पुस्तक अंश: मुन्नी मोबाइल- 3

एक प्रचारक की इस इच्छा को जानकर उन्हें लगा कि वे संघ परिवार की निष्ठाओं से बंधे नहीं हैं. भविष्य में राजनीति ही उनका रास्ता है. यह बात दीगर है कि संघ परिवार के पूर्व सरसंघ चालक उर्फ गुरुजी राजनीति को पाखाने से ज़्यादा महत्व नहीं देते थे. वे कहते थे कि राजनीति समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है किंतु वह अंतिम सत्य नहीं है. राजनीति की भूमिका वैसी है जैसे किसी मनुष्य के लिए शौच जाना, जिसे टाला नहीं जा सकता. किंतु वहां बहुत देर तक बैठा नहीं जा सकता. मुलाक़ात के बाद आनंद भारती को लग गया था कि मोदी अपने आगामी जीवन में राजनीति के पाखाने में बैठने वाले हैं. पचास मिनट मोदी सरकार की इंजीनियरिंग को समझाते रहे. बात आई-गई और ख़त्म हो गई. मोदी का पटाक्षेप हो गया.

केशुभाई को हटवाकर मोदी स्वयं मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते थे. उन्होंने पूरा जोड़-तोड़ किया. वह पार्टी की नेचुरल च्वायस के तौर पर नहीं उभरे थे. फिर भी पार्टी को लगा कि मोदी होने वाले चुनाव में कुछ करिश्मा कर दिखाएंगे. करिश्मा करने के लिए गोधरा की आग मोदी के लिए संजीवनी साबित हुई. मुख्यमंत्री बनने के बाद विधायक बनने के लिए दो दिन पहले ही मोदी राजकोट विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे. तब तक उनमें करिश्मा नहीं था. साधारण से मुख्यमंत्री भर थे वह. इसीलिए साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड के बाद वह जब गोधरा स्टेशन मौक़ा-ए-वारदात पर पहुंचे, तो गुस्साई भीड़ उन पर चढ़ बैठी. उनके साथ गए उनके मंत्री अशोक भट्ट ने स्थिति को संभाला. गुस्साई भीड़ से पहला एनकाउंटर था वह मोदी के लिए. मोदी गमगीन मुद्रा में थे. उन्होंने गोधरा में मृतकों का पोस्टमार्टम कराने के बजाय लाशों को अहमदाबाद ले जाने का फैसला किया. यदि मोदी यह फैसला नहीं करते तो सैकड़ों लोगों की जान बचाई जा सकती थी. असल में वह लाशों पर राजनीति की रणनीति बना रहे थे. पूरा ख़ाका उनके दिमाग़ में खिंच चुका था.

लाशें अहमदाबाद लाईं गईं. सरखेज गांधीनगर हाइवे स्थित सोला अस्पताल में लाशों के पहुंचने पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता वहां इकट्ठा हो गए. पोस्टमार्टम के बाद लाशों को उनके परिवारों को सौंपने का सिलसिला शुरू हुआ. अहमदाबाद के बाहरी इलाक़े रामोल के जनता नगर के लगभग एक दर्ज़न कारसेवक वहां थे. सभी ग़रीब परिवार से थे. बताते हैं कि मरने वाले घूमने फिरने की गरज से अयोध्या गए थे. विश्व हिंदू परिषद वाले उन्हें मुफ़्त यात्रा के नाम पर पटा कर ले गए थे. अन्य मरने वाले भी निम्न मध्यवर्ग के ही थे. उनमें राम मंदिर बनाने का जज़्बा विश्व हिंदू परिषद के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं जैसा नहीं था. अयोध्या गए लोगों में अहमदाबाद के संभ्रांत इलाक़ों नवरंगपुरा और सेटेलाइट आदि से कोई नहीं था.

मौज-मस्ती के नाम पर मौत मिलेगी, यह मरने वालों के परिजनों को नहीं पता था. इसीलिए जब जनता नगर में एक दर्ज़न लाशों को लेकर हिंदू ब्रिगेड के कार्यकर्ता पहुंचे तो मरने वालों के घर वाले उन पर चढ़ गए. बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष हरेश भट्ट के साथ गुस्साई भीड़ हाथापाई पर उतर आई. स्थिति ख़राब होते देख भट्ट ने पैंतरा बदला. भावनात्मक रूप से भीड़ को समझाने की वे कोशिश करने लगेः सौगंध खाते हैं कि जिन्होंने हमारे लोगों को इस बेरहमी से मारा है, हम उनसे बदला लेकर रहेंगे. उनके इस वाक्य में भावों का ज्वार था.

