Content on this page requires a newer version of Adobe Flash Player.

Get Adobe Flash player



राजनीतिक दलों के दावों की पोल खाली पंचायत चुनावों में एक लाख पदों के लिए चुनाव नहीं

  • Sharebar

देश के विभिन्न राजनीतिक दल गांव-गांव तक अपनी पहुंच बताते हैं. इस आधार पर पार्टी का व्यापक जनाधार होने की बात करते हैं. लेकिन, क्या यह हक़ीक़त है? सच कहें तो उनके दावों को पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. मध्य प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतीराज संस्थाओं के लिए चुनाव शुरू हो गए हैं. इन चुनावों के लिए दाखिल नामांकन पत्रों का विश्लेषण करने से राज्य में राजनीतिक दलों के संगठनात्मक आधार की पोल खुल गई है. उनके सदस्यता संबंधी दावे इन चुनावों के दौरान खोखले साबित हुए हैं. कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों की ग्रामीण स्तर पर संगठन की उपस्थिति का दावा सही नहीं है.

मध्य प्रदेश में कुल 3 लाख 63 हजार 337 ग्रामपंचों, 22 हज़ार 795 सरपंचों, 6816 जनपद सदस्यों और 843 ज़िला पंचायत सदस्यों के लिए सीधे चुनाव कराए जा रहे हैं. नामांकन पत्र दा़खिल करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जनपद सदस्यों के 21, ग्राम सरपंचों के 365 और पंचों के 11,623 पदों के लिए एक भी नामांकन पत्र दा़खिल नहीं हुआ है. इसके अलावा 23 ज़िलों से मिली जानकारी के अनुसार, 182 सरपंच, तीन जनपद सदस्य और 88 हज़ार पंच निर्विरोध चुन लिए गए हैं. अभी और भी ज़िलों से जानकारी मिलनी शेष है. कुल मिलाकर 12 हज़ार पदों के लिए एक भी उम्मीदवार नहीं है और लगभग 90 हज़ार पदों पर चुनाव निर्विरोध हो गए हैं. इस प्रकार लगभग एक लाख पदों के लिए चुनाव में राजनीतिक दलों की उदासीनता सा़फ नज़र आती है.

गांव के मतदान केंद्रों पर जब राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों के पास पोलिंग एजेंट और कार्यकर्ता नहीं होते हैं तो शहरों से या आसपास के गांवों से कार्यकर्ता थोड़े समय के लिए भेज दिए जाते हैं. इसके बाद गांव में संगठन बनाने की ज़रूरत को पार्टियां भूल जाती हैं.

राज्य में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दो बड़े राजनीतिक दल हैं. दोनों ही दलों का दावा है कि पूरे प्रदेश में उनका संगठन मज़बूत है और मतदान केंद्र स्तर तक उनकी समितियां कार्यरत हैं. लेकिन दोनों ही दलों के दावे खोखले और काग़ज़ी साबित हो गए हैं, क्योंकि 12 हज़ार पदों के लिए किसी दल के पास कोई उम्मीदवार ही नहीं था और 90 हज़ार पदों के लिए चुनावी संघर्ष ही नहीं हो पाया. कहने को तो पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं कराए जा रहे हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना जारी हुई, कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही अपने-अपने संगठन के पदाधिकारियों को ज़िला और ब्लाक स्तर पर इन चुनावों की तैयारी में जुट जाने के निर्देश दे दिए थे. इसके अलावा दोनों दलों ने अपने विधायकों और सांसदों को भी पंचायत चुनाव में अपने समर्थक उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कराने को कहा था, लेकिन गांव स्तर तक संगठनात्मक आधार के अभाव के चलते लगभग एक लाख पदों के लिए चुनाव न होने से राज्य में दोनों बड़े राजनीतिक दलों की मज़बूती की पोल खुल गई है. इस वर्ष कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के संगठनात्मक चुनाव होने हैं. भाजपा के संगठनात्मक चुनाव फरवरी और कांग्रेस के चुनाव जून माह में होने हैं. चुनाव के लिए दोनों ही दलों ने सदस्यता अभियान चला रखा है. दोनों का दावा है कि गांव-गांव में उनका सदस्यता अभियान ज़ोर शोर से चल रहा है और पार्टी से लाखों की संख्या में नए सदस्य जुड़ रहे हैं. यदि इन दावों में ज़रा भी सच्चाई होती तो पंचायत चुनाव में इन दलों की ग्राम स्तर तक उपस्थिति और सक्रियता ज़रूर दिखाई देती. जानकारों का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेता अपने संगठन की हक़ीक़त जानते हैं, इसीलिए राज्य में शुरू से ही पंचायत चुनाव दलीय आधार पर न लड़ने का फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेताओं ने मिलजुल कर लिया था. राज्य सरकार ने तो अपने संगठन की लाज रखने के लिए पंचायतों में निर्विरोध चुनाव कराने को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से घोषणा कर दी थी कि जिन पंचायतों में निर्विरोध चुनाव होंगे, वहां ग्राम विकास के लिए पांच लाख रुपये की राशि दी जाएगी. इस घोषणा से अधिकारी और कर्मचारी वर्ग प्रोत्साहित हुए. राजनीतिक दलों का संगठनात्मक ढांचा कमज़ोर होने का लाभ उठाकर उन्होंने निर्विरोध चुनाव संपन्न कराने में ज़्यादा रुचि ली. इसका कहीं कोई विरोध भी नहीं हुआ, क्योंकि विरोध करने वाला कोई था ही नहीं. ज़िलों से प्राप्त समाचारों के अनुसार, कई पंचायतों में तो नामांकन पत्र भरने के अंतिम दिन सरकारी कर्मचारियों ने ही उम्मीदवार तलाश कर नामांकन पत्र दाखिल कराए और फिर उन्हें निर्विरोध निर्वाचित भी घोषित कर दिया. इसका कारण यह था कि कई गांवों में पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों ने कोई रुचि और सक्रियता ही नहीं दिखाई. जब गांवों में राजनीतिक दलों का संगठनात्मक आधार ही न हो तो यही एक उपाय बचता है. विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तो प्रचार से माहौल बनाकर लड़े जाते हैं. गांव के मतदान केंद्रों पर जब राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के पास पोलिंग एजेंट और कार्यकर्ता नहीं होते हैं तो शहरों या आसपास के गांवों से कार्यकर्ता थोड़े समय के लिए वहां भेज दिए जाते हैं. इसके बाद गांव में संगठन बनाने की ज़रूरत को पार्टियां भूल जाती हैं. मध्य प्रदेश में कुल 52 हज़ार आबाद गांव हैं, लेकिन कोई भी दल सप्रमाण दावे से यह नहीं कह सकता कि उसका संगठन राज्य के हर गांव में है.

