पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद निवासी देवाशीष सरकार ने 30 नवंबर 2006 को जब ग्रेजुएट देवारती दत्त सरकार से शादी की तो उनके सामने थे केवल सुनहरे सपने. लेकिन सपने पापड़ की तरह अचानक चूर-चूर हो जाएंगे, ऐसा उन्होंने कहां सोचा था. शादी के एक साल बाद से ही पत्नी उन्हें उस प्राइमरी स्कूल के पास घर लेने के लिए दबाव डालने लगी, जहां वे पढ़ाते थे. बूढ़े मां-बाप की देखरेख के लिए ही वह 50 किलोमीटर दूर का र्सेंर रोज तय करते थे. सितंबर 2007 में वह पैदा हुआ. दो माह बाद वह अचानक मायके चली गई और फिर उसने वापस लौटने से इंकार कर दिया. उसने देवाशीष को नौकरी छोड़ कर उसके साथ तमिलनाडु में बसने का प्रस्ताव दिया, जहां उसका एक भाई रहता है. मई 2008 में उसने मुर्शिदाबाद की एक अदालत में धारा 498 ए, 406 और 125 के तहत मुक़दमा दर्ज़ करा दिया. अब वह केस उठाने की एवज में देवाशीष से आठ लाख रुपये की मांग कर रही है.
कोलकाता के बालीगंज इलाक़े की रूपा (छद्म नाम) के विवाह से पहले कई लड़कों से अवैध संबंध थे. इसी इलाक़े के मनीष के साथ उसकी शादी हो गई, पर शादी के बाद भी वह उन युवकों के संपर्क में रही. जब पति ने आपत्ति की तो उसने दहेज के लिए सताने का आरोप लगाकर थाने में मामला दर्ज़ करा दिया. अब मनीष अदालत के चक्कर लगा रहा है और रूपा सारे गहने लेकर मायके में है. उसने एक बबॉयफ्रेंड के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप को गले लगा लिया है. टालीगंज के नेताजी नगर निवासी सुदीप साहा की कहानी भी कुछ इसी तरह है. 1990 में उनका विवाह हुआ, पर कुछ माह बाद ही पत्नी सुजाता ने प्रेमी की मदद से प्रदीप पर अत्याचार शुरू कर दिया. जनवरी 1995 में दोनों के बीच तलाक हो गया, मगर स्थानीय क्लब और प्रेमी की मदद से सुजाता ने प्रदीप के फ्लैट पर क़ब्ज़ा कर लिया है. बेचारा पीड़ित पति दर-दर भटक रहा है. उत्तर 24 परगना के वनगांव निवासी सुशील कुमार दास वहां के ग्रामीण बैंक में काम करते हैं. 13 जून 1995 को शादी हुई. कुछ सालों बाद से ही पत्नी मां-बाप से अलग रहने के लिए दबाव डालने लगी. सुशील नहीं माना तो वह अपनी बच्ची को लेकर मायके चली गई. जुलाई 2001 में उसने बरासात सीजीएम अदालत में पति पर उत्पीड़न एवं भरण-पोषण का मामला दायर कर दिया. स्थानीय महिला समिति के हस्तक्षेप से सुशील गिरफ़्तारी से तो बच गया, पर अदालत के चक्कर लगाते-लगाते आख़िरकार 2007 में उसे भरण-पोषण का ख़र्च देने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब पत्नी का केस ख़त्म कर राजी-ख़ुशी तलाक लेने के लिए पांच लाख रुपये मांग रही है.