भट्ट के ओजस्वी भाषण का असर हुआ और वहीं गुजरात के जलने की पहली चिंगारी चमक उठी. पहले से तैयार हिंदू ब्रिगेड के कार्यकर्ता आग से खेलने लगे. हाथों में तलवार और चाकू उग आए. हिंदू ब्रिगेड ने गोधरा कांड के विरोध में 28 फरवरी को गुजरात बंद का आह्वान किया था. छुट्टी होने के चलते तमाशबीन और हुड़दंगी भी बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर आए. इस तरह मोदी की लाशों की राजनीति का पहला अध्याय सफल रहा.

उसके बाद बची हुई लाशों को भी उनके शहरों में भेजा गया. शहीद की तरह जुलूस निकाले गए. धमाल हुआ. आग लगी. सौराष्ट्र को छोड़कर पूरा गुजरात जलने लगा. और यह सब कुछ राम के नाम पर हुआ. हमला जयश्रीराम के उदघोष के साथ होता. मुसलमान निशाने पर होते.

अहमदाबाद में मुसलमानों की बसाहट साबरमती नदी के दूसरे हिस्से में है. साबरमती नदी शहर के बीचोंबीच बहती है. नदी के दो किनारों की अलग-अलग दास्तां है. नदी के दोनों किनारे एक शहर में होने के बावजूद दो मुक़म्मल शहर थे. एक किनारे पर शोक में डूबी बस्तियां थीं, तो दूसरे किनारे पर लाशों की दुर्गंध के बीच दीवाली मनाते लोगों के घर. एक तऱफ अंधेरा, दूसरी तऱफ उजाला. स़िर्फ उजाला. सभी कुछ भयमुक्त. साबरमती नदी ने शहर को कृष्ण और शुक्ल पक्ष में बदल दिया था. पुलिस बल के संघीकरण के चलते दंगाइयों की सुरक्षा में वे तैनात हो गए थे. मुसलमानों को उनके घरों में क़ैद कर दिया गया था. खिड़की से सिर निकालते ही सेल दाग दिए जाते. दूध-पानी और राशन जैसी सुविधाओं से वे महरूम हो गए थे.

एक प्रचारक की इस इच्छा को जानकर उन्हें लगा कि वे संघ परिवार की निष्ठाओं से बंधे नहीं हैं. भविष्य में राजनीति ही उनका रास्ता है. यह बात दीगर है कि संघ परिवार के पूर्व सरसंघ चालक उर्फ गुरुजी राजनीति को पाखाने से ज़्यादा महत्व नहीं देते थे. वे कहते थे कि राजनीति समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है किंतु वह अंतिम सत्य नहीं है. राजनीति की भूमिका वैसी है जैसे किसी मनुष्य के लिए शौच जाना, जिसे टाला नहीं जा सकता. किंतु वहां बहुत देर तक बैठा नहीं जा सकता. मुलाक़ात के बाद आनंद भारती को लग गया था कि मोदी अपने आगामी जीवन में राजनीति के पाखाने में बैठने वाले हैं. पचास मिनट मोदी सरकार की इंजीनियरिंग को समझाते रहे. बात आई-गई और ख़त्म हो गई. मोदी का पटाक्षेप हो गया.

केशुभाई को हटवाकर मोदी स्वयं मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते थे. उन्होंने पूरा जोड़-तोड़ किया. वह पार्टी की नेचुरल च्वायस के तौर पर नहीं उभरे थे. फिर भी पार्टी को लगा कि मोदी होने वाले चुनाव में कुछ करिश्मा कर दिखाएंगे. करिश्मा करने के लिए गोधरा की आग मोदी के लिए संजीवनी साबित हुई. मुख्यमंत्री बनने के बाद विधायक बनने के लिए दो दिन पहले ही मोदी राजकोट विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे. तब तक उनमें करिश्मा नहीं था. साधारण से मुख्यमंत्री भर थे वह. इसीलिए साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड के बाद वह जब गोधरा स्टेशन मौक़ा-ए-वारदात पर पहुंचे, तो गुस्साई भीड़ उन पर चढ़ बैठी. उनके साथ गए उनके मंत्री अशोक भट्ट ने स्थिति को संभाला. गुस्साई भीड़ से पहला एनकाउंटर था वह मोदी के लिए. मोदी गमगीन मुद्रा में थे. उन्होंने गोधरा में मृतकों का पोस्टमार्टम कराने के बजाय लाशों को अहमदाबाद ले जाने का फैसला किया. यदि मोदी यह फैसला नहीं करते तो सैकड़ों लोगों की जान बचाई जा सकती थी. असल में वह लाशों पर राजनीति की रणनीति बना रहे थे. पूरा ख़ाका उनके दिमाग़ में खिंच चुका था.

