सर्वोच्च न्यायालय यह समझ पाने में सक्षम है कि न्यापालिका की स्वतंत्रता कैसे बहाल हो सकती है. और, उसकी विश्वसनीता कैसे बरक़रार रखी जा सकती है. वह इस बात को भलीभांति समझ सकता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वकीलों में से योग्य लोगों का चुनाव कैसे किया जा सकता है. लंबे समय से यह दुविधा बनी रही कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता ख़त्म करने के लिए अकेले कार्यपालिका ही ज़िम्मेदार रही है, लेकिन यह भी तय नहीं हो पाया कि न्यायपालिका को किस बात से ज्यादा नुक़सान हो रहा है. पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, वह इसी ओर संकेत करता है. हाल में न्यायमूर्ति दिनाकरन, न्यायमूर्ति मुखर्जी एवं न्यायमूर्ति चंद्रमौलि की पदोन्नति पर बड़े विवाद हुए थे. न्यायिक व्यवस्था में अंदर तक घुसा भ्रष्टाचार और न्याय को बाज़ार की चीज बना देना आदि भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.
उच्च न्यायालय में जिन्हें प्रोन्नत किया जाता है, उनकी प्रोन्नति में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की रास का़फी मायने रखती है. सत्तारूढ़ दल प्रोन्नति के लिए वकीलों का चयन किस आधार पर करते हैं, यह भी का़फी महत्वपूर्ण है. अब तक ही व्यवस्था थी और अभी भी है. बहुत हद तक यह मामला वैसा लगता है, जैसे यह कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लेनदेन का कोई मामला हो. न्यायाधीश की पसंद के साथ-साथ सत्तारूढ़ पार्टी के लोग भी प्रोन्नत कर दिए गए. शुरुआत में प्रोन्नति में कहीं कोई पारदर्शिता नज़र नहीं आती थी और न्यायाधीशों को जिस तरह से प्रोन्नत किया गया, उसे किसी भी लिहाज़ से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता. जिस तरीक़े से न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी, वह ज़रा भी तार्किक नहीं था. बस मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सब कुछ था. राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से उच्च न्यायालय में नियुक्ति और सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए सलाह करते हैं.
पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, वह इसी ओर संकेत करता है. हाल में न्यायमूर्ति दिनाकरन, न्यायमूर्ति मुखर्जी एवं न्यायमूर्ति चंद्रमौलि की पदोन्नति पर बड़े विवाद हुए थे. न्यायिक व्यवस्था में अंदर तक घुसा भ्रष्टाचार और न्याय को बाज़ार की चीज बना देना आदि भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.
न्यायपालिका में नियुक्तियों में ज़रा भी पारदर्शिता देखने को नहीं मिलती है. सब कुछ छिपा रहता है. लेकिन अगर एक बार नियुक्ति हो गई तो किसी खास उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पदमुक्त करना असंभव हो जाता है. यहां तक कि अगर सर्वोच्च के मुख्य न्यायाधीश स्वयं अपने हाथों से भी पदमुक्त करने के बारे में लिखकर दे दें तो भी नहीं. जैसा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के मामले में हुआ. दरअसल महाभियोग एक प्रकिमा है. भारती संविधान के अंतर्गत जैसी प्रकिया बताई गई है, उसके अंतर्गत उसे हासिल कर पाना असंभव है. इससे ज्यादा बेअसर उपाय कुछ भी नहीं सोचा जा सकता है. सरकार अवरोध और संतुलन पर आधारित है. इसमें शक्तियों का बंटवारा है और लोगों की संप्रभुता भी है. वैसे न्यायाधीशों, जिन्होंने जनता का विश्वास खो दिया है या फिर जो अहंकार या दुर्व्वहार पर उतारू हो जाएं, को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए महाभियोग एक संवैधानिक तरीक़ा है. अ़फसोस इस बात का है कि इस्तेमाल न होने से यह उपकरण जंग खा गया है. उच्च न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोगों को सेवा से केवल महाभियोग की प्रकिमा द्वारा ही हटाया जा सकता है. भारती संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के तहत महाभियोग की प्रकिया का उल्लेख है. इसके अनुसार, न्यायाधीशों पर दुर्व्वहार साबित होने और अक्षम्ता के आधार पर ही महाभियोग की प्रकिमा द्वारा उन्हें हटाया जा सकता है. भारत में ऐसी कोई दूसरी प्रकिया नहीं है, जिसके ज़रिए न्यायाधीशों को अवकाश ग्रहण से पहले ही पद से विमुक्त किया जा सके. महाभियोग की संपूर्ण प्रकिया अत्यंत कठोर है और जटिल भी. महाभियोग के प्रस्ताव को सदन में उपस्थित और मतदान में शामिल लोगों का दो तिहाई बहुत हासिल होना चाहिए. आज तक भारत में किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग की प्रकिया द्वारा पदमुक्त नहीं किया जा सका है. आज भी यह बस काग़ज़ों तक ही सीमित है. दिनाकरन मामले में क्या होता है, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि महाभियोग के लिए पेश प्रस्ताव के प्रति सत्तारूढ़ दल ने सकारात्मक प्रतिकिया नहीं दी है.
