कठिन है चुनावी डगर

पिछले हफ्ते पूरी लय के साथ कांग्रेस ने बिहार में अपने चुनावी अभियान का शंखनाद किया. पूरे तामझाम के साथ आई राहुल गांधी की युवा ब्रिगेड ने राज्य के हर कोने में सदस्यता कार्यक्रम के बहाने जनता को यह संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस अब पूरी गंभीरता के साथ उनका साथ चाहती है, ताकि वह अपनी सरकार बनाकर राज्य को एक बार फिर विकास की पटरी पर ला सके. युवा तुर्कों ने कार्यकर्ताओं से भी सा़फ कहा कि नीतीश-लालू का दौर खत्म हो चुका है और कांग्रेस के युवा चेहरों को बिहार की ज़िम्मेदारी संभालनी है. इसलिए राहुल गांधी के मिशन बिहार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए सभी कांग्रेसियों को पिछली बातें भूलकर रात-दिन पसीना बहाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सदस्यता अभियान की शुरुआत के मौक़े पर उमड़ी भीड़ से युवा तुर्कों के चेहरों पर संतोष का भाव तो ज़रूर था, लेकिन बिहार की कठिन चुनावी चुनौतियों के एहसास मात्र से उनके माथे पर पड़ा बल भी सा़फ दिख रहा था. कमज़ोरी और गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस को ताजा झटका राज्य की नई कार्यकारिणी की सूची से भी लगा है. मनमाफिक पद न मिलने के कारण नाराज नेताओं की तादाद काफी बढ़ गई. सूची में जाति सूचक शब्द जोड़े जाने के कारण एक अलग विवाद पैदा हो गया है. इस तरह अंदर से उलझी कांग्रेस को इस चुनावी साल में नीतीश, लालू, पासवान और सुशील मोदी जैसे दिग्गजों से पार पाने के लिए एक-एक कदम फूंक-फूंककर रखना होगा.

दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव के समय जब कांग्रेस ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया तो उसी समय यह लगने लगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तैयारी के साथ जनता की अदालत में जाएगी. लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव में वोटों के इजाफे ने पार्टी को टॉनिक देकर अकेले अखाड़े में उतरने का साहस प्रदान किया. दिल्ली के निर्देश पर आहिस्ता-आहिस्ता मिशन बिहार पर काम चल रह था, लेकिन नई कार्यकारिणी की घोषणा ने रंग में भंग डाल दिया. कांग्रेस के लिए जीवन भर जीने और मरने वाले कार्यकारी अध्यक्ष समीर कुमार सिंह को महासचिवों की फौज में शामिल कर हाशिए पर डाल दिया गया, जबकि पार्टी संविधान की अवहेलना कर कई नए लोगों को बड़े पदों पर बैठा दिया गया. कांग्रेस संविधान के मुताबिक़, तीन सालों तक पार्टी का सदस्य रहने के बाद ही किसी को संगठन में ज़िम्मेदारी दी जा सकती है. हालांकि बाद में समीर सिंह को उपाध्यक्ष बनाकर नुक़सान को कुछ कम करने का प्रयास किया गया, लेकिन समीर के समर्थक चाहते हैं कि चुनावी साल में उन्हें एक बार फिर कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका दी जाए, ताकि अगड़ी जातियों में सही संदेश जाए. महासचिवों और सचिवों की संख्या पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. शिकायतों का पुलिंदा लेकर दिल्ली पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. विनोद शर्मा ने सचिव पद से इस्तीफा देकर प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा पर आरोप लगाया कि वह उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. शर्मा ने यहां तक कह दिया कि कार्यकारिणी समिति ही फर्जी है. बताया जा रहा है कि पहले से ही अनिल शर्मा से नाराज चल रहे कुछ नेताओं को भी नई सूची रास नहीं आ रही है. सूची में जाति सूचक शब्द जोड़े जाने को इन लोगों ने बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी शुरू कर दी है. सदानंद सिंह और महाचंद्र सिंह जैसे नेता तो अपनी बात राहुल गांधी तक रख आए हैं. मतलब यह कि सबको खुश करने के चक्कर में पार्टी ने बहुतों को नाराज कर दिया, लेकिन अनिल शर्मा ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि जो लोग संगठन चलाते हैं, वे उसमें आने वाली परेशानियों को समझ सकते हैं. शर्मा ने कहा कि बिहार से स़िर्फ नाम भेजा गया था, पदों का फैसला दिल्ली में किया गया. उन्होंने कहा कि पार्टी में कहीं कोई विवाद नहीं है और पार्टी पूरे दमखम के साथ विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है. शर्मा ने कहा कि कुछ लोग कांग्रेस के लगातार बढ़ रहे जनाधार से घबरा गए हैं और बिना मतलब की साज़िश में लगे हैं, लेकिन बिहार की जनता कांग्रेस के पक्ष में मन बना चुकी है और चुनाव परिणाम से यह बात साबित भी हो जाएगी.

