दो साल बाद देश में 1998 में चुनाव हुए. एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी ने जोड़-तोड़कर सरकार बनाई. दक्षिण की नेत्री जयललिता के गुस्से का शिकार होकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को फिर जाना पड़ा. 1999 में हुए चुनाव में हिंदू ब्रिगेड पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पार्टी के लौह पुरुष रामरथी लालकृष्ण आडवाणी ने राम के नाम पर फिर वोट मांगे. जनता झांसे में आ गई. ठीकठाक सांसदों के साथ हिंदू ब्रिगेड पार्टी संसद में पहुंची. बहुमत फिर भी नहीं मिला. नतीजतन सत्ता से कांग्रेस और वामपंथियों को दूर रखने के नाम पर बीस-बाइस छोटे मोटे दलों की खिचड़ी पकाकर अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए. इसी के साथ राम कहीं खो गए. अब भी खोए हुए हैं. उन्हें अभी तक भव्य मंदिर का इंतज़ार है.
रामलला के कंधे भारतीय जनता पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में इतने थक गए कि वे अब भी थकान से उबरे नहीं हैं. मंदिर निर्माण पार्टी के एजेंडे से बाहर हो गया. राम इतने बेगाने हो गए कि पार्टी उनका नाम भी लेने से डरने लगी. वाजपेयी की सरकार राम को हाशिए पर धर कर चलने लगी. वाजपेयी अपने को हिंदू प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास में दर्ज़ नहीं कराना चाहते थे. वे एक स्टेटसमैन बनना चाहते थे. देश के ऐसे नेता, जो हिंदू से लेकर मुसलमान तक, सबमें लोकप्रिय हो. वैसे भी लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण वे संघ परिवार और पार्टी से ऊपर उठ चुके थे.
सरकार के एक-दो साल बीत जाने के बाद राम मंदिर एजेंडे पर कुछ नहीं हुआ तो संघ परिवार के संगठन वाजपेयी सरकार से नाराज़ होने लगे. मंदिर निर्माण के लिए इन संगठनों की फर्ज़ी धमकियों का दौर शुरू हुआ. सरकार पर दबाव बनाने के लिए शिलान्यास से लेकर शिला पूजन तक. ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेकर अयोध्या से लौटते हुए गुजरात के कारसेवकों की ट्रेन को 27 फरवरी 2002 में मवालियों ने जला दिया. मरने वालों की संख्या 58 थी. गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और केंद्र में भी. विधानसभा चुनाव सिर पर थे. पार्टी का सूबे में स्वास्थ्य अच्छा नहीं था. पार्टी ने दो-तीन अंदरूनी सर्वे कराए थे. उनमें वह डबल डिजिट में भी सीट हासिल करती नहीं दिख रही थी. मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के परफॉमेंस को लेकर सवाल उठ रहे थे. कच्छ और भुज में आए भयानक भूकंप से हुई तबाही के बाद वह पुनर्वास कार्यक्रम में पिछड़ रहे थे. तिस पर उपचुनावों में पार्टी हार रही थी. कुल मिलाकर पार्टी आलाकमान के सामने केशुभाई पटेल का रिपोर्ट कार्ड गड़बड़ा गया था. पार्टी को लगा कि मुख्यमंत्री बदलने में ही उसकी भलाई है.
वाजपेयी अपने को हिंदू प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास में दर्ज़ नहीं कराना चाहते थे. वे एक स्टेट्समैन बनना चाहते थे. देश के ऐसे नेता, जो हिंदू से लेकर मुसलमान तक, सबमें लोकप्रिय हो. वैसे भी लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण वे संघ परिवार और पार्टी से ऊपर उठ चुके थे.
नए मुख्यमंत्री की खोज हुई तो संघ परिवार के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी का नाम उभरा. मोदी गुजरात के थे. प्रचारकी भी वहां कर चुके थे. महत्वाकांक्षी भी थे. मुख्यमंत्री बनने से पहले वे दिल्ली में कार्यरत थे. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे. संघ परिवार और पार्टी के बीच सेतु का काम करते थे. गोधरा कांड के व़क्त मुख्यमंत्री बने मोदी को छह माह ही हुए थे. इससे पूर्व उन्हें किसी भी प्रकार का प्रशासनिक अनुभव नहीं था.
मोदी से आनंद भारती की पहली मुलाक़ात शिमला में हुई थी. सरकारी गेस्ट हाउस पीटर ऑफ के कमरा नंबर 51 में. पार्टी महासचिव होने के नाते वह हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे. शिमला में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की ताज़पोशी होने वाली थी. पार्टी के पास बहुमत नहीं था. उसने घोटालों में घिरे पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास पार्टी के पांच विधायकों और अपनी पार्टी के बाग़ी विधायक रमेश धवाला के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. सुखराम के घोटाले के खुलासे के व़क्त संसद में भारतीय जनता पार्टी ने ख़ूब हो-हल्ला मचाया था. कई दिन संसद को ठप्प कर दिया था. लेकिन हिमाचल प्रदेश में सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन लेने में उसे शर्म नहीं आई. पार्टी की चाल, चरित्र और चेहरा ही सत्ताखोर है तो उसे शर्म कैसे आती?
मोदी के कमरे में जब आनंद भारती घुसे तो वह काले रंग का बंद गले का सूट पहने थे. अख़बार उनके हाथ में था. चाय की चुस्कियों के बीच वह अख़बार पढ़ रहे थे. मोदी से आनंद भारती की मुलाक़ात के सूत्रधार पार्टी के विधानसभा में विपक्ष के नेता जगत प्रकाश नड्डा थे. वे आनंद भारती को पटाकर मोदी के पास ले गए थे. असल में मोदी चाहते थे कि राज्य में बनने वाली धूमल सरकार के असली इंजीनियर के तौर पर दिल्ली के अख़बार में उन्हें पेश किया जाए. उनका महिमामंडन किया जाए. बताया जाए कि यदि मोदी न होते तो हिमाचल प्रदेश में धूमल सरकार न बनती. आनंद भारती उनकी इस सोच पर मन ही मन व्यंग्य से मुस्करा उठे. वह सोचने लगे कि अगर यह बात सच होती तो सभी अख़बार इसका खुलासा करते. फिर किसी पत्रकार को पटाने की ज़रूरत ही न पड़ती. उनका अख़बार दिल्ली के बड़े अख़बारों में था. मोदी की इस छोटी महत्वाकांक्षा ने आनंद भारती को मन ही मन हंसाया. वह उन्हें बौने लगे. (क्रमश
|
|
|









