह तक यह इलाक़ा पूरी तरह जलमग्न हो जाता है, जो यहां के किसानों के लिए अभिशाप है. नतीजतन, साल भर में वे महज़ एक ही फसल उगा पाते हैं. टाल के किसान दशकों से इस समस्या को झेलते आ रहे हैं, लेकिन आज़ादी के छह दशक गुज़रने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकार टाल के किसानों को दोहरी फसल का लाभ दिलाने में नाकाम रही हैं. दरअसल इसी टाल की राजनीति के जरिए संसद की गलियों तक पहुंचने वाले पूर्व सांसद नीतीश कुमार ने क्षेत्र के लोगों को भरोसा दिलाया था कि केंद्र में उनकी सरकार बनी तो टाल का विकास किया जाएगा. केंद्र में उनकी सरकार भी बनी. नीतीश कुमार कुछ समय के लिए कृषि मंत्री भी बनाए गए, लेकिन इस क्षेत्र का ज़्यादा विकास नहीं हुआ. हां, इस दरम्यान उन्होंने बाढ़ में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना जरूर कराई. उनके कार्यकाल में टाल के विकास को लेकर एक योजना भी बनाई गई, जिसके तहत प्रमुख इलाक़ों में बड़े बांध बनाकर बाढ़ के पानी को रोकना था, ताकि बाढ़ के दिनों में पानी खेतों के बजाय नहरों और नदियों से होकर निकल जाए. लेकिन, इस योजना के लिए जारी करोड़ों रुपये का बंदरबांट हो गया. इस काम को कराने का जिम्मा उठाने वाले एक बाहुबली राजनेता और उनके गुर्गों ने किसानों के अरमानों को तोड़ डाला. नतीजतन, देश भर को दाल की आपूर्ति करने वाले टाल के किसान आज भी फटेहाल हैं. तत्कालीन सांसद अब सूबे के निजाम बन चुके हैं. बावजूद इसके टाल क्षेत्र के विकास के लिए पायलट परियोजना अभी तक लागू नहीं हो सकी है.

पायलट परियोजना क्या है?

टाल क्षेत्र के विकास के लिए छोटी-छोटी योजनाओं के बजाय विशेषज्ञों ने एक पायलट परियोजना को मूर्त रूप देने की वकालत दशकों पूर्व की थी. चूंकि टाल की मिट्टी फसल उत्पादन के लिए क्षमता से ज़्यादा उर्वर है. उसकी उर्वरता के पीछे हर साल आने वाला बाढ़ का पानी है. जानकारों की राय में काली-चिकनी मिट्टी में फसल की जड़ों को कसने और भरपूर पोषण देने की क्षमता होती है. यही वजह है कि टाल की खेती में किसानों को न तो खाद देने की ज़रूरत पड़ती है और न ही सिंचाई करने की. बस बीज डालो और फसल काटो. लेकिन चार माह तक पानी में डूबे रहने के कारण टाल के किसान अपने खेतों में एक ही फसल का लाभ उठा पाते हैं. इसी को ध्यान में रखकर अस्सी के दशक में विशेषज्ञों ने पायलट परियोजना के जरिए टाल विकास की वकालत की थी. इस परियोजना के तहत फतुहा से लेकर बड़हिया तक फैले टाल क्षेत्र को सीमित जोन में बांटकर बाढ़ के पानी से बचाव करना था, ताकि बरसात के दिनों में भी फसलें महफूज रह सकें. विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि टाल में योजनाबद्ध तरीक़े से नहरों का जाल बिछाया जाए. इन नहरों को टाल में बहने वाली महाने, बाड़ी, डगराइन समेत अन्य छोटी नदियों से जोड़ दिया जाए, ताकि बाढ़ का पानी खेतों में जाने के बजाय नहरों से होता हुआ इन नदियों में जा मिले. हालांकि इस योजना का दूसरा पहलू यह था कि गर्मी के दिनों में जब नहरों में पानी जमा होगा, तब इलाक़े के किसान नहरों से सिंचाई कर अच्छी उपज हासिल कर सकेंगे. योजना के क्रियान्वित हो जाने के बाद टाल क्षेत्र में दोहरी फसल की संभावना बन सकती है. योजना के साकार होने में अरबों रुपये खर्च आने का अनुमान है. लेकिन, यह योजना महज़ राजनीतिक गलियारों में चर्चा तक सिमट कर रह गई और केंद्रीय कृषि मंत्री के ओहदे से उतरने के बाद तत्कालीन सांसद नीतीश कुमार भी इस मुद्दे को भूल गए.

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