लेकिन, अब कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी डी दिनाकरन के ख़िला़फ महाभियोग की प्रकिया शुरू हो सकती है. राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी एस सिरपुरकर की अध्क्षता में तीन सदसें का पैनल गठित किया है, ताकि वह इस पूरे प्रकरण को देख सकें. भूमि अधिग्रहण के मसले पर राज्यसभा में 75 विपक्षी सदस्यों ने दिनाकरन को हटाने की मांग की थी. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए आर दवे और मशहूर नविद् एवं वरिष्ठ वकील पी आर राव पैनल के शेष दो सदस्य हैं. इस पैनल का गठन जज एक्ट (जांच) के तहत हुआ है. राज्यसभा की अधिसूचना के मुताबिक़, यह पैनल न्यायाधीश पॉल डेनिल दिनाकरन प्रेम कुमार के बारे में उन तथ्यों की जांच करेगा, जिनके आधार पर उन्हें हटाने की मांग की गई है. राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने यह बात पहले ही स्वीकार कर ली थी कि दिनाकरन पर महाभियोग चलाने के लिए 75 विपक्षी सांसदों ने उनसे मांग की है. बावजूद इसके एक महीने से भी अधिक समय के बाद पैनल गठित करने की घोषणा की गई. सांसदों ने सभापति को 55 पृष्ठों की नोटिस लिस्ट भेजी है, जिसमें दिनाकरन पर 12 आरोप लगाए गए हैं. पैनल से छह महीने के भीतर इस मसले पर रिपोर्ट पेश करने की बात कही गई है. जांच पैनल अपनी रिपोर्ट राज्यसभा के सामने पेश करेगा. यदि लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं और तब तक दिनाकरन इस्ती़फा नहीं दे देते हैं तो संसद उसके बाद महाभियोग की प्रकिया शुरू करेगी.
यदि समिति कहती है कि महाभियोग की प्रकिया शुरू की जानी चाहिए तो उसके बाद इस मसले पर संसद के दोनों सदनों में बहस होगी. महाभियोग का सामना कर रहे न्यायाधीश या उसके प्रतिनिधि को भी अवसर दिया जाएगा, ताकि वह ख़ुद को बेदाग़ साबित कर सके. हालांकि यह सारी प्रकिया संसद के एक ही सत्र में पूरी होनी चाहिए. ऐसा न होने से सारी प्रकिया फिर से शुरू की जाएगी. यानी महाभियोग की प्रकिया का किसी एक सत्र विशेष में पूरा होना ज़रूरी है.
संसद में चर्चा ख़त्म होने और न्यायाधीश का पक्ष सुनने के बाद यदि सदन महाभियोग के मसले पर मतदान कराने का फैसला लेता है तो उसी सत्र में दोनों सदनों में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुत से पास होना चाहिए. उसके बाद प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा, क्योंकि राष्ट्रपति ही न्यायाधीश को हटाने का आदेश देता है.
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