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस के पक्ष में रुझान के बावजूद कमज़ोर संगठन के कारण पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में बहुत फायदा नहीं हुआ था. पार्टी इस कारण विधानसभा चुनाव में अपना पंजा मज़बूत कर लेना चाहती है, लेकिन नाराज नेताओ की मानें तो अनिल शर्मा में संगठन क्षमता का अभाव है. नई कार्यकारिणी का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक तो इतनी देरी हुई और सूची आई भी तो बिना मतलब की. न तो जातीय और न ही सामाजिक समीकरण का ख्याल रखा गया. इन नेताओं को लगता है कि सूची के कारण पार्टी के पक्ष में बन रहे माहौल पर ग्रहण भी लग सकता है. इसका आभास दिल्ली में बैठे नेताओं को भी हो गया है. इसलिए गलतियों की जांच और जवाबदेही तय करने की बात कही जा रही है. कांग्रेस के कई नेता सीधी टिप्पणी से तो बचते हैं, पर इतना ज़रूर कहते हैं कि लगता है सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अंधेरे में रखकर यह सूची तैयार की गई है. अनिल शर्मा के खिलाफ जो एक बात और कही जा रही है, वह है बिहार की चुनावी राजनीति में उनका कद. उन्हें न चाहने वाले नेता बार-बार यह कह रहे हैं कि लालू व नीतीश से मुकाबला है, तो उसी कद का नेतृत्व चाहिए. अनिल शर्मा को आगे रखकर इन दिग्गजों का मुकाबला करने उतरेंगे तो जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाएंगे. राहुल गांधी को भी यह बात समझाई जा रही है कि बिहार में कांग्रेस को एक ऐसा दमदार और स्वच्छ छवि का चेहरा चाहिए, जिस पर जनता भरोसा कर सके. सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस जल्द ही दूसरे दलों के कुछ दमदार नेताओं को पार्टी में शामिल करा सकती है या फिर उनसे सीटों के तालमेल पर बात कर सकती है.

लेकिन इतना सा़फ है कि इस कवायद में लालू प्रसाद शामिल नहीं होंगे. दिल्ली और पटना में बैठे कांग्रेस के रणनीतिकारों को ऐसा लगता है कि झारखंड में पार्टी को मिले समर्थन का लाभ बिहार में भी मिलेगा. झारखंड में पार्टी चाहती तो सरकार बना सकती थी, पर दूर की सोच के कारण पहल नहीं की गई. कहीं न कहीं इस सोच में बिहार का चुनाव भी शामिल था. शिबू सोरेन की सरकार में जदयू और भाजपा भी शामिल हैं. तय है कि कांग्रेस बिहार में इसे लेकर भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाएगी. कांग्रेस अपना दामन बेदाग रखकर बिहार की जनता को यह भरोसा दिलाने का प्रयास करना चाहती है कि केंद्र की सरकार के सहयोग से राज्य का कायाकल्प वह करेगी. बताया जाता है कि राज्य के कई इलाक़ों में आंतरिक सर्वेक्षणों में भी अगड़ी जातियों के अलावा अन्य कई पिछ़डी जातियों व अल्पसंख्यकों का लगाव पार्टी के पक्ष में दिखा, लेकिन इस लगाव को वोट में तब्दील करने के लिए कांग्रेस को आग के दरिया में डूब कर जाना है.