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय नेता इन दिनों सदस्यता अभियान को लेकर का़फी चिंतित हैं. यह माना जाता है कि राजनीतिक दल जितने लोगों के सदस्य होने का दावा करते हैं, उसका केवल 55 प्रतिशत ही दल का वास्तविक सदस्य होता है. इस वर्ष भी इन दोनों दलों ने 25 लाख से ज़्यादा लोगों को पार्टी का सदस्य बनाने का दावा किया है. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं युवा नेता राहुल गांधी ने सदस्यता अभियान को गंभीरता के साथ लिया था. इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के नए नेतृत्व ने भी सदस्यता अभियान की गंभीरता को स्वीकार करते हुए प्रादेशिक इकाई को कई निर्देश जारी किए हैं. राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को राजनीति से जुड़ने का संदेश देकर कांग्रेस की सदस्यता को गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. अलग-अलग जगहों पर अपने प्रवास के दौरान वह स्वयं कांग्रेस के सदस्यता अभियान की निगरानी करते हैं. इसके बावजूद वर्तमान पंचायत चुनाव ने दोनों दलों को यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि उनके निर्देशों को मध्य प्रदेश राज्य गंभीरता से नहीं लेता. संभवत: यही कारण है कि ज़मीनी स्तर तक पकड़ रखने का दावा रखने वाले दोनों ही राष्ट्रीय दल मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव के दौरान एक लाख से अधिक पदों के लिए अपने सदस्यों को प्रत्याशी नहीं बना सके. उपरोक्त जानकारी अभी केवल 23 जिलों से प्राप्त हुई हैं. शेष 17 ज़िलों से जानकारी मिलना शेष है. राजनीतिक दल इस कथन के साथ कि पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहे हैं, अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर सकते हैं, परंतु दलीय आधार पर चुनाव न होने के बावजूद दोनों ही राष्ट्रीय दलों के सदस्य अपनी-अपनी पार्टियों का समर्थन लेकर इन चुनावों में दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं. राजनीतिक क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर पार्टी सदस्यों की अनुपलब्धता को छिपाने के लिए ही संभवत: पंचायत चुनाव को ग़ैरदलीय आधार पर कराने संबंधी निर्णय दोनों दलों की सहमति से लिया गया था. राष्ट्रीय स्तर पर ज़मीन से जुड़ी राजनीति के पक्षधर नेताओं को इस सूचना से गहरा आघात लगना स्वाभाविक है. लेकिन, यह भी सत्य है कि राजनीति में झूठे दस्तावेज़ों और बोगस आंकड़ों के साथ एक लंबी राजनीतिक पारी नहीं खेली जा सकती है.

Related posts:

  1. राजनीतिक दलों के भटकाव की वजह
  2. कोयलांचल में ब़डे दलों की ज़मीन खिसकी
  3. गेंद तो राजनीतिक दलों के पाले में है
  4. जब राजनीतिक दोस्त बन जाते हैं दुश्मन
  5. शीर्ष दलों में नेतृत्व पर घमासान

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें