देश में मौत का अधिकार दिए जाने की मांग एक बार फिर से सु़र्खियों में है. इस मांग ने सर्वोच्च न्यायालय का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है. मामला 61 वर्षीय एक महिला से जुड़ा है. तक़रीबन 36 साल पहले बर्बर बलात्कार की शिकार यह महिला फिलहाल मुंबई के अस्पताल में है और लगभग कोमा की स्थिति में है. अरुणा रामचंद्र शानबाग नामक यह महिला अब और जीने की इच्छा नहीं रखती है. यहां तक कि डॉक्टरों ने भी उसके स्वास्थ्य में सुधार की संभावना क्षीण बताई है. अपनी दोस्त पिंकी विरानी के माध्यम से उसने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है कि वह मुंबई अस्पताल को निर्देश जारी करे कि उसे भोजन आदि के लिए बाध्य न किया जाए. सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली है और सरकार के जवाब की प्रतीक्षा कर रही है. सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि देश के क़ानून के मुताबिक़, हम किसी व्यक्ति को मरने की अनुमति नहीं दे सकते हैं. यूथेनसिया का शाब्दिक अर्थ भले ही अच्छी मौत है, लेकिन हम यहां जिस संदर्भ की बात कर रहे हैं, उसमें इसका आशय दया मौत से है. यह मूल रूप से बीमार या अशक्त मरीज़ों को जीवनलीला समाप्त करने की अनुमति देने से संबंधित है. इसलिए दया मौत के पीछे मूल भाव लंबी पीड़ादायक ज़िंदगी के बाद उस पीड़ित व्यक्ति की कम कष्टकारी मौत सुनिश्चित करना है. ज़हर की सूई देकर या फिर जीवनदायी सुविधाओं को धीरे-धीरे हटाकर दया मौत को अंजाम दिया जा सकता है.
दुनिया में सबसे पहले नीदरलैंड ने यूथेनेसिया को वैधानिकता प्रदान की थी. इसके बाद कनाडा, अमेरिकी राज्य ओरेगोन और कोलंबिया में इसे क़ानूनी मान्यता दी गई. ओरेगोन में डेथ विद डिगनिटी (गरिमापूर्ण मौत) क़ानून है और यह दस सालों से प्रचलन में है. यह गंभीर रूप से बीमार लोगों को अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए वैध प्रतिबंधित दवाएं लेने की स्वीकृति प्रदान करता है. यूथेनेसिया को वैधानिकता प्रदान करने का मुद्दा पूरी दुनिया में विवाद का विषय बना हुआ है और बना रहेगा. हाल ही में अरुणा शानबाग के बहुचर्चित मामले ने एक बार फिर से यूथेनेसिया के मुद्दे पर बहस छेड़ दी है. अरुणा शानबाग नर्स का काम करती थी. उसके साथ उसी अस्पताल के गेटकीपर ने बलात्कार ने किया था, जहां वह काम करती थी. यह 36 साल पहले की बात है. उसे लकवा मार गया और वह कोमा (अचेतावस्था) में चली गई और चिकित्सकीय शब्दावली में कहें तो उसकी मेंटल डेथ हो चुकी है. वह न तो बोल सकती है और न ही देख सकती है. चिकित्सकीय निगरानी में उसे हर दिन ज़बरन आहार दिया जाता है. पिछले 36 वर्षों से जो डॉक्टर उसे देख रहे हैं, उनका मानना है कि उसकी चेतना लौटने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है. आज अरुणा 60 साल की हो चुकी है. परिवार ने उसका परित्याग कर रखा है. एक सामाजिक कार्यकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि वह अस्पताल से अरुणा को ज़बरन पोषाहार न देने का आदेश दे और उसे चार दिनों में प्राण त्यागने दिया जाए. इसलिए सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या भारत यूथेनेसिया को वैधानिकता प्रदान करने के लिए तैयार है? भारत में यूथेनेसिया पूरी तरह से ग़ैर क़ानूनी है. अगर डॉक्टर मरीज़ को जान से मारने की कोशिश करता है तो मामला भारतीय दंड विधान की धारा 300 के अंतर्गत इरादतन हत्या का बनता है. लेकिन स्वैच्छिक यूथेनेसिया के मामले में, जिसमें मरीज़ अपनी ज़िंदगी को समाप्त करने का निर्णय लेता है तो मामला 1860 के भारतीय दंड विधान की धारा 300 के अपवाद पांच के अंतर्गत आ जाता है. और, इसलिए डॉक्टर भारतीय दंड विधान 1860 की धारा 304 के अधीन दोषी होगा.