संभवतः इस तरह के मामलों ने ही देश के कई शहरों में पतियों को एकजुट होकर संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया है. कोलकाता के अलावा दिल्ली, बेंगलुरू, सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों में पुरुषों के हक़ के लिए लड़ने वाली संस्थाएं बनी हैं. भारत के पुरुष प्रधान समाज के मिथक के मद्देनज़र यह सब भले ही हास्यास्पद और अतिरंजित लगे, पर अबलाओं को सबला बनाने के लिए जो क़ानूनी हथियार दिए गए हैं, उनका कुछ महिलाएं दुरुपयोग कर रही हैं, इस बात में कोई शक़ नहीं है. कोलकाता की पीड़ित पुरुष पति परिषद का जन्म भी पत्नी के हाथों पति के उत्पीड़न के कारण हुआ. महानगर के राधिका नाथ मलिक की शादी 1985 में हुई थी. उग्र स्वभाव की पत्नी विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिए अनाप-सनाप पैसे मांगती थी. राधिका नाथ में सारी मांगें पूरी कर सकने में असमर्थ थे. घर में कलह ने बसेरा बनाया. 10 वर्षों तक घुटन की ज़िंदगी से ऊबकर राधिका नाथ ने 1995 में तलाक ले लिया. पत्नी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए का लाभ उठाते हुए उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया. हालात ने उन्हें उनकी तरह दुःखी पतियों के आंसू पोंछने और कुछ करने के लिए प्रेरित किया. गृह कलह की हद से गुज़रने से पहले ही अगस्त 1992 में ही उन्होंने पति परिषद का गठन किया. आज परिषद के सक्रिय सदस्यों की संख्या 1400 के आसपास हो गई है. इसमें 40 महिलाएं भी हैं, जो संस्था के उद्देश्य से पूरी तरह सहमत हैं. परिषद की उपाध्यक्ष एडवोकेट अरुणा मुखर्जी मानती हैं कि महिलाओं का एक वर्ग भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए, 406 व 34 का उपयोग पुरुषों को सताने के लिए कर रहा है. नारी स्वाधिकार व अदालतेर डायरी (नारी के अधिकार और अदालत की डायरी) जैसी चर्चित बांग्ला पुस्तकों की लेखिका ने इन धाराओं की ख़ामियों को दूर करने की वकालत की है. परिषद पहले पति-पत्नी के बीच आई दरार पाटने का प्रयास करती है. विवाह टूटने की हालत में पतियों को क़ानूनी मदद उपलब्ध कराती है और कभी-कभी महिला संगठनों की तरह सभा एवं प्रदर्शन भी करती है. आज तक जो मामले परिषद के पास आए हैं, उनमें से 60 प्रतिशत घरों में फिर से बहार आई है. जबकि 40 प्रतिशत मामलों में तलाक दिलवाने में संस्था कामयाब हुई है. परिषद के संचालक एवं अवैतनिक महासचिव राधिका नाथ बताते हैं, हमारी संस्था नारी विरोधी या कट्टर पुरुषवादी नहीं है. इसे एक मानवतावादी संगठन कहना चाहिए. परिषद के कई मामलों का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी निपटारा किया है. यह राष्ट्रीय महिला आयोग के भी संपर्क में रहती है. क़ानून ने किस तरह महिलाओं को पुरुषों को सताने का अधिकार दे दिया है, इसकी मिसाल देते हुए राधिका नाथ ने बताया कि पत्नी मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाकर पति को गिरफ़्तार करा सकती है. इस मामले में पुलिस कोई सबूत नहीं मांगती. पति की शारीरिक अक्षमता के कारण मां बनने में असमर्थ पत्नी तलाक पा सकती है, पर पत्नी की शारीरिक ख़ामी के कारण पिता बनने में असमर्थ पति इस आधार पर तलाक नहीं पा सकता. परिषद क़ानून के इस प्रावधान से क्षुब्ध है कि कोई भी स्त्री अगर पराए पुरुष के साथ व्याभिचार करती पकड़ी जाती है तो पुरुष ही दंड का भागी होगा, स्त्री नहीं. तलाक की स्थिति में पत्नी अपने बेरोज़गार पति से भी गुजारा भत्ता मांग सकती है, वसूल सकती है. धारा 375 के मुताबिक़, नारी की अनुमति लिए बिना या उसकी इच्छा के ख़िला़फ सहवास करना बलात्कार माना जाएगा. पति परिषद पूछती है कि बिस्तर पर नारी ने सहवास की अनुमति दी थी या नहीं, इसे कैसे प्रमाणित किया जाएगा?
परिषद ही नहीं, देश के कई संगठन भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए में संशोधन की मांग कर रहे हैं. इसके मुताबिक़, विवाह के सात साल के अंदर कोई वधू आत्महत्या करती है या शारीरिक-मानसिक पीड़ा का शिकार होती है तो उसकी ससुराल के लोगों को गिरफ़्तार कर लिया जाएगा और 90 दिनों तक उनकी ज़मानत नहीं होगी. परिषद की मांग है कि अगर वधू के हत्यारों को दंडित करने के लिए यह धारा बनी है तो वर हत्या के लिए भी 498-बी बनाई जानी चाहिए. संस्था कहती है कि महिला के साथ बलात्कार के दोषियों को सजा देने के लिए धारा 375 बन सकती है तो पुरुषों के साथ बलात्कार के लिए कोई क़ानूनी प्रावधान क्यों नहीं हो सकता? कम से कम 498-ए को ज़मानत योग्य अपराध करार देने की पुरजोर मांग हो रही है. परिषद महिला संगठनों से खार खाई दिखती है. पति परिषद के एक पर्चे में लिखा है, नारीवादी देह व्यापार में लगी महिलाओं को वेश्या, गणिका या पतिता नहीं कहना चाहते. वे उन्हें सेक्स वर्कर या यौनकर्मी कह रहे हैं. वे श्रमिक का हक़ देने व ट्रेड यूनियन बनाने की मांग कर रही हैं. एक दिन सुना जाएगा कि रेड लाइट क्षेत्र सेक्स इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स हो गए हैं. फिर इस उद्योग के राष्ट्रीयकरण की मांग होगी. दलाल एक्ज़िक्यूटिव होंगे, वेश्याओं की मौसियां अध्यक्ष-चेयरमैन होंगी. फिर पेंशन, प्रोविडेंट फंड और बोनस न देने पर हड़ताल का आह्वान होगा.