दिग्विजय बनेंगे बाबूलाल!

बूलाल मरांडी का मुस्कराता चेहरा और उनकी बेदाग छवि झारखंड में कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुई. चुनाव परिणाम बताते हैं कि न केवल संथाल परगना, बल्कि पूरे राज्य में बाबूलाल कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए काफी उपयोगी साबित हुए. अब बारी बिहार की है और सूत्रों पर भरोसा करें तो यहां कांग्रेस नीतीश कुमार के विजय रथ को रोकने वाले बांका के सांसद दिग्विजय सिंह में बाबूलाल मरांडी का चेहरा देख रही है. बिहार में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की मानें तो पार्टी दिग्विजय सिंह की बेदाग छवि और उनके राजनीतिक कद का लाभ उठाना चाहती है. लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह को जब जदयू का टिकट नहीं दिया गया तो अगड़ी जातियों, खासकर राजपूतों में नीतीश कुमार के प्रति खासी नाराजगी देखी गई. लाख बाधाओ के बावजूद जिस तरह दिग्विजय सिंह बांका से जीतकर दिल्ली पहुंचे, उससे कांग्रेस को लगता है कि आगामी विधानसभा चुनावों मे वह बाबूलाल की तरह ही उपयोगी साबित हो सकते हैं. कांग्रेस के रणनीतिकारों की सोच है कि बिहार में दलितों व अल्पसंख्यकों का रुझान तेज़ी से पार्टी की ओर बढ़ रहा है. बटाईदार क़ानून पर भ्रम के कारण भूमिहारों का लगाव भी जदयू से कम हुआ है. इसके अलावा विजय कृष्ण, प्रभुनाथ सिंह और आनंद मोहन जैसे राजपूत नेताओं का जो हाल हुआ है, उससे राजपूत मतदाताओं में भारी आक्रोश है. जगन्नाथ मिश्र एवं नीतीश मिश्र को हाशिए पर डाल दिए जाने के कारण ब्राह्मणों का बड़ा तबका भी नाराज चल रहा है. सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस चाहती है कि दिग्विजय सिंह बाबूलाल मरांडी की तरह सहयोग करें और सीटों पर तालमेल कर चुनाव मैदान में उतरें. कांग्रेस के रणनीतिकारों को ऐसा लगता है कि दिग्विजय सिंह के जुड़ने से न केवल राजपूतों, बल्कि अन्य नाराज चल रही अगड़ी जातियों के वोटों को भी पार्टी के पक्ष में गोलबंद किया जा सकता है. इस मामले में बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा का कहना है कि किन नए लोगों से तालमेल होना चाहिए, इसका ़फैसला तो केंद्रीय नेतृत्व को करना है, लेकिन नीतीश कुमार की भ्रष्ट सरकार को उखाड़ फेंकने में दिग्विजय सिंह सहयोग करेंगे तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी इसका पूरा स्वागत करेगी.

सूत्रों पर भरोसा करें तो दिल्ली में जब नई सरकार बन रही थी तो उस समय भी यह कोशिश की गई थी कि दिग्विजय सिंह सरकार में शामिल हो जाएं, पर बात बन नहीं पाई, लेकिन इस बार इंतजाम पक्का करने की कोशिश की जा रही है. बताया जाता है कि दो-तीन नेताओं की टोली ऑपरेशन दिग्विजय में जुटी है. काफी गुप्त तरीक़े से चल रहे इस ऑपरेशन पर आधिकारिक तौर पर कोई भी नेता बोलने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन सूत्रों की मानें तो बात काफी आगे बढ़ चुकी है और उसके बन जाने की भी उम्मीद है.

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