राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के प्रभावशाली पद से एम के नारायणन को सीधे पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाए जाने के बाद से अटकलबाज़ियों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा. इससे पहले भी कई बार यह चर्चा का विषय बनता रहा है. नारायणन प्रधानमंत्री जी के प्रभावशाली सलाहकार रहे हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि इस बदलाव से सबसे शक्तिशाली समझे जाने वाले कार्यालय का बेहद संतुलित स्वरूप प्रभावित होगा. वे पूछते हैं कि क्या इससे प्रधानमंत्री कार्यालय को नुक़सान उठाना पड़ेगा?
26/11 के बाद से ही छिपे हमले की आशंका व्यक्त की जा रही है. किसी को भी इस अटकलबाज़ी पर भरोसा नहीं है. लेकिन ऐसे भी लोग हैं, जो इस बात में ज़्यादा यक़ीन रखते हैं कि गृहमंत्री पी चिदंबरम अंततः मज़बूत होकर उभरे हैं. नारायणन के कार्यकाल ने संवेदनशील मुद्दों पर निगरानी रखने के काम को पुनर्स्थापित किया. प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी योग्यता के अनुकूल इसे अपने पास ही रखा था. संकेत इस बात का है कि नारायणन की नई भूमिका एक विस्तारित वैश्विक सुरक्षा जनादेश के साथ केवल आंतरिक पर्यवेक्षक की होगी.
नारायणन प्रधानमंत्री जी के प्रभावशाली सलाहकार रहे हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि इस बदलाव से सबसे शक्तिशाली समझे जाने वाले कार्यालय का बेहद संतुलित स्वरूप प्रभावित होगा. वे पूछते हैं कि क्या इससे प्रधानमंत्री कार्यालय को नुक़सान उठाना पड़ेगा?
लेकिन वहीं, दिल्ली में सत्ता के गलियारों की खबर रखने वाले अभी भी इस बारे में अटकलें लगा रहे हैं कि कहीं नारायणन की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति इस बात का कोई पूर्व संकेत तो नहीं है कि निकट भविष्य में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं और राहुल पूरी सक्रियता के साथ वहां चुनाव अभियान में हिस्सा लेने की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि राजनीतिक रूप से यह निष्कर्ष बीते दिनों की बात हो चुका है कि इस बार चुनाव में ममता बनर्जी निर्णायक बढ़त बना पाने की स्थिति में होंगी. राहुल का तो पक्का विश्वास है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की बुनियाद खड़ा करने के लिए अभी से बेहतर समय हो ही नहीं सकता. सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता रखने में नारायणन की क़ाबिलियत का भरोसा कुछ ऐसा है, जो सोनिया गांधी को बे़फिक्र और सुक़ून से भरा रखता है कि राहुल गांधी राज्य में निर्भीक होकर चुनाव अभियान में हिस्सा ले सकेंगे. उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान की योजना बनने से ठीक पहले राज्यपाल के रूप में राजेश्वर की नियुक्ति की बात याद कीजिए. उस समय भी उनकी नियुक्ति को लेकर वहां ऐसी ही अटकलें लगाई जा रही थीं.
नारायणन के निकलने के बाद चिदंबरम ने यह महसूस किया कि उन्हें इस बात को स्पष्ट करना चाहिए था कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (आरएडब्ल्यू) को नेशनल काउंटर टेररिज़्म सेंटर नामक उस नई एजेंसी, जिसकी वह योजना बना रहे थे, के अधीन लाने का उनका कोई विचार नहीं था. कुछ लोगों को इस बात पर हैरानी हो रही है कि कहीं यह तनातनी खत्म होने का संकेत तो नहीं.
तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने जो बयान दिए थे, उनसे निश्चित तौर पर कोई मदद नहीं मिली, बल्कि उन्होंने उनकी विरासत संभालने वालों को परेशान ज़रूर कर दिया. चीनियों की द़खल प्रधानमंत्री कार्यालय तक होने की आशंका व्यक्त की जा रही है. दिल्ली में जिस तरह का सुरक्षा माहौल है, उसे देखकर राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर भय व्यक्त किया जा रहा है. ऐसा लगता है कि सारा ध्यान विभागीय खींचतान, उत्तराधिकार की लड़ाई और व्यक्ति विशेष के भविष्य पर केंद्रित है. देश के लिए यह अजीब बात है कि वह बाहरी और अंदरूनी दोनों चुनौतियों से जूझ रहा है.
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