पीड़ित पतियों के लिए काम कर रही सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन भी भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और घरेलू हिंसा क़ानून का दुरुपयोग रोकने के लिए इनमें संशोधन की मांग कर रही है. संस्था का दावा है कि विवाहित पुरुषों की आत्महत्याओं का सबसे बड़ा प्रेरक तत्व पत्नियों का मौखिक, आर्थिक, भावनात्मक और शारीरिक अत्याचार है. मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफं डेवलपमेंट स्टडीज़ के प्रो. नागराज के एक अध्ययन में कहा गया है कि हर साल 22 से 23 हज़ार पुरुष पत्नियों के अत्याचार के कारण ख़ुदकुशी करते हैं. संस्था का दावा है कि 2005 में दायर किए गए 58,200 मुक़दमों में से 80 प्रतिशत झूठे थे. संस्था की मांग है कि क़ानून को लिंग निरपेक्ष किया जाए, क्योंकि कई मामलों में पत्नियां ही पुरुषों पर अत्याचार करती हैं. फाउंडेशन पुरुष कल्याण मंत्रालय बनाने की मांग कर रहा है. उसका मानना है कि भारतीय पुरुष कर से हासिल होने वाली आय का 82 प्रतिशत हिस्सा देते हैं, पर एक भी ऐसा कोई मंच नहीं है, जहां वे अपनी आवाज़ उठा सकें. संगठन की वेबसाइट पर मौजूद एक लेख के मुताबिक़, सरकार महिला कल्याण के लिए हर साल 75 अरब रुपये ख़र्च करती है, इसलिए पुरुष कल्याण मंत्रालय भी बनना चाहिए, क्योंकि हर साल 56 हज़ार पुरुष वैवाहिक कारणों से आत्महत्याएं कर रहे हैं. संस्था का दावा है कि दहेज की मांग के चलते हर साल केवल 7000 महिलाओं की मौत होती है. संस्था घरेलू हिंसा क़ानून को आतंकवादी गतिविधि करार देती है.
मुंबई के चाइल्ड राइट एंड फैमिली वेलफेयर से जुड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने पिछले साल अगस्त में महाराष्ट्र के डीजीपी एस एस विर्क से एक अनोखी गुहार की. पत्नी पीड़ित ये पति अपने बच्चों की कस्टडी चाहते थे. इन लोगों ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो वे बच्चों के अपहरण के लिए मजबूर होंगे. प्रशांत सावंत, विलास आदिक, दीपक देवरुकर और मनीष कटीरा ने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर चार माह पहले ही अपना संगठन बनाया है. उन्होंने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है. संगठन के एक सदस्य पुरुषोत्तम महाजन पर उनकी पत्नी ने दहेज के लिए सताने का मुक़दमा दायर किया है. इसे ग़लत बताने के लिए महाजन ने एक आवाज़ रहित वीडियो यू-ट्यूब पर जारी किया है, जिसमें पत्नी उनकी पिटाई कर रही है. महाजन फिल्मकार सुभाष घई के साथ सहायक निर्देशक के तौर पर काम कर चुके हैं. उन्होंने यह वीडियो पुलिस को भी दिखाया, पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा. इस ग़ैर सरकारी संगठन के अध्यक्ष संदीप केडिया के मुताबिक़, सारे सबूत होने के बावजूद क़ानून लागू करने वाली एजेंसियां हमेशा औरतों का पक्ष लेती हैं. संगठन के एक अन्य सदस्य के मुताबिक़, हर शनिवार वे बांद्रा कोर्ट के पास एक बैठक आयोजित करते हैं. इन्हें हर सप्ताह बच्चों की कस्टडी हासिल करने से संबंधित 50 कॉल्स आती हैं.
Related posts:
- इतनी बडी कीमत चुकाएगी देवभूमि?
- सीआईए और मोसाद की हिंदुस्तान पर बुरी नजर
- लुप्त होती जा रही है बुन्देली लोक नृत्यकला
- कम फिल्मी नहीं होती एफबीआई की असली कहानियां
- आतंकी ख़तरों के प्रति हमारी तैयारी
|
|
|