आत्महत्या और यूथेनेसिया के बीच अंतर को लेकर भी भ्रम की स्थिति है. नरेश एम शेखरी बनाम भारत संघ के विवाद में इसके बीच स्पष्ट अंतर बताया गया. जस्टिस लोढ़ा कहते हैं कि आत्महत्या स्वयं की हत्या या आत्म विनाश है. अपनी ज़िंदगी समाप्त करने का यह एक ऐसा कृत्य है, जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति की मदद नहीं ली जाती है. जबकि यूथेनेसिया या मर्सी किलिंग या दया मौत का मतलब ऐसी मौत से है, जिसमें दूसरी ह्यूमन एजेंसी के द़खल की ज़रूरत नहीं पड़ती है. दया मौत का मतलब आत्महत्या नहीं है. इसलिए दया मौत की कोशिश भारतीय दंड विधान की धारा 309 के प्रावधान के अधीन नहीं है. आत्महत्या और दया मौत की अवधारणाएं तथ्य और वैधानिकता दोनों ही दृष्टिकोण से अलग हैं. यूथेनेसिया या दया मौत कुछ और नहीं, बल्कि मानव हत्या है, चाहे यह जिस किसी भी परिस्थिति से प्रभावित हो. बहरहाल यूथेनेसिया एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर हमेशा से यह बहस होती रही है कि क्या इसकी अनुमति मिलनी चाहिए? इस विचारधारा के पक्षधर भारतीय संविधान की धारा 21 के आधार पर दलील देते हैं, जिसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को ज़िंदगी जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार दिए गए हैं. दलील दी जाती है कि प्रत्येक मौलिक अधिकार के साथ साथ कुछ निषेध भी जुड़े हुए हैं. उदाहरण के लिए देश के किसी भी भाग में घूमने-फिरने की आज़ादी के साथ युक्तिसंगत निषिद्धताएं भी जुड़ी हुई हैं. उसी तरह जीने के अधिकार के साथ-साथ न जीने का अधिकार भी मिलना चाहिए. अनुच्छेद 21 में मरने या न जीने का अधिकार शामिल किया जाना चाहिए या नहीं, यह सवाल सबसे पहले स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मारुति श्रीपति दुबाल मामले में उठा. बंबई हाईकोर्ट में इस मामले में यह तथ्य सामने रखा गया कि जीने के अधिकार में न जीने या मरने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए और अदालत ने इस मामले में कहा कि मरने का अधिकार बिल्कुल भी अस्वाभाविक नहीं है. यह बस असामान्य है. अदालत ने ऐसे कई मामलों का उल्लेख भी किया, जिनमें व्यक्ति अपनी जीवनलीला समाप्त करना चाहते थे. सर्वोच्च न्यायालय ने पी रथिनाम बनाम भारत सरकार मामले में अपने इस रु़ख को बरकरार रखा. बहरहाल, गियान कौर बनाम स्टेट ऑफ पंजाब के महत्वपूर्ण मामले में पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीने के अधिकार में मौत का अधिकार शामिल नहीं है. अनुच्छेद 21 स़िर्फ जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है और इसमें मौत के अधिकार का कोई मामला शामिल नहीं है.