लाशें अहमदाबाद लाईं गईं. सरखेज गांधीनगर हाइवे स्थित सोला अस्पताल में लाशों के पहुंचने पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता वहां इकट्ठा हो गए. पोस्टमार्टम के बाद लाशों को उनके परिवारों को सौंपने का सिलसिला शुरू हुआ. अहमदाबाद के बाहरी इलाक़े रामोल के जनता नगर के लगभग एक दर्ज़न कारसेवक वहां थे. सभी ग़रीब परिवार से थे. बताते हैं कि मरने वाले घूमने फिरने की गरज से अयोध्या गए थे. विश्व हिंदू परिषद वाले उन्हें मुफ़्त यात्रा के नाम पर पटा कर ले गए थे. अन्य मरने वाले भी निम्न मध्यवर्ग के ही थे. उनमें राम मंदिर बनाने का जज़्बा विश्व हिंदू परिषद के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं जैसा नहीं था. अयोध्या गए लोगों में अहमदाबाद के संभ्रांत इलाक़ों नवरंगपुरा और सेटेलाइट आदि से कोई नहीं था.

मौज-मस्ती के नाम पर मौत मिलेगी, यह मरने वालों के परिजनों को नहीं पता था. इसीलिए जब जनता नगर में एक दर्ज़न लाशों को लेकर हिंदू ब्रिगेड के कार्यकर्ता पहुंचे तो मरने वालों के घर वाले उन पर चढ़ गए. बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष हरेश भट्ट के साथ गुस्साई भीड़ हाथापाई पर उतर आई. स्थिति ख़राब होते देख भट्ट ने पैंतरा बदला. भावनात्मक रूप से भीड़ को समझाने की वे कोशिश करने लगेः सौगंध खाते हैं कि जिन्होंने हमारे लोगों को इस बेरहमी से मारा है, हम उनसे बदला लेकर रहेंगे.

उनके इस वाक्य में भावों का ज्वार था.

भट्ट के ओजस्वी भाषण का असर हुआ और वहीं गुजरात के जलने की पहली चिंगारी चमक उठी. पहले से तैयार हिंदू ब्रिगेड के कार्यकर्ता आग से खेलने लगे. हाथों में तलवार और चाकू उग आए. हिंदू ब्रिगेड ने गोधरा कांड के विरोध में 28 फरवरी को गुजरात बंद का आह्वान किया था. छुट्टी होने के चलते तमाशबीन और हुड़दंगी भी बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर आए. इस तरह मोदी की लाशों की राजनीति का पहला अध्याय सफल रहा.

उसके बाद बची हुई लाशों को भी उनके शहरों में भेजा गया. शहीद की तरह जुलूस निकाले गए. धमाल हुआ. आग लगी. सौराष्ट्र को छोड़कर पूरा गुजरात जलने लगा. और यह सब कुछ राम के नाम पर हुआ. हमला जयश्रीराम के उदघोष के साथ होता. मुसलमान निशाने पर होते.

अहमदाबाद में मुसलमानों की बसाहट साबरमती नदी के दूसरे हिस्से में है. साबरमती नदी शहर के बीचोंबीच बहती है. नदी के दो किनारों की

अलग-अलग दास्तां है. नदी के दोनों किनारे एक शहर में होने के बावजूद दो मुक़म्मल शहर थे. एक किनारे पर शोक में डूबी बस्तियां थीं, तो दूसरे किनारे पर लाशों की दुर्गंध के बीच दीवाली मनाते लोगों के घर. एक तऱफ अंधेरा, दूसरी तऱफ उजाला. स़िर्फ उजाला. सभी कुछ भयमुक्त. साबरमती नदी ने शहर को कृष्ण और शुक्ल पक्ष में बदल दिया था. पुलिस बल के संघीकरण के चलते दंगाइयों की सुरक्षा में वे तैनात हो गए थे. मुसलमानों को उनके घरों में क़ैद कर दिया गया था. खिड़की से सिर निकालते ही सेल दाग दिए जाते. दूध-पानी और राशन जैसी सुविधाओं से वे महरूम हो गए थे.

(अगले अंक में जारी)

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *