हमारा ईको सिस्टम तमाम जीवित प्राणियों के लिए का़फी अहम माना जाता है. इस व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू होने के लिए आपको कृषि वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है. कृषि तकनीक अगर जांची परखी न गई हो तो उसके असफल होने की आशंका रहती है. साथ ही यह जीवन के विभिन्न पहलुओं पर खराब असर भी डालती है. जेनेटिक फेरबदल से तैयार फसलों (जीई) से आनुवंशिक प्रदूषण फैलता है. इस वजह से फसलों की पैदावार में असंतुलन भी बढ़ता है. अब जबकि कृषि और खाद्य समस्याएं का़फी सुर्ख़ियों में आ रही हैं तो ऐसे में यह सारा मसला बेहद गंभीर हो जाता है. इन सभी ख़बरों के बीच जीई फसलों पर एक बार फिर से विचार करने की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि सलीक़े से समझने की भी आवश्यकता है. इन सभी के बारे में किस तरह की चर्चाएं हो रही हैं और क्यों हो रही हैं, हम सभी को इस बारे में विचार-विमर्श करना चाहिए? यदि अच्छी शुरुआत के तौर पर देखें तो यह सारा मसला हमारे भोजन से जुड़ा है!
जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी), पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करती है. 14 अक्टूबर 2009 को इस सरकारी संस्था ने देश में आनुवंशिक तौर पर पैदा की जाने वाली खाद्य फसल बीटी बैंगन की व्यवसायिक खेती के लिए अपनी मंजूरी दे दी. इस फैसले पर सिविल सोसायटी ने अपना कड़ा विरोध जताया था. इस तरह 15 अक्टूबर को पर्यावरण मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जीईएसी के निर्णय पर रोक लगा दी. इस विज्ञप्ति में यह कहा गया था कि मंत्रालय जनवरी और फरवरी 2010 के दौरान सभी संबंधित लोगों से सलाह-मशविरा कर इस विवादित मसले पर फैसला करेगा. पर्यावरण मंत्रालय जिन लोगों से सलाह-मशविरा करने की बात कह रहा है, उनमें वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ, किसान संगठन, उपभोक्ता समूह और ग़ैर सरकारी संगठन शामिल हैं. जीईएसी के फैसले के आधार पर तैयार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया 31 दिसंबर 2009 तक मांगी गई थी.
इस तरह हमारा देश पहली जीई फसल के समाशोधन की कगार पर खड़ा है. इससे बायो सुरक्षा नियामक प्रणाली की ओर लोगों का ध्यान का़फी त़ेजी से आकर्षित हुआ है. हालांकि इसमें अभी भी का़फी सुधार की गुंज़ाइश है. विज्ञान और तकनीक मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने 2008 में राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण विधेयक (एनबीआरए) प्रस्तावित किया था. यह मसौदा एनबीआरए के साथ तैयार किया जाना था. 2004 में कृषि जैव प्रौद्योगिकी टास्क फोर्स गठित की गई, जिसका अध्यक्ष प्रो. एम एस स्वामीनाथन को बनाया गया. दोनों मसौदे के तथ्यों की स़िफारिश स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स में की गई. जबकि राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विकास रणनीति को मंजूरी 2007 में ही दी गई.
दरअसल, डीबीटी ने यह कहा था कि आनुवंशिक तौर पर संशोधित उत्पादों की बायो सुरक्षा के लिए इसकी मंजूरी ही एकमात्र विकल्प है. यह सारा मामला विधेयक में निहित दो अनुमानों पर आधारित है. पहला यह कि जीएम तकनीक बिल्कुल दुरुस्त है और दूसरा यह कि इसका उपयोग विनियमित किया जा सकता है. पूरी दुनिया में कॉरपोरेट प्रायोजित विज्ञान पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. इसकी वजह है कि यह विज्ञान किसानों की ज़रूरतों के मुताबिक़ कम जवाबदेह है. साथ ही यह सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी तानेबाने पर भी नकारात्मक असर डालता है. बिना निरपेक्ष अध्ययन और जांच से कुछ लोग परेशान हैं. ये लोग जीएम के प्रभावों को लेकर ख़ासे चिंतित नज़र आ रहे हैं. यह विधेयक अधिकृत अमेरिकी नीतियों जैसा लग रहा है, जिनके मुताबिक़ जीएम और ग़ैर जीएम फसलों में कोई अंतर नहीं माना जाता है. इसीलिए उन पर कम नियंत्रण की वक़ालत की जाती है.