यूथेनेसिया के पक्ष में दलील देने वाले मरीज़ों के निर्णय को स्वीकार किए जाने की बात करते हैं. समाज व्यक्ति के हितों की रक्षा करता है. समाज का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि सभी सम्मान और शांतिपूर्वक अपनी ज़िंदगी जी सकें. अदालत भी इस बात का उल्लेख कर चुकी है कि संविधान का अनुच्छेद 21 लोगों के सम्मान के साथ जीने की बात करता है. प्रत्येक व्यक्ति को समुचित सम्मान के साथ ज़िंदगी जीने का हक़ है और इस सम्मानपूर्ण ज़िंदगी में ज़रा भी कमी अगर महसूस होती है तो उसे अपनी ज़िंदगी समाप्त करने का हक़ भी मिलना चाहिए. कोई मरीज अपनी ज़िंदगी समाप्त करने के बारे में तभी सोच सकता है, जब वह अत्यंत पीड़ा महसूस कर रहा हो. पीड़ादायक ज़िंदगी जीने के बजाय कोई भी अपनी ज़िंदगी को बग़ैर पीड़ा के समाप्त करना ही पसंद करेगा. जहां तक नैतिकता का सवाल है तो इस लिहाज़ से भी मरीज़ को अगर इस बारे में पूरी जानकारी है कि बीमारी की वजह से उसकी मौत सुनिश्चित है तो बेहतर है कि उसे बग़ैर किसी पीड़ा के मौत को गले लगाने की अनुमति दे दी जाए. मरीज़ की मौत होना जब लगभग तय हो तो उसकी पीड़ा की अवधि को जानबूझ कर बढ़ाया जाए? यूथेनेसिया के समर्थक एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर ज़ोर देते हैं कि एक ऐसे मरीज़ को ज़िंदा रखने के लिए चिकित्सकीय सुविधाओं के नाम पर भारी-भरकम रक़म ़खर्च क्यों की जाए, जिसका हर हाल में मरना तय माना जा रहा हो. उनकी दलील है कि जीवनरक्षक सुविधाएं उन मरीज़ों को उपलब्ध कराई जाएं, जिनके बचने की संभावना ज़्यादा हो. इसलिए यह सवाल यहां फिर से उठता है कि हम चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराकर किसकी
जीवनरक्षा करना चाहेंगे? उस व्यक्ति की, जिसकी आज या कल में मौत तय है या फिर उसकी, जिसके बचने के आसार ज़्यादा हैं? एक बात अवश्य कही जाती है कि अगर असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगियों को यह अधिकार दे दिया गया तो इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाएगी. लेकिन समर्थक तब यह दलील देते हैं कि प्रत्येक अधिकार के साथ उसके ग़लत इस्तेमाल का जो़खिम भी है, लेकिन तब इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों को अधिकार से ही महरूम कर दिया जाए. बल्कि इस अधिकार के सही कार्यान्वयन के लिए नियमों और नियामक की व्यवस्था होनी चाहिए.
धार्मिक समूहों, क़ानून एवं चिकित्सकीय पेशे से जुड़े लोगों में इस मुद्दे पर तीव्र विरोध देखने को मिलता है. उनके अनुसार, अगर यूथेनेसिया को क़ानूनी मान्यता दी जाती है तो इसे मरने का अधिकार नहीं कहा जाना चाहिए, बल्कि मारने का अधिकार कहा जाना चाहिए. यह मेडिकल इथिक्स के बिल्कुल खिला़फ है. मेडिकल इथिक्स में मरीज़ों की
सेवा-सुश्रुषा, देखरेख और रोग से मुक्ति दिलाने की बात कही गई है, न कि उनकी जीवनलीला समाप्त कर देने की. वर्तमान दौर की बात करें तो आज चिकित्सा विज्ञान का़फी तेज़ी से विकसित होता जा रहा है. यहां तक कि जो असाध्य रोग माने जाते हैं, वे भी असाध्य नहीं रह गए हैं. अगर मरीज़ों की ज़िंदगी बचाकर रखी जाती है तो बहुत संभव है कि आने वाले समय में उन्हें रोग मुक्त करने में भी हमें कामयाबी मिल जाए. धार्मिक समूहों की अपनी दलीलें हैं. उनके अनुसार, मनुष्य में जीवन देने की क्षमता नहीं है, इसलिए उसे किसी का जीवन लेने का अधिकार भी नहीं मिलना चाहिए. आज चिकित्सा विज्ञान इस हद तक विकसित हो चुका है कि जीवनदायी सुविधाओं और चिकित्सकीय उपायों के हटा लेने के बाद, यहां तक कि मस्तिष्क के काम न करने या शरीर की गतिविधियों पर नियंत्रण खोने के बाद भी जीवन की गाड़ी को कृत्रिम रूप से लंबे समय तक खींचा जा सकता है. लेकिन, क्या सही मायने में इसे ज़िंदगी कहा जा सकता है? क्या इसके लिए कुछ निश्चित परिस्थितियां नहीं होनी चाहिए, जिनके मुताबिक़ डॉक्टर, मरीज़ और परिवारीजन सांस की डोर थामे रहने के बारे में फैसला करें? क्या अरुणा शानबाग की ज़िंदगी लंबी हो सकती है?
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