यहां विनियमन से तात्पर्य दंड के ज़रिए संशोधन या नियंत्रण करना है. लेकिन, इस मामले में जीएम पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है. वहीं दूसरी ओर यह जीएम के विनियमन का विधेयक अधिक नज़र आता है. मधुमक्खियां, चिड़ियां, हवाएं और पानी हमारी मिट्टी में पराग लाते हैं और कई दूसरी सामग्री भी मिलों दूर से लाकर इनमें मिलाते हैं. इससे कुछ फर्क़ नहीं पड़ता कि यह कितना भी भला या बुरा हो. विधेयक में यह कहा गया है कि आनुवंशिक प्रदूषण पर नियंत्रण रखना मनुष्य की सीमा से बाहर की बात है. एक बार जीएमओ की शुरुआत से प्रदूषण का होना सुनिश्चित हो जाएगा.
उपर्युक्त सभी और दूसरी कई वजहों से विधेयक पर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गई हैं. हालांकि सिविल सोसायटी जीएम और बायो सुरक्षा के मसले पर एक संपूर्ण क़ानून बनाने की मांग कर रही है. लेकिन, विधेयक के मौज़ूदा स्वरूप से इसकी स्वायत्तता पर कई गंभीर सवाल उत्पन्न होते हैं और इसी वजह से इसके मक़सद पर भी सवालिया निशान लग जाता है. साथ ही सरकार के विभिन्न विभागों में जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने पर सामंजस्य बना हुआ है. इससे विधेयक को स्वायत्त बनाने में आधिकारिक तौर पर सहूलियत का रास्ता सा़फ होता है. इस विधेयक में पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम (1986) के तहत 1989 के जीएम क़ानून को निरस्त करने का प्रावधान है. साथ ही यह पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पर्यवेक्षण के प्रावधान को भी हटाने की बात करता है. एकल नियामक प्राधिकरण भी राज्य और ज़िला स्तर की संस्थाओं से इसे अलग रहने की बात कहता है. वे बातें, जिन्हें संवैधानिक तौर पर चुनौती दी जा सकती है, राज्य के अंतर्गत आएंगी. यह बेहद ही दिलचस्प है कि आज तक बायो सुरक्षा का मसला संसद में क़ानून बनाने के लिए पेश नहीं हुआ है. महज़ एक बार बीटी कॉटन की वर्तमान स्थिति पर सवाल पूछा गया था.
(यह व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए स्वीकृत एकमात्र फसल है.)
यह दिलचस्प है कि भारत, 2003 से कार्टाजेना प्रोटोकॉल ऑन बायोसेफ्टी का सदस्य है और इसकी ज़रूरतों के मुताबिक़ संबंधित विधेयक अभी तक नहीं लाया गया है. इस संधि के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली चर्चाएं हमें निराश करती हैं. ख़ास तौर पर सभी की ज़िम्मेदारियों और समस्याओं के निवारण के मसले पर. इस संधि के तहत सदस्य देशों के लिए यह अनिवार्य है कि वह संशोधन के मामले में निर्णय लेते समय सार्वजनिक तौर पर लोगों से सलाह-मशविरा करें. साथ ही उनके फैसलों का क्या नतीजा आता है, इससे भी लोगों को अवगत कराना अनिवार्य है.
यदि क़ानून में जनता को सूचित करने की बात कही गई है तो अभी से ही इसकी शुरुआत क्यों नहीं की जाती है! यह अच्छी बात है कि इंटरनेट पर विधेयक और ईसी की रिपोर्ट सभी के लिए उपलब्ध है. लेकिन, भारत जैसे कितने देशों में किसानों की पहुंच इंटरनेट तक है? वास्तव में हर क्षेत्र में एक बायो सुरक्षा की ज़रूरत है, जिसमें निहित होता है कि मधुमक्खियां काम पर हैं, उन्हें परेशान न करें. दूसरे शब्दों में कहें तो सुरक्षित रहने के लिए जीएम (आनुवंशिक तौर पर संशोधित फसलों) को दूर रखें. मधुमक्खियां नहीं पढ़ सकतीं, लेकिन हम और आप जैसे कुछ लोग तो पढ़ सकते हैं. आनुवंशिक प्रदूषण अपरिवर्तनीय है. जैव विविधता ही इसकी सुरक्षा की गारंटी है और रोकथाम के ज़रिए एहतियात बरत कर ही उसकी सुरक्षा हो सकती